Saturday, July 4, 2009

मैं कौन हूँ

पूछते वे रहे नाम मेरा है क्या
सोच मैं भी रहा हूँ कि मैं कौन हूँ

मैं अधूरी तमन्नाओं की नज़्म हूँ
याकि आधा लिखा रह गया गीत हूँ
जोकि इतिहास के पृष्ठ में बन्द है
पीढ़ियों की बनाई हुई रीत हूँ
प्रश्न करता रहा हर नया दिन यही
क्या है परिचय मेरा और क्या नाम है
एक साया हूँ मैं जेठ की धूप का
या कि उमड़ा नहीं वो जलद श्याम है

उत्तरों की लिये प्यास भटका किया
अपने स्वर को गंवा कर खड़ा मौन हूँ
सोच मैं भी रहा हूँ कि मैं कौन हूँ

उंगलियों ने जिसे तार को छेड़ कर
नींद से न उठाया वो आवाज़ हूँ
कैद सीने की गहराईयों में रहा
उम्र भर छटपटाता वही राज हूँ
मैं हूँ निश्चय वही पार्थ के पुत्र का
व्यूह को भेदने के लिये जो चला
मैं, जो तम की उमड़ती हुई आंधियाँ
रोकने के लिये दीप बन कर जला

जो अपेक्षायें आधी हैं चौथाई हैं
उनको पूरा किये जा रहा पौन हूँ
आप जानें, तो बतलायें मैं कौन हूँ

बिम्ब जो आईने में खड़े हो गये
अजनबी और भी अजनबी से लगे
जान पाने की कोशिश न पूरी हुई
बिम्ब वे अपने प्रतिबिम्ब से ही ठगे
सांस की वादियों में हवा में घुली
धड़कनों के बिलखते हुए शोर में
ढूँढ़ता मैं स्वयं को अभी तक रहा
हर ढली सांझ में हर सजी भोर में

गीत तो लिख दिया आपने था कहा
प्रश्न ्ये कह रहा जौन का तौन हूँ
सोच मैं भी रहा हूँ कि मैं कौन हूँ

7 comments:

Udan Tashtari said...

गीत तो लिख दिया आपने था कहा
प्रश्न ्ये कह रहा जौन का तौन हूँ
सोच मैं भी रहा हूँ कि मैं कौन हूँ

-बहुत सुन्दर रचना..आनन्द आ गया. बधाई!!

M VERMA said...

बहुत सुन्दर रचना

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

रचना सुन्दर है,
परन्तु आज तक कोई नही जान पाया कि,
मैं कौन हूँ?

Nirmla Kapila said...

आशीश् जी आपका ये ब्लोग तो मुझे पता ही नहीं था आप इतना अच्छा लिखते हैं मैं तो अब तकितनी उत्कृश्ट रचनाओं से वंचित रही अन्तर मन मे डूब कर लिखी गयी अद्भुत रचना
उंगलियों ने जिसे तार को छेड़ कर
नींद से न उठाया वो आवाज़ हूँ
कैद सीने की गहराईयों में रहा
उम्र भर छटपटाता वही राज हूँ
मैं हूँ निश्चय वही पार्थ के पुत्र का
व्यूह को भेदने के लिये जो चला
मैं, जो तम की उमड़ती हुई आंधियाँ
रोकने के लिये दीप बन कर जला
ऐसी रचना लिखने वाली कलम को मेरा नमन्

ओम आर्य said...

sundar abhiwyakti ...........badhaaee

Shardula said...

कैद सीने की गहराईयों में रहा
उम्र भर छटपटाता वही राज हूँ
मैं हूँ निश्चय वही पार्थ के पुत्र का
व्यूह को भेदने के लिये जो चला
मैं, जो तम की उमड़ती हुई आंधियाँ
रोकने के लिये दीप बन कर जला

Vinod said...

अगर आप सचमुच यह जानना चाहते हैं की " मैं कौन हूँ ? " तो मैं आपकी मदद कर सकता हूँ।

मैनें आपके प्रशन ' मैं कौन हूँ ? " के उत्तर अपने ब्लॉग http://mainhoshhoon.blogspot.com पर दिए हैं।

अगर फिर भी आप संतुष्ट न हों तो मुझे kad.vinod@gmail.com पर और सवाल पूछ सकते हैं।