Monday, March 24, 2008

अब होली की उमंग थी या तरंग

रूप वर्णन --दूसरा पहलू.

अब होली की उमंग थी या तरंग. पता नहीं कैसे एक परछाईं सी बनी कल्पना आ गई और हाथ में कलम देकर लिखवा गई. जो कुछ उस कल्पना ने कहा, बिना किसी तोड़ मोड़ के प्रस्तुत है

कलाकार हे, शिल्पकार हे, नमन करो स्वीकार हमारा

बाद रामलीला के उखड़े पड़े हुए ढेरे में तम्बू
ले खराब इंजन को पथ में खड़े हुए टूटे बुलडोजर
तुम अमोनिया वाली खादों के इक फ़टे हुए बोरे से
जमा गैस के लिये किया जो गया कुंड में, तुम वो गोबर

तुम अनंग के उबटन के अवशेषों की कोई प्रतिमा हो
नमन करो स्वीकार हमारा

यज्ञकुंड में बाद हवन के बचे हुए कोयले के चूरे
जमे पतीली के पैंदे में जल जल कर, तुम हो वो छोले
पड़ी हजारों बार शीष पर, घिसी हुई चप्पल के तलवे
और तुम्ही हो चुल्लू भर पानी में भीग बुझे जो शोले

तुम कीचड़ से भरे कुंड में खड़ी भैंस का इक सपना हो
नमन करो स्वीकार हमारा

तुम ड्राउअर के लिन्ट त्रैप में जमा हुई दस दिन की पूँजी
बदला गया तेल के संग जो, गाड़ी के इंजन का फ़िल्टर
अरे मदन-सुत ! शब्द नहीं हैं करूँ रूप का कैसे वर्णन
जो पथ की कर रहा मरम्मत, बिट्यूमैन का तुम्ही बायलर

तुम हो अतुल तुम्ही अपरिम हो,ऐसी सॄष्टा की रचना हो
नमन करो स्वीकार हमारा

2 comments:

सुनीता शानू said...

वाह राकेश जी क्या वर्णन किया है रूप का...
बाद रामलीला के उखड़े पड़े हुए ढेरे में तम्बू
ले खराब इंजन को पथ में खड़े हुए टूटे बुलडोजर
तुम अमोनिया वाली खादों के इक फ़टे हुए बोरे से
जमा गैस के लिये किया जो गया कुंड में, तुम वो गोबर

तुम अनंग के उबटन के अवशेषों की कोई प्रतिमा हो
:) :) :) ...

neeshoo said...

राकेश जी , सही बात रखी है आपने,समय के साथ सब बदल जाता है।