Wednesday, March 28, 2007

चलो घर परिवार की बातें करें

ये न समझें कि घबरा गये या मैदान छोड़ दिया. भाई साहब हमें आता है प्रदर्शन करना और वह हमारा चिट्ठा सिद्ध अधिकार है सो हमने किया. अब यह बात दूसरी है कि आप हमें उकसा रहे हैं कि हम फिर मुक्तकों के तीर चलायें. यों तो हमारा तरकस भरा हुआ है पर हम सारे बान एक साथ अब नहीं छोड़ेंगे. परम पूज्य प्रात:स्मरणीय, वन्दनीय , आदरणीय और श्रद्धेय श्री............जी के आदेशानुसार अब मुक्तकों की फ़ुहारें सप्ताह में एक ही दिन बरसेंगी. इसलिये अब शेष रह गईं है सीधी साधी घर परिवार की बातें

आओ बैठो यार बात कुछ हों घर की परिवार की
पूरी तनख्वाह खर्च हुई पर बाकी बचे उधार की

कोई अंतरिक्ष में उड़ना चाह रहा है उड़ जाये
कोई पथ में जबरन मुड़ना चाह रहा है, मुड़ जाये
कोई बाथरूम में गाना चाह रहा है, तो गाये
कोई लिखना चाह रहा है, लिखे, न समझे, समझाये

बंटी की चाची ने डाला बरनी भरे अचार की
आओ बैठो बात करेंगे, अब घर की परिवार की

किसका बेटा डायरेक्टर है, किसकी अटकी गाड़ी है
कौन तिकड़मी ? कौन कहाँ पर कितना बड़ा जुगाड़ी है
किसके घर स्काच बह रही, और कहां पर ताड़ी है
मंत्रालय का कौन सचिव है, कितना कौन अनाड़ी है

कुछ गंगा की, कुछ पंडों की, कुछ संगम , मंझधार की
आओ यारो बातें कर लें सच्ची अब घरबार की

चलें पान की दूकानों पर, चर्चा करें चुनावों की
गिरते हुए किसी के, कुछ के उलटे हुए नकाबों की
धुले पांव के लिये तरसती राजनीति की नावों की
कौन हवा के साथ बहे, किसके विपरीत, बहावों की

हासिल न हो कुछ तो क्या है ? करें जीत की हार की
आओ दो पल बातें कर लें अपने घर परिवार की

किसके बल्ले में कितना दम, कौन मारता चौका है
कौन दूसरों का दुख बाँटे, कौन तलाशे मौका है
कौन निकलता घर के बाहर, किसको किसने रोका है
और कहाँ किसकी बिल्ली पर किसका कुत्ता भौंका है

डाक्टर की हड़तालों की हों, लावारिस बीमार की
बातें करें आओ हम मिल कर कुछ तो अब संसार की

किसका भाई रिश्वत लेता, कौन गया अमरीका है
किसके जागे हुए भाग से टूटा कोई छींका है
कौन कहां पर बिल्कुल फूहड़, किसमें खूब सलीका है
किसके घर की मीठी नीमें, किसका शर्बत फ़ीका है

आया. आकर निकल गया जो बिना शोर, त्यौहार की
आओ भाई बात करें कुछ हम घर की परिवार की

छोड़ो यारो अगर समस्या, जिसे भुगतना भुगतेंगें
ज्यादा से ज्यादा क्या होगा शोर शराबा कर लेंगें
दस बारह खबरें छप लेंगी, भाषण वाषण हो लेंगें
फिर किस्मत का खेल बता कर चुप्पी धर कर बैठेंगे

करें विरोधों की कुछ बातें, कुछ हों जयजयकार की
नारदजी की गुंजित वीणा के हर झंकॄत तार की

फ़ुरसतियाजी के जो पंद्रह गज लम्बे, पैगामों की
उड़नतश्तरी ने जो जीते, पिछले बरस, इनामों की
संजय,पंकज, तरकश पर जो खींच ला रहे नामों की
रवि रतलामी की लिनक्स पर जो गुजरी हैं शामों की

नाहरजी के चिट्ठाकारी से नित बढ़े दुलार की
जीतू भाई चलो आज कुछ बातें हों परिवार की

8 comments:

अरुणिमा गुप्ता said...

क्या खूब. सच में घर परिवार में ये ही तो बातें होती हैं

उडन तश्तरी said...

फ़ुरसतियाजी के जो पंद्रह गज लम्बे, पैगामों की
उड़नतश्तरी ने जो जीते, पिछले बरस, इनामों की
संजय,पंकज, तरकश पर जो खींच ला रहे नामों की
रवि रतलामी की लिनक्स पर जो गुजरी हैं शामों की

नाहरजी के चिट्ठाकारी से नित बढ़े दुलार की
जीतू भाई चलो आज कुछ बातें हों परिवार की


--वाह, गीतकारजी..बस यही सब तो घर परिवार के मसले हैं जिन पर थोड़ा इत्मिनान से बात होती है. बहुत बढ़िया कल्पना रही.

अनूप शुक्ला said...

वाह बढ़िया पारिवारिक कविता है। इसी तर्ज पर लिखते रहें। हम पढ़ते रहेंगे।

मोहिन्दर कुमार said...

बढिया..माहोल हल्का कर देने वाली रचना

इतने लम्बे हो गये काम के अब दिन
छोटी पड गयी घडिया प्रीत और प्यार की
कब करें बाते मिल बैठ कर घर परिवार की ?

Sagar Chand Nahar said...

बहुत अच्छी लगी यह घर परिवार की बातें। काश इस तरह की बातें कुछ समय पहले भी होती तो अच्छा रहता। खैर...
वाकई दुलार तो बहुत मिला है आप सबका; उम्मीद है आगे भी मिलता रहेगा।
इस तरह की हल्की फुल्की रचनायें पढ़ना बहुत अच्छा लगता है।

अतुल शर्मा said...

धुले पांव के लिये तरसती राजनीति की नावों की
इन पंक्तियों के लिए मैं क्या कहूँ, नाव में चढ़ाने से पहले पाँव तो बस राम के ही धुलाए थे। कोई ऐसा है कहाँ जिसके पाँव धुलाए जाएँ परंतु राजनीति में तो धुले पाँव वालों की ही जरूरत है।
बहुत सुंदर कविता लिखी है।

Mrinal Kant (मृणाल कान्त) said...

beautiful!!

Krishna Kumar khandelwal said...

tareephen tum bhi sun lo hamse barmbar ki,
tumsa na dekhaa koi jo baaten karta saar ki,
jo akbar jinda hota shobhaa hote tum darbaar ki,
dekho is jamaane mein to aawaajen bas ha-ha-kaar ki.

wish you all best,
krsnaKhandelwal