Monday, May 1, 2017

कितनी बार लिखे हैं तुमने पगडंडी पर पग से अक्षर
कितनी बार खेत की मेंड़ों पर तुमने हैं चित्र बनाये
कितनी बार भरी है तुमने जा पनघत पर कोई गागर
कितनी सांझ बैठ चुपालों पर तुमने हैं गीत सुनाये

कितनी बार कहो थापे हैं तुमने उपले गोबर लेकर
कितनी बार जलाया चूल्हा ले गीली लकड़ी बबूल की
पौ फ़टने से पहले तुमने कितनी बार चलाई चक्की
कितनी बार चढ़ाई तुमने ढिबरी उतरी हुई चूल की

कितनी बार करी है तुमने बतलाना तो जरा निराई
कितनी बार बीज बोये हैं देख देख कर तुमने तारे
कितनी बार समझ पाये तुम अंतर गाजर में मूली में
कितनी बार खेत देखे हैं तुमने उठ कर सुबह सकारे

प्रगतिशील ओ लेखक तुम जो जन प्रतिनिधि अपने को कहते
कितनी बार जुड़े हो जाकर तुम जो सच में जन है उससे
सोफ़ेपर बैठे सिगार सुलगा दुहाई देते गांवों की
कितनी बार बताना तुम जेठी दोपहरिया में हो झुलसे

कितनी बार लगाते नारा ये जो मुम्बई सकल आमची
किन्तु कहो क्या कभी आमची की परिभाषा जान सके हो
अपने को तुम जिसका वंशज कहते हो इतना बतलाना
उसकी एक देश की सता का मतलब पहचान
​ ​
 सके हो

खींच रहे हो जाति धर्म की भेद भाव की जो रेखायें
सुनो तुम्हारी खातिर वे ही बन जायेंगी लक्ष्मण रेखा
संभला हुआ समय अजगर बन तुम्हें निगलने को आतुर है
किन्तु दॄष्टि की सीमा में बंध तुम कर रहे उसे अनदेखा

नहीं काठ की हांड़ी फिर से चढ़े
​ अंगीठी पर यह सुन लो
फ़ूँक फ़ूँक कर छाछ पियेगा जिसे दूध ने जला दिया है
सोने और मुलम्मे वाली पीतल में अन्तर कितना है
तुम्हें ज्ञात ये नहीं तुम्हीं ने सचमुच सबको सिखा दिया है

--
राकेश खंडेलवाल

Monday, April 17, 2017

क्या हाथों की रेखा में

लिखा हुआ है ​क्या हाथों की रेखा में
इस भाषा को कौन कहो पढ पाया है
रेखाओ के रेखगणित के अंकों का
शब्दजाल किसने कितना सुलझाया है 

कोई देखे सारणियों के चौघड़िए
कोई पाखी से चिट्ठी को छंटवाये
आगे हाथ पसारे किसी सयाने के
कोई घटा बढ़ी को फिर फिर जुड़वाए

करे पहेली से कितनी माथापच्ची
लेकिन छोर कही पर नजर न आया है

​हाथों​
 की रेखा से जोड़ी है कितनी
बारह खानों के नक्षत्रो की गतियां
ज्योतिष से, पंडित से ज्ञानी ध्यानी से
हर इक बार मांगते आये सम्मतियाँ

आसेबो के सायों की आशंका को
गंडों
​ और तावीज़ों​
 में बंधवाया है

हर कोई ढूंढें हाथों की रेखा में
कहाँ प्रगति
​ उन्नति​
 सीढ़ी का छिपा सिरा
दरगाहों के मन्नत वाले धागों में
बंधा हुआ खुल जाए भाग्य अगर ठहरा

सातों दिन मंदिर की मूरत के आगे
शीश झुकाकर कितना भोग लगाया है

किसे 
​पता 
है रेख कौन सी हाथों की
कि
​से 
पतंग बना
​, ​
 दे नभ की ऊंचाई
रेख कौन सी भोर करे नित आँगन में
किसकी करवट बन जाती है कजराई

​है तिलिस्म से बंधा लेख यह विधना का
देव-मनुष्य कोई भी समझ ना पाया है 

Friday, July 1, 2016

किरणें जिनके द्वार न आई


अर्घ्य चढ़ा कर मंत्र बोल कर सूरज चन्दा को आराधो
जितना चाहो इष्ट बनाकर सुबह शाम रजनी में साधो
भूलो नहीं, दीप ने देखी  नहीं कभी अपनी परछाई
सत्ता में वे कुटियां भी हैं किरणें जिनके द्वार न आई

खुली पलकने बुनी निरंतर एक प्रतीक्षा उजियारे की
रातें रही जगाती आशा उत्तर के चमके तारे की
​देते रहे दिलासे सपने पाहुन अँधियारा पल भर का
लेकिन रही  आस ही जलती एक बार फिर अंगारे सी

रही अपरिचित इन गलियो से प्राची की बिखरी अरुणाई
और यहीं पर है वे कुटियों किरणें जिनके द्वार न आई

युग बीते पर जीवन अब भी चला जहां पर घुटनो के बल
किरच तलक भी अभिलाषा की देती नहीं जहाँ आ सम्बल
जहा धरा नभ् सब लिपटे हैं घनी अमावस के साये में
जहां समय ने आकर बदला नहीं आज में, बीत गया कल

उन राहों पर प्रश्न सहमते उत्तर ने भी नजर चुराईं
शायद कोई बतला पाये क्यों कर किरणें द्वार न आई

उजियारे के अधिकारी हैं वे भी उतने, जितने तुम हम
दोषी तो हैं सूरज चन्दा, हारे देख तिमिर का दम ख़म
चलो उगाये नव वितान में एक नया सूरज हम मिलकर
ताकि रहे न शेष कही पर अंश मात्र भी छुप करके तम


नए पृष्ठ पर वक्त लिखे आ जहां न कल तक आई किरणें
उन द्वारों पर उतरी ऊषा ​लिय करे    पहली अंगड़ाई 

Wednesday, June 29, 2016

अचल रहे संकल्प, विकल्पों पर विचार का समय नहीं है


अचल रहे संकल्प, विकल्पों पर विचार का समय नहीं है 
हुई व्यवस्था ही प्रधान, जो करे व्यवस्था अभय नहीं है

अभय दान जो मांगा करते उन हाथों में शक्ति नहीं है
पाना है अधिकार अगर तो कमर बांध कर लड़ना होगा
कौन व्यवस्था का अनुयायी? केवल हम हैं या फिर तुम हो
अपना हर संकल्प हमीं को अपने आप बदलना होगा
मूक समर्थन कृत्य हुआ है केवल चारण का भाटों का
विद्रोहों के ज्वालमुखी को फिर से हमें जगाना होगा
रहे लुटाते सिद्धांतों पर और मानयताओं पर् अपना
सहज समर्पण कर दे ऐसा पास हमारे ह्रदय नहीं है

अपराधी है कौन दशा का ? जितने वे हैं उतने हम है
हमने ही तो दुत्कारा है मधुमासों को कहकर नीरस
यदि लौट रही स्वर की लहरें कंगूरों से टकरा टकरा
हम क्यों हो मौन ताकते हैं उनको फिर खाली हाथ विवश
अपनी सीमितता नजरों की अटकी है चौथ चन्द्रमा में
रह गयी प्रतीक्षा करती ही द्वारे पर खड़ी हुई चौदस
दुर्गमता से पथ की डरकर जो ्रहे नीड़ में छुपा हुआ
र्ग गंध चूमें आ उसको, ऐसी कोई वज़ह नहीं है

द्रोण अगर ठुकरा भी दे तो एकलव्य तुम खुद बन जाओ
तरकस भरा हुआ है मत का, चलो तीर अपने संधानो
बिना तुम्हारी स्वीकृति के अस्तित्व नहीं सुर का असुरों का
रही कसौटी पास तुम्हारे , अन्तर तुम खुद ही पहचानो
पर्वत, नदिया, वन उपवन सब गति के सन्मुख झुक जाते हैं
कोई बाधा नहीं अगर तुम निश्चय अपने मन में ठानो
सत्ताधारी हों निशुम्भ से या कि शुम्भ से या रावण से
बतलाता इतिहास राज कोई भी रहता अजय नहीं है.

Tuesday, June 28, 2016

चेतन का संक्रातिकाल है


कातर मन उठ! और थाम ले जो सन्मुख जलती मशाल है
भूल नहीं पल भर को भी यह चेतन का संक्रातिकाल है

गली व्यवस्था को उखाड़ना जड़ से है हाथों में तेरे
तेरा निश्चय ले आएगा परिवर्तन के नए सवेरे
हिले नहीं तेरा अंगदपग निष्ठां पूरी से जो रोपे
हो जाएंगे सभी तिरोहित तेरे पथ में घिरे अँधेरे

उत्तर दे! तेरी साँसों का जो तुझसे जलता सवाल है
भूल नहीं यह पल भर को भी चेतन का संक्रातिकाल है

जितनी चाहे। कर शिकायते  कुछ बदलाव नहीं आएगा
जब तक तू अपने निश्चय को फौलादी न कर पायेगा 
सावित्री के संकल्पों को यदि अपना आधार बना ले
क्या हस्ती भ्रष्टाचारी की,, स्वयं काल भी झुक जाएगा  

दुहरा देख तनिक मिलती इतिहासों में जिसकी मिसाल है
भूल नहीं पल भर को भे एयह चेतन का संक्रान्तिकाल है

जरासन्ध से शिशुपालों की सत्ता कितनी देर टिकी है
धुन्ध सूर्य की प्रखर रश्मियां, आखिर कितनी देर ढकी है
हो हताश मत, कर स्वतंत्र तू अपने चिन्तन को अनुरागी
तुझे विदित परिवर्तन की गति, रोके से भी नहीं रुकी है


रोक न उसको धधक रही जो अन्तर्मन में एक ज्वाल है
भूल नहीं पल भर को भी यह चेतन का संक्रान्तिकाल है

Monday, February 16, 2015

इसलिए आओ हृदय में

नयन ने दिन रात दीपक इक प्रतीक्षा के जलाये
होंठ ने तव नाम सरगम में पिरो कर गीत गाये
साधना के मंत्र रह रह कर तुम्हें उच्चारते है
इसलिए आओ हृदय में, प्यास प्यासी रह न जाए

ज़िंदगी के कक्ष में बढ़ती हुई एकाकियत की
आँधियों में घिर रहा है पूर्ण यह अस्तित्व मेरा
रूप की खिलती हुई जब धूप का सान्निध्य पाउन
सहज ही मिट जाएगा बढता हुआ गहरा अन्धेरा
हर अलक्षित कल्पना के बंधनों को काट आओ
गंध में कस्तूरियों की ताकि मन न छटपटाये
 
ला रहीं पुरबाइयां चन्दन महक अँगनाई द्ववारे
कह रही हैं तुम अगोचर हो भले ,पर पास में हो
मैं तुम्हें अनुभूतियों की गोद में महसूसता हूँ
तुम गगन में रंग जैसे, सांस के विश्वास में हो
केंद्र हो तुम, लक्ष्य हो तुम ध्येय तुम हो अंत तक का
इसलिए आओ हृदय में साध हो सम्पूर्ण जाए
 
सिंधु की लहरें उमड़ती तीर आकर लौट जाती
सौंप कर सिकताओं को कुछ शंख सीपी अंजलि में
मैं विरूपित पुष्प बन कर एक सिकता कण खड़ा हूँ
प्राप्ति की अविरल सुधायें डाल दो कुछ पंखुरी में
 
उठ रहे झंझा झकोरे ताकि मन ना डगमगायें
इसलिये आओ ह्रदय में अर्थ नव सम्बन्ध पाये

Monday, February 9, 2015

मोगरे के फूल पर थी चांदनी सोई हुई



भोर की ले पालकी आते दिशाओं के कहारों 
के पगों की चाप सुनते स्वप्न में खोई हुई 
नीम की शाखाओं से झरती तुहिन की बूँद पीकर 
मोगरे के फूल पर थी चांदनी सोई हुई 
 
पूर्णिमा में ताज पर हो 
छाँह तारों की थिरकती 
याकि जमाना तीर पर हो 
आभ रजती रास करती 
झील नैनी में निहारें 
हिम शिखर प्रतिबिम्ब अपना 
हीरकणियों में जड़ित 
इक रूप की छाया दमकती 
 
दूध से हो एक काया संदली धोई हुई 
मोगरे के फूल पर थी चांदनी सोई हुई 
 
वर्ष के बूढ़े थके हारे 
घिसटते पाँव रुककर 
देखते थे अधनिमीलित 
आँख से वह रूप अनुपम
आगतों की धुन रसीली 
कल्पना के चढ़ हिंडोले
छेड़ती थी सांस की 
सारंगियों पर कोई सरगम
 
मोतियों की क्यारियों में रागिनी बोई हुई 
मोगरे के फूल पर थी चांदनी सोई हुई 
 
एक पंकज पर सिमट कर 
क्षीर सागर आ गया हो 
खमज,जयवंती कोई
हिंडोल के सँग गा गया हो 
देवसलिला  तीर पर 
आराधना में हो निमग्ना 
श्वेत आँचल ज्योंकि  प्राची का 
तनिक लहरा गया हो 
 
या कहारों ने तुषारी, कांवरी ढोई  हुई 
मोगरे के फूल पर थी चांदनी सोई हुई 
 
सो, का हो अर्क आकर
घुल गया वातावरण में
कामना की हों उफानें 
कुछ नै अंत:करण  में 
विश्वमित्री भावनाओं का
करे खण्डन  समूचा 
रूपगर्वित मेनका के 
आचरण के अनुकरण में 
 
पुष्पधन्वा के शरों  में टाँकती कोई सुई 
मोगरे के फूल पर है चांदनी सोई हुई