Monday, March 4, 2013

बोल हैं कि वेद की ऋचाएं

 
 
शब्द शब्द होंठ पर चढ़ा लगे  भोजपत्र पर लिखी कथाएं हैं 
स्वर में जब ढला तो प्रश्न ये उठा,बोल हैं कि वेद  की  ऋचाएं  हैं 
 
सांस में मलय वनों की गंध ले बांसुरी की तान जैसे गात पर 
सात रंग की उठाये तूलिका रेख खींचता है भागु हाथ पर 
देवलोक के सलिल प्रवाह सा रूप व्योम भूमि पे  दमक रहा 
यों लगे की कांति सूर्य मांग कर शीश पर चढ़े हुए चमक रहा 
 
गंध  देह की समेट कर चलीं काननों में प्रीतमय हवाएं हैं 
बोलती तो हर कली ये पूछती बोल हैं कि वेद  की  ऋचाएं  हैं  
 
सप्त सिंधु नीर के भरे कलश होड़ कर रहेकिपाँव धो सकें 
पुष्प हरसिंगार के मचल रहे स्पर्श पाके धन्य आज हो सकें 
रोम रोम क्यारियाँ हैं केसरी रक्त वर्ण शतदलों से पग लिए
कल्पना उतर रही है देह धर,पुष्प-धन्व  और साथ शर लिए  
 
दृष्टि भेद कर उतरती शिंजिनी , थरथरा रही सभी शिराएँ हैं 
और घंटियाँ गले में गूंजती, बोल हैं कि वेद  की  ऋचाएं  हैं   
 
शिल्प के सरोवरों के स्रोत सी प्रेरणा अजन्ता भित्तिचित्र की 
छंद में जडी है प्रिय प्रवास के इन्द्रलोक से उतर के उर्वशी 
फूल में है रंग औ सुगंध बन भोर सद्यस्नात है प्रयाग की 
ले मल्हार सावनी है या कहो है उमंग रंग और फाग की 
 
शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी निशा चन्द्रमा की खिल रही कलाएं हैं
चांदनी भी गीत गा रही सुनो बोल हैं कि वेद  की  ऋचाएं  हैं  

Monday, February 18, 2013

ये कैदे बामशक्कत

ये कैदे बामशक्कत जो तूने की अता है
मैं सोचता हूँ पाया किस बात का सिला है


दीवार हैं कहाँ जो घेरे हुए मुझे है
है कौन सी कड़ी जो बांधे हुए पगों को
मुट्ठी में भींचता है इस दिल को क्या हवाएं
है कौन सा सितम जो बांधे हुए रगों को
धमनी में लोहू जैसे जम कर के रुक गया है
धड़कन को ले गया है कोई उधार जैसे
साँसों की डोरियों में अवगुंठनों के घेरे
हर सांस मांगती है मज़दूरियों के पैसे

ये कौन से जनम की बतला मुझे खता है
जो कैदे वामाशाक्कत ये तूने की अता है
हो काफ़िये के बिन ज्यों ग़ज़लों में शेर कोई
बहरो वज़न से खारिज आधी लिखी रुबाई
इस ज़िंदगी का मकसद बिखरा हुआ सिफर है
स्याही में घुल चुकी है हर रात की जुन्हाई
आवारगी डगर की हैं गुमशुदा दिशायें
हर दर लगाये आगल उजड़े हुये ठिकाने
कल की गली में खोया लो आज ,कल हुआ फिर
अंजाम कल का दूजा होगा ये कौन माने

खाली फ़लक से लौटी दिल की हर इक सदाहै
क्या कैदे बामशक्कत ये तूने की अता है

काँधे की एक झोली उसमें भी हैं झरोखे
पांवों के आबलो की गिनती सफर न गिनता
सुइयां कुतुबनुमा की करती हैं दुश्मनी अब
जाना किधर है इसका कोई पता ना मिलता
हर एक लम्हा मिलता होकर के अजनबी ही
अपनी गली के पत्थर पहचान माँगते हैं
सुबह से सांझ सब ही सिमटे हैं दो पलों में
केवल अँधेरे छत बन मंडप सा तानते हैं

अपना कहीं से कोई मिलता नहीं पता है
क्या कैदे बामशक्कत ये तूने की अता है।

Monday, February 4, 2013

अभी गीत कोई नहीं होंठ छूता

अभी गीत कोई नहीं होंठ छूता  अभी भाव मन के सभी नींद में हैं
रही रोशनी  श्याम चूनर लपेटे, अभी कल्पनाएँ गगन सीप में हैं 
लहर कोई उमड़ी नहीं सिन्धु में जो किनारे से जा बात कोई संवारे
सपन को निमंत्रण रहा भेजता मैं,छुपी दस्तकें अजनबी द्वीप में हैं
 
 
रहे ताकते सरगमों के सभी सुर, हुये तार खामोश सारंगियों के
फ़िसल्ती रही होंठ की कोर पर से गज़ल ने कोई नज़्म जो गुनगुनाई
उबासी समेटे रहे खिड्कियूं पर सकल सरजना के निमिष लड़खड़ाते
हवाओं की थिरकन रही प्रश्न ओढ़े, न संभव हुआ पत्र कुछ भी सुनाते
 
बिछी पंथ पर दृष्टि की चादरें जो बिना स्पर्श के रह गईं चांदनी सी
क्षितिज के सिरे तक टंगा शून्य केवल धुँआसा न हो कोई आकार उभरा
उठा टुटती डोर के चन्द टुकड़े नहीं उंगलियां बुन सकी हैं दुशाला
ना आया पुन:: चित्र बन सामने भी गया डूब स्मृति की गली में जो मुखड़ा
 

बुने मंत्र जितने कभी साधना को नहीं कोई सुर की चढ़ा  पालकी में
रही दीप की वर्तिका थरथराती ना ढाढस अनिश्चय ने कोई बंधाया
सूना था टपकती सुधा है निशा में,टंके  व्योम पर चौदहवें चन्द्रमा से
हथेली बढी ड़ी की बढी रहगई  है  नहीं आंजुरी में अभी कुछ समाया

Sunday, February 3, 2013

नया आज इतिहास लिखें हम

नया आज इतिहास लिखें हम
 
लिखें कथायें जो अंकित हैं आज हुईं युग की करवट पर
शासन का अधिकार हाथ में लेकर यहाँ शिखंडी बैठे
धूर्त शकुनि के अभिमंत्रित पासों से कर गठजोड़ निरन्तर
हर बाजी पर अपनी जय का कर प्रबन्ध मन में हैं ऐंठे
 
यह भी लिखें कलम कहती है जितना लिखे वही पड़ता कम
नया आज इतिहास लिखें हम
 
लिखें गल्प का नाम पा गये यहाँ सभी वे नाम सुने जो
भगतसिंह,बटुकेश्वर, बिस्मिल सभी अलिफ़-लैला के किस्से
बोस ,शिवा,आज़ाद तांतिया सभी कल्पना की उड़ान थे
दरबारी हर एक अपरिचित होकर रहा सदा ही जिससे
 
लिखें उजाले को दोपहरी में आ निगल लिया करता तम
नया आज इतिहास लिखें हम
 
लिखें देश में चीर हरण की घटना होती थी रोजाना
लिखें नित्य ही दुशासन के अट्टहास से दिशा गूँजती
लिखें यहां पर न्यायपालिका रही कैद होकर मुट्ठी में
लिखें अंधेरे में अन्धों को यहां दूर की रही सूझती
 
लिखें यहां पर पीर देख कर आंख नहीं हो पाती थी नम
नया आज इतिहास लिखें हम
 
 
लिखें यहां पर आदर्शों की नई एक पीढ़ी जन्मी थी
यहां पान की दोकानें पर होती रहीं समस्यायें हल
छिद्रान्वेषण को तत्पर थी रही मानसिकता जन जन की
यहां भगीरथ रखे कैद में अपनी ही ला गंगा का जल
 
हर दिन ऐसा पहले जैसा कोई भी तो हुआ नहीं सम
नया आज इतिहास लिखें हम
 
लिखें यहाँ पर प्रतिपादित थी नित ही नूतन परिव्हाषायें
जिसका जैसा मन उसने था वैसा ही निष्कर्ष निकाला
लिखें प्रतिष्ठा पा लेने की अभिनव आकाँक्षा पलती थीं
लिखें पूज्य वह हुआ किया हि जिसने बड़ा कोई घोटाला
 
आर्त्तनाद को ढक लेती थी लिखें यहाँ पायल की छम छम
नया आज इतिहास लिखें हम. 

Monday, September 24, 2012

तुम धड़कन में

तुम धड़कन में तुम सांसों में, अनगिन बार गया दुहराय
तुम तो मेरे कम्प्यूटर के चित्रपटल पर छाई रहती
कान्फ़्रेनस की कालें हो या मींटिन्ग हो या हो कम्यूटिन्ग
लगता है हर घड़ी पास तुम आकर मुझसे बातें करतीं
 
तुम ही रही वर्ड एक्सेल में और कैड* में चित्र तुम्हारे
डेटा प्रासेसिंग को मैने जब भी कोई फ़ायल खोली

Friday, February 10, 2012

कुछ पुराने पेड़ बाकी हैं अभी उस गांव में


हो गया जब एक दिन सहसा मेरा यह मन अकेला
कोई बीता पल लगा देने मुझे उस  पार हेला
दूर छूटे चिह्न पग के फूल बन खिलने लगे तो
सो गये थे वर्ष बीते एक पल को फिर जगे तो
मन हुआ आतुर बुलाऊँ पास मैं फ़िर वो दुपहरी
जो कटी मन्दिर उगे कुछ पीपलों की चाँव में
आ चुका है वक्त चाहे दूर फिर भी आस बोले
कुछ पुराने पेड़ हों शायद अभी उस गांव में
 
वह जहाँ कंचे ढुलक हँसते गली के मोड़ पर थे
वह जहाँ उड़ती पतंगें थीं हवा में होड़ कर के
गिल्लियाँ उछ्ला करीं हर दिन जहाँ पर सांझ ढलते
और उजड़े मन्दिरों में भी जहाँ थे दीप जलते
वह जहाँ मुन्डेर पर उगती रही थी पन्चमी आ
पाहुने बन कर उतरते पंछियों  की कांव में
चाहता मन तय करे फ़िर सिन्धु की गहराईयों को
कुछ पुराने पेड़ बाकी हों अभी उस गांव में
 
पेड़ वे जिनके तले चौपाल लग जाती निरन्तर
और फिर दरवेश के किस्से निखरते थे संवर कर
चंग पर आल्हा बजाता एक रसिया मग्न होकर
दूसरा था सुर मिलाता राग में आवाज़ बो कर
और वे पगडंडियां कच्ची जिन्हें पग चूमते थे
दौड़ते नजरें बचा कर हार पी कर दाँव में
शेष है संभावना कुछ तो रहा हो बिना बदले
कुछ पुराने पेड़ हों शायद अभी उस गांव में
 
वृक्ष जिनकी छांह  थी ममता भरे आँचल सरीखी
वृक्ष जिनके बाजुओं से बचपनों ने बात सीखी
वे कि बदले वक्त की परछाई से बदले नहीं थे
और जिनको कर रखें सीमित,कहीं गमले नहीं थे
वे कि जिनकी थपकियाँ उमड़ी हुई हर पीर हरती
ज़िंदगी सान्निध्य में जिनके सदा ही थी संवारती
है समाहित गंध जिनकी धड़कनों, हर सां स में
हाँ  पुराने पेड़ शाश्वत ही रहेंगे गाँव मब
वे पुराने पेड़ हर युग में रहेंगे गांव में

Thursday, February 9, 2012

जो लिखा था हाथ की रेखाओं में


प्रश्न हम सुलझा नहीं पाये कभी
जो लिखा था हाथ की रेखाओं में
और उसकी गुत्थियों को थाम कर
उत्तरों की राह में भटका किये

ज्ञान गीता का हमारे पास था
सत्य भी था माफ़लेषु का पता
वाधिकारस्ते हमें कर्मण्य है
सौंप कर हमको गया विश्वास था
किन्तु दर्पण की किसी परछाईम से
हम स्वयं को ही भ्रमित करते रहे
एक उजड़े और निर्जन पंथ में
बाल संध्यादीप को धरते रहे

राह में पग भी बढ़ाये, तो सदा
साथ अपने भोर का तारा लिये

भाग्य में जो है लिखा होगा वही
बन मलूकादास यह कहते रहे
जो हवा की झालरी आई निकट
उंगलियाँ उसकी पकड़ बहते रहे
ये ना सोचा एक पल को भी तनिक
और भी कुछ पृष्ठ हैं इस लेख के
काल की गतियां बदल सकते सहज
जोड़ कर निशचय स्वयं संकल्प से

बाँह में भर कर प्रतीक्षा रह गये
कल सुखद संदेश लायेम डाकिये

था भले सीमाओं का अपनी पता
जानते थे नभ पहुँच से दूर है
किन्तु अपने को छलावा दे कहा
दोष विधि का है, समय ही क्रूर है
ये नहीं स्वीकार पाये हम कभी
गंध रह सकती मिली झंझाओं में
हम उसी को शीश पर धरते रहे
जो लिखा था हाथ की रेखाओं में

ताक पर विज्ञान को लटका दिया
तर्क रख छोड़े उठा कर हाशिये