Tuesday, May 15, 2007

ग़ज़ल बन गई

आपकी दॄष्टि का जो परस मिल गया, फूल की एक पांखुर कमल बन गई
आपका हाथ छूकर मेरे हाथ में भाग्य की एक रेखा अटल बन गई
शब्द की यह लड़ी जो रखी सामने, हो विदित आपको यह कलासाधिके
आपके पग बँधी थी तो पायल रही, मेरे होठों पे आई गज़ल बन गई

7 comments:

sunita (shanoo) said...

बहुत-बहुत बधाई!
गीतकार जी आपकी गजल बहुत सुंदर हैं बहुत अच्छे ढंग से आपने प्रेयसी की खूबसूरती का बखान किया है,..
सुनीता(शानू)

मोहिन्दर कुमार said...

राकेश जी
आपके ख्याल का कायल हूँ मैँ.. क्या बात कही है

"आपके पग बँधी थी तो पायल रही, मेरे होठों पे आई गज़ल बन गई"

sajeev sarathie said...

शब्द की यह लड़ी जो रखी सामने,
हो विदित आपको यह कलासाधिके
आपके पग बँधी थी तो पायल रही,
मेरे होठों पे आई गज़ल बन गई

वाह राकेश जी .... बूँद सागर से मिली तो सागर बन गयी .... सुन्दर अति सुन्दर ...

Udan Tashtari said...

बहुत गजब का ख्याल...क्या बात है. वाह!!

Divine India said...

बनती है गज़ल अहसासों से और यहाँ तो जज्बात भी हैं अरमान भी और्…आपका कयामत बिखेड़ता अंदाज भी…बहुत ख़ुब राकेश भाई…।

परमजीत बाली said...

राकेश खंडेलवालजी,बहुत अच्छा लिखते है आप।बधाई।

Reetesh Gupta said...

शब्द की यह लड़ी जो रखी सामने, हो विदित आपको यह कलासाधिके
आपके पग बँधी थी तो पायल रही, मेरे होठों पे आई गज़ल बन गई


बहुत खूब राकेश ....आनंद आ गया पढ़कर ....बधाई