बरखा
किसी देवांगना के स्नात केशों से गिरे मोती
विदाई में अषाढ़ी बदलियों ने अश्रु छलकाए
किसी की पायलों के घुँघरुओं ने राग है छेड़ा
किसी गंधर्व ने आकाशमें पग आज थिरकाए
उड़ी है मिटि्टयों से सौंध जो इस प्यास को पीकर
किसी के नेह के उपहार का उपहार है शायद
चली अमरावती से आई हैयह पालकी नभ में
किसी की आस का बनता हुआ संसार है शायद
सुराही से गगन की एक तृष्णा की पुकारों को
छलकता गिर रहा मधु आज ज्यों वरदान इक होकर
ये फल है उस फसल का जोकि आशा को सँवारे बिन
उगाई धूप ने है सिंधु में नित बीज बो बो कर
- राकेश खंडेलवाल
5 सितंबर 2005
Monday, July 13, 2009
Tuesday, July 7, 2009
तुमने कहा न तुमको छेड़ा
तुमने कहा न तुमको छेड़ा कभी किसी ने ओ कुरूपिणे
इसीलिये छेड़ा है मैने तुमको सीटी एक बजाकर
हमदर्दी के कारण केवल कदम उठाया है ये सुन लो
अब ऐसा मत करना मेरे गले कहीं पड़ जाओ आकर
नहीं छेड़ती सुतली जैसी ज़ुल्फ़ तुम्हारी कभी हवा भी
बेचारी कोशिश करती है, लेकिन जुटा न पाती हिम्मत
एक बार चुनरी अटकी थी रेहड़ी से संकरी गलियों में
और किसी की हो पाती ये संभव हुआ नहीं है ज़ुर्रत
कोई पास तुम्हारे आकर खड़ा हो सके नामुमकिन है
जब तुम घर से निकला करती हो लहसुन की कली चबाकर
देह यष्टि का क्या कहना है, मिट्टी का लौंदा हो कोई
रखा हुआ ढेरी में जैसे कहीं चाक पर कुंभकार के
और तुम्हारी बोली की क्या बात कहूँ मैं शब्द नहीं हैं
संटी खाकर चीखा करता है भेंसा जैसे डकार के
मुँह को ढाँपे तुम्हें देख कर रात अमावस वाली शरमा
कोलतार ले गया तुम्हारे चेहरे से ही रंग चुरा कर
रहे चवन्नी छाप गली के जितने आशिक नजर चुराते
भूले से भी नहीं निगाहें नजर तुम्हारी से छू जायें
चमगादड़ सी आंखों वाली, कन्नी तुमसे सब ही काटें
तुम वह, जिसका वर्णन करती हैं डरावनी परी कथायें
नुक्कड पर बस एक तुम्हारी बातें होतीं भिन्डी-नसिके
साहस नहीं आईने का भी होता जाये सच बतलाकर
इसीलिये छेड़ा है मैने तुमको सीटी एक बजाकर
हमदर्दी के कारण केवल कदम उठाया है ये सुन लो
अब ऐसा मत करना मेरे गले कहीं पड़ जाओ आकर
नहीं छेड़ती सुतली जैसी ज़ुल्फ़ तुम्हारी कभी हवा भी
बेचारी कोशिश करती है, लेकिन जुटा न पाती हिम्मत
एक बार चुनरी अटकी थी रेहड़ी से संकरी गलियों में
और किसी की हो पाती ये संभव हुआ नहीं है ज़ुर्रत
कोई पास तुम्हारे आकर खड़ा हो सके नामुमकिन है
जब तुम घर से निकला करती हो लहसुन की कली चबाकर
देह यष्टि का क्या कहना है, मिट्टी का लौंदा हो कोई
रखा हुआ ढेरी में जैसे कहीं चाक पर कुंभकार के
और तुम्हारी बोली की क्या बात कहूँ मैं शब्द नहीं हैं
संटी खाकर चीखा करता है भेंसा जैसे डकार के
मुँह को ढाँपे तुम्हें देख कर रात अमावस वाली शरमा
कोलतार ले गया तुम्हारे चेहरे से ही रंग चुरा कर
रहे चवन्नी छाप गली के जितने आशिक नजर चुराते
भूले से भी नहीं निगाहें नजर तुम्हारी से छू जायें
चमगादड़ सी आंखों वाली, कन्नी तुमसे सब ही काटें
तुम वह, जिसका वर्णन करती हैं डरावनी परी कथायें
नुक्कड पर बस एक तुम्हारी बातें होतीं भिन्डी-नसिके
साहस नहीं आईने का भी होता जाये सच बतलाकर
Saturday, July 4, 2009
मैं कौन हूँ
पूछते वे रहे नाम मेरा है क्या
सोच मैं भी रहा हूँ कि मैं कौन हूँ
मैं अधूरी तमन्नाओं की नज़्म हूँ
याकि आधा लिखा रह गया गीत हूँ
जोकि इतिहास के पृष्ठ में बन्द है
पीढ़ियों की बनाई हुई रीत हूँ
प्रश्न करता रहा हर नया दिन यही
क्या है परिचय मेरा और क्या नाम है
एक साया हूँ मैं जेठ की धूप का
या कि उमड़ा नहीं वो जलद श्याम है
उत्तरों की लिये प्यास भटका किया
अपने स्वर को गंवा कर खड़ा मौन हूँ
सोच मैं भी रहा हूँ कि मैं कौन हूँ
उंगलियों ने जिसे तार को छेड़ कर
नींद से न उठाया वो आवाज़ हूँ
कैद सीने की गहराईयों में रहा
उम्र भर छटपटाता वही राज हूँ
मैं हूँ निश्चय वही पार्थ के पुत्र का
व्यूह को भेदने के लिये जो चला
मैं, जो तम की उमड़ती हुई आंधियाँ
रोकने के लिये दीप बन कर जला
जो अपेक्षायें आधी हैं चौथाई हैं
उनको पूरा किये जा रहा पौन हूँ
आप जानें, तो बतलायें मैं कौन हूँ
बिम्ब जो आईने में खड़े हो गये
अजनबी और भी अजनबी से लगे
जान पाने की कोशिश न पूरी हुई
बिम्ब वे अपने प्रतिबिम्ब से ही ठगे
सांस की वादियों में हवा में घुली
धड़कनों के बिलखते हुए शोर में
ढूँढ़ता मैं स्वयं को अभी तक रहा
हर ढली सांझ में हर सजी भोर में
गीत तो लिख दिया आपने था कहा
प्रश्न ्ये कह रहा जौन का तौन हूँ
सोच मैं भी रहा हूँ कि मैं कौन हूँ
सोच मैं भी रहा हूँ कि मैं कौन हूँ
मैं अधूरी तमन्नाओं की नज़्म हूँ
याकि आधा लिखा रह गया गीत हूँ
जोकि इतिहास के पृष्ठ में बन्द है
पीढ़ियों की बनाई हुई रीत हूँ
प्रश्न करता रहा हर नया दिन यही
क्या है परिचय मेरा और क्या नाम है
एक साया हूँ मैं जेठ की धूप का
या कि उमड़ा नहीं वो जलद श्याम है
उत्तरों की लिये प्यास भटका किया
अपने स्वर को गंवा कर खड़ा मौन हूँ
सोच मैं भी रहा हूँ कि मैं कौन हूँ
उंगलियों ने जिसे तार को छेड़ कर
नींद से न उठाया वो आवाज़ हूँ
कैद सीने की गहराईयों में रहा
उम्र भर छटपटाता वही राज हूँ
मैं हूँ निश्चय वही पार्थ के पुत्र का
व्यूह को भेदने के लिये जो चला
मैं, जो तम की उमड़ती हुई आंधियाँ
रोकने के लिये दीप बन कर जला
जो अपेक्षायें आधी हैं चौथाई हैं
उनको पूरा किये जा रहा पौन हूँ
आप जानें, तो बतलायें मैं कौन हूँ
बिम्ब जो आईने में खड़े हो गये
अजनबी और भी अजनबी से लगे
जान पाने की कोशिश न पूरी हुई
बिम्ब वे अपने प्रतिबिम्ब से ही ठगे
सांस की वादियों में हवा में घुली
धड़कनों के बिलखते हुए शोर में
ढूँढ़ता मैं स्वयं को अभी तक रहा
हर ढली सांझ में हर सजी भोर में
गीत तो लिख दिया आपने था कहा
प्रश्न ्ये कह रहा जौन का तौन हूँ
सोच मैं भी रहा हूँ कि मैं कौन हूँ
Thursday, June 25, 2009
नाम तुम्हारा आ जाता है
क्या बतलाऊँ कितना रोका है मैने अपना पागल मन
लेकिन होठों पर रह रह कर नाम तुम्हारा आ जाता है
उड़ती हुई कल्पनाओं ने देखा नहीं क्षितिज पर कोई
चित्र, स्वप्न बन कर वह लेकिन आंखों में आ छा जाता है
देहरी पर आकर रुक जाती है जब गोधूली की बेला
तब सहसा ही हो जाता है भावुक मन कुछ और अकेला
परिचय के विस्तारित नभ में दिखता नहीं सितारा कोई
लेकिन मन में लग जाता है अनचीन्ही सुधियों का मेला
एक अपरिचित सुर सहसा ही अपना सा, चिर परिचित होकर
कोई भूला हुआ गीत आ फिर से याद दिला जाता है
क्या बतलाऊँ कितना रोका है मैने अपना पागल मन
लेकिन होठों पर रह रह कर नाम तुम्हारा आ जाता है
दूरी के प्रतिमान सिमट कररह जाते हैं एक सूत भर
सब कुछ जैसे कह जाते हैं अधrरों के हो मौन रहे स्वर,
बैठा करते भावुकता के पाखी आ मन की शाखों पर.
तब संकल्प ह्रदय के जाते हैं उठती झंझा में बह कर
आंखों के आगे आकर के धुंआ कोई आकार बनाता
लगता है तुम हो, सहसा ही मन आनंदित हो जाता है
क्या बतलाऊँ कितना रोका है मैने अपना पागल मन
लेकिन होठों पर रह रह कर नाम तुम्हारा आ जाता है
रंग नहीं भर पाती कूची, रही अधूरी रेखाओं में
अनभेजे संदेसे घुल कर रह जाते सारे दिशाओं में
माना तुम हो दूर मगर यों पैठ गये गहरे अंतर में
अपना चित्र तलाशा करता मन, इतिहासिक गाथाओं में
लगता स्पर्श तुम्हारा है वह पंख एक झरता अम्बर से
और अचानक चातक सा मन नीर तॄप्ति का पा जाता है
क्या बतलाऊँ कितना रोका है मैने अपना पागल मन
लेकिन होठों पर रह रह कर नाम तुम्हारा आ जाता है
लेकिन होठों पर रह रह कर नाम तुम्हारा आ जाता है
उड़ती हुई कल्पनाओं ने देखा नहीं क्षितिज पर कोई
चित्र, स्वप्न बन कर वह लेकिन आंखों में आ छा जाता है
देहरी पर आकर रुक जाती है जब गोधूली की बेला
तब सहसा ही हो जाता है भावुक मन कुछ और अकेला
परिचय के विस्तारित नभ में दिखता नहीं सितारा कोई
लेकिन मन में लग जाता है अनचीन्ही सुधियों का मेला
एक अपरिचित सुर सहसा ही अपना सा, चिर परिचित होकर
कोई भूला हुआ गीत आ फिर से याद दिला जाता है
क्या बतलाऊँ कितना रोका है मैने अपना पागल मन
लेकिन होठों पर रह रह कर नाम तुम्हारा आ जाता है
दूरी के प्रतिमान सिमट कररह जाते हैं एक सूत भर
सब कुछ जैसे कह जाते हैं अधrरों के हो मौन रहे स्वर,
बैठा करते भावुकता के पाखी आ मन की शाखों पर.
तब संकल्प ह्रदय के जाते हैं उठती झंझा में बह कर
आंखों के आगे आकर के धुंआ कोई आकार बनाता
लगता है तुम हो, सहसा ही मन आनंदित हो जाता है
क्या बतलाऊँ कितना रोका है मैने अपना पागल मन
लेकिन होठों पर रह रह कर नाम तुम्हारा आ जाता है
रंग नहीं भर पाती कूची, रही अधूरी रेखाओं में
अनभेजे संदेसे घुल कर रह जाते सारे दिशाओं में
माना तुम हो दूर मगर यों पैठ गये गहरे अंतर में
अपना चित्र तलाशा करता मन, इतिहासिक गाथाओं में
लगता स्पर्श तुम्हारा है वह पंख एक झरता अम्बर से
और अचानक चातक सा मन नीर तॄप्ति का पा जाता है
क्या बतलाऊँ कितना रोका है मैने अपना पागल मन
लेकिन होठों पर रह रह कर नाम तुम्हारा आ जाता है
Thursday, May 14, 2009
अटक कर बैठ गई मैं संबोधन पर
ऐसा हुआ कि जब गीतकलश पर गीत आया था " लेकिन सम्बोधन पर " तो उसके आधार पर कई मित्रों ने अपने अपने ढंग से कलम चलाई. तो फिर उसी क्रम में दूसरा गीत लिखा गया.
दूसरे गीत के बाद से कई मित्रों के तकाजे हुए कि सिक्के का दूसरा पहलू भी दर्शाया जाये. अतएव यह पंक्तियाँ समर्पित हैं :-
मैने जब यह चाहा लिख दूँ पत्र प्रेम में भीगा तुमको
जाने क्या होगया अटक कर बैठ गई मैं संबोधन पर
जो चूल्हे पर चढ़ी दाल में उफ़ना है, तुम वही झाग हो
काकदूत के स्वर में गूँजा सुबह शाम जो वही राग हो
असमंजस है क्या कह कर मैं तुमको कोई सम्बोधन दूँ
जोकि पतीले के पैंदे में चिपका जलकर वही साग हो
आत्मसमर्पण किया कलम ने आंसू बहा और क्रन्दन कर
लिख न पाई पत्र तुम्हें, मैं अटकी केवल संबोधन पर
लिखूँ तुम्हें फ़ुटबाल गेम के लास्ट प्ले पर होता फ़ंबल
या फिर पहले से निर्धारित डब्लू एफ़ का कोई दंगल
फिर यह सोचा तुम्हें बुलाऊं मैं कह कर वह प्रेम पुजारी
अपने गले लगा कर रखती रही सदा ही जिसको चम्बल
लिख दूं तुमको घना कुहासा जो छाया रहता लंदन पर
निर्णय कोई ले न सकी मैं अटक गई हूँ संबोधन पर
फिर ये चाहा लिखूँ रेत के मरुथल में तुम उठे बगूले
तुम हो ठुड्डी जिसे भाड़ में छोड़ गये मक्की के फूले
फ़ास्ट फ़ूड्श के साथ मिला जो मुझको तुम क्या वही नेपकिन
या फिर हो वो पैनी जिसको गिरा जेब से सब ही भूले
तुम अंधड़ हो जो आ कर घिरने लग जाता है मधुवन पर
सर में दर्द हो गया मेरे अटके अटके सम्बोधन पर.
दूसरे गीत के बाद से कई मित्रों के तकाजे हुए कि सिक्के का दूसरा पहलू भी दर्शाया जाये. अतएव यह पंक्तियाँ समर्पित हैं :-
मैने जब यह चाहा लिख दूँ पत्र प्रेम में भीगा तुमको
जाने क्या होगया अटक कर बैठ गई मैं संबोधन पर
जो चूल्हे पर चढ़ी दाल में उफ़ना है, तुम वही झाग हो
काकदूत के स्वर में गूँजा सुबह शाम जो वही राग हो
असमंजस है क्या कह कर मैं तुमको कोई सम्बोधन दूँ
जोकि पतीले के पैंदे में चिपका जलकर वही साग हो
आत्मसमर्पण किया कलम ने आंसू बहा और क्रन्दन कर
लिख न पाई पत्र तुम्हें, मैं अटकी केवल संबोधन पर
लिखूँ तुम्हें फ़ुटबाल गेम के लास्ट प्ले पर होता फ़ंबल
या फिर पहले से निर्धारित डब्लू एफ़ का कोई दंगल
फिर यह सोचा तुम्हें बुलाऊं मैं कह कर वह प्रेम पुजारी
अपने गले लगा कर रखती रही सदा ही जिसको चम्बल
लिख दूं तुमको घना कुहासा जो छाया रहता लंदन पर
निर्णय कोई ले न सकी मैं अटक गई हूँ संबोधन पर
फिर ये चाहा लिखूँ रेत के मरुथल में तुम उठे बगूले
तुम हो ठुड्डी जिसे भाड़ में छोड़ गये मक्की के फूले
फ़ास्ट फ़ूड्श के साथ मिला जो मुझको तुम क्या वही नेपकिन
या फिर हो वो पैनी जिसको गिरा जेब से सब ही भूले
तुम अंधड़ हो जो आ कर घिरने लग जाता है मधुवन पर
सर में दर्द हो गया मेरे अटके अटके सम्बोधन पर.
Sunday, May 10, 2009
माँ
चाहता था लिखूँ शब्द माँ के लिये
लेखनी एक भी किन्तु पा न सकी
जितनी ममता उमड़ गोद में है गिरी
सिन्धु से व्योम तक वह समा न सकी
ज़िन्दगी, ज्ञान, उपलब्धियाँ, प्राप्ति सब
एक वह ही रही सबका आधार है
सरगमों ने समर्पण उसे कर दिया
रागिनी कोई भी गुनगुना न सकी
शब्द अक्षम हुए कुछ भी बोले नहीं
स्वर झुका शीश अपना नमन कर रहा
भाव कर जोड़ कर आंजुरि भर सुमन
भावना के, पगों के कमल धर रहा
तेरे आशीष का छत्र छाया रहे
शीश पर हर घड़ी , बस यही कामना
आज नव सूर्य में, आज नव भोर में
यह अपेक्षा पुन: आज मैं कर रहा
राकेश
१० मई २००९
लेखनी एक भी किन्तु पा न सकी
जितनी ममता उमड़ गोद में है गिरी
सिन्धु से व्योम तक वह समा न सकी
ज़िन्दगी, ज्ञान, उपलब्धियाँ, प्राप्ति सब
एक वह ही रही सबका आधार है
सरगमों ने समर्पण उसे कर दिया
रागिनी कोई भी गुनगुना न सकी
शब्द अक्षम हुए कुछ भी बोले नहीं
स्वर झुका शीश अपना नमन कर रहा
भाव कर जोड़ कर आंजुरि भर सुमन
भावना के, पगों के कमल धर रहा
तेरे आशीष का छत्र छाया रहे
शीश पर हर घड़ी , बस यही कामना
आज नव सूर्य में, आज नव भोर में
यह अपेक्षा पुन: आज मैं कर रहा
राकेश
१० मई २००९
Monday, April 27, 2009
कह गई आकर हवा
केतकी वन, फूल उपवन, प्रीत मन महके
सांझ आई बो गई थी चाँदनी के बीज
रात भर तपते सितारे जब गये थे सीज
ओस के कण, पाटलों पर आ गये बह के
कह गई आकर हवा जब एक मीठी बात
भर गया फिर रंग से खिल कर कली का गात
प्यार के पल सुर्ख होकर गाल पर दहके
कातती है गंध को पुरबाई ले तकली
बादलों के वक्ष पर शम्पाओं की हँसली
कह रही है भेद सारे मौन ही रह के
सांझ आई बो गई थी चाँदनी के बीज
रात भर तपते सितारे जब गये थे सीज
ओस के कण, पाटलों पर आ गये बह के
कह गई आकर हवा जब एक मीठी बात
भर गया फिर रंग से खिल कर कली का गात
प्यार के पल सुर्ख होकर गाल पर दहके
कातती है गंध को पुरबाई ले तकली
बादलों के वक्ष पर शम्पाओं की हँसली
कह रही है भेद सारे मौन ही रह के
Subscribe to:
Posts (Atom)
