Friday, June 8, 2007

अनाड़ी शायर

क्या रदीफ़-ए-गज़ल, काफ़िया, क्या बहर, हम न जाने कभी, हम अनाड़ी रहे
सल्तनत शायरी की बहुत है बड़ी और हम एक अदना भिखारी रहे
फिर भी जब बात बारीकियों की चले , ज़िक्र हो जब भी इज़हार-ए-अंदाज़ का
तो यकीं है हमें ओ मेरे हमसुखन ! तेरे लब पे बयानी हमारी रहे

2 comments:

Udan Tashtari said...

कहीं पर निगाहें, कहीं पर निशाना-भाई जी. :) कौन आ गया रडार में...हा हा!! बेहतरीन!!

मोहिन्दर कुमार said...

मैं भी समीर जी का सवाल दोहराना चाहूंगा :)