Friday, April 25, 2008

हूँ अजीम मैं शायर, मैं हूँ महाकवि

हूँ अजीम मैं शायर, मैं हूँ महाकवि
आप भले मानें इसको या न मानें

मुझको क्या लेना रदीफ़ से, वज़्नों से
किसे काफ़िया कहते हैं ये पता नहीं
बहर नहीं होती कलाम में जो मेरे
इसमें मेरी तो थोड़ी भी खता नहीं
आप इसे समझें चाहे या न समझें
मैं जो लिखता, गज़ल वही बस होती है
और नज़्म की बात आपको क्या बोलूँ
वो तो मेरे पैताने पर सोती है

मेरा हर अशआर लिखा जाता केवल
अकल आपमें कितनी है, ये अजमाने

मुक्तक कहें रुबाई या कताअ कह लें
मुझको कोई फ़र्क नहीं पड़ पाता है
मैं चुटकुले चुरा कर जो लिख देता हूँ
नहीं गांठ से मेरा कुछ भी जाता है
आप अगर न माने मैं हूँ महाकवि
अपनी कलम रहूँगा घिसता कविता पर
आप न जब तक साष्टांग हो करें नमन
रोज आपके पास लाउंगा कुछ लिख कर

मैं उन सब में पहले नंबर पर आया
बुद्धिमता से गईं नवाजी सन्तानें

छंद, गीत, दोहे, कुण्डलियाँ महाकाव्य
सब मेरी छोटी उंगली के हैं अनुयायी
जिसे अकविता कहते, या कविता नूतन
वह तो मेरी प्राण प्रिया है सुखदायी
मैं कवित्त की एक पंक्ति में ले सोलह

दूजी में छत्तीस शब्द बिठलाता हूँ
जिनको नंदन कहा गया बैसाखों के
हर्षित होते हैं, जब जब मैं गाता हूँ

सरगम, घर के पिछवाड़े में रहती है
नित उसको सिखलाता हूँ नूतन तानें

मेरा लोहा जो न माने नहीं कहीं
मुझको देकर फ़ीस, लोग बिठलाते हैं
मांये कहती हैं बच्चों को, चुप होले
देख महाकवि, वरन द्वार पर आते हैं
मैं भाषा का सेवक बिना बुलाये ही
स्वयं पहुंच जाता हूँ हर सम्मेलन में
पिटने की आदत है इतनी, फ़र्क नहीं
दिखता है अंडे, जूते मैं बेलन में

मेरी एक लेखनी में हैं छिपी हुई
लेखन की हर एक विधा की
दस खानें

7 comments:

Lavanyam - Antarman said...

कविवर राकेश जी,
वाह ! आप कितना अच्छा लिखते हैँ ये तो हम बहुत पहले से जानते हैँ और आज्, यहाँ भी वही दमक रहा है !
खूब लिखेँ ..
स्नेह्,

लावन्या

नीरज गोस्वामी said...

राकेश जी
कल अपनी वाणी और आज लेखनी से रूबरू होने का मौका दिया आपने, लगा जैसे अंधे को दो आँखे दे दी हों. आप की लेखनी में दस क्या असंख्य खाने छुपी हुई हैं. बहुत धारदार व्यंग रचना है चोट भी देते हैं और घाव भी नहीं बनता...भाई वाह...क्या अनूठी विधा है...बहुत प्रभावशाली रचना...आप ने जिन महा कवियों और साहित्य के शूर वीरों का जिक्र किया है उनसे बच के रहना पड़ेगा...
नीरज

डॉ.सुभाष भदौरिया. said...

राकेशजी आपकी रचनायें पढ़ता रहा हूँ शिल्प की कसावट,भाषा,प्रतीक का सौन्दर्य सभी कुछ आपकी रचना में पाया पर कुछ कह न सका.
आज आपकी रचना में यथार्थ का रंग,व्यंग्य की चोट मुझे रोक न सकी,थोड़ी सी आपकी नज़र उन बेबस,मुफ़लिस लोगों की तरफ भी पड़ जाय जो मर मर कर जी रहे हैं पर हारे नहीं है.आमीन.
बकौले दुष्यन्तकुमार
इस नदी की धार में ठंडी हवा आती तो है.
नाव जर्जर ही सही लहरों से टकराती तो है.

रंजू said...

आपका लिखा लाजवाब कर देता है

मेरी एक लेखनी में हैं छिपी हुई
लेखन की हर एक विधा की दस खानें
..बहुत ही सुंदर और सही लिखा है राकेश जी ..

anuradha srivastav said...

राकेश जी सुंदर और सही लिखा है .

राजीव रंजन प्रसाद said...

पैने व्यंज्ञ में गीत जो आपकी कलम की सशक्तता है बढ कर बस वाह ही निकलती है...

*** राजीव रंजन प्रसाद

कंचन सिंह चौहान said...

hey bhagvaan...ye hamjaise nav kaviyo.n ka blog padh kar vyangya likha hai kya manyavar
मैं कवित्त की एक पंक्ति में ले ओलह
दूजी में छत्तीस शब्द बिठलाता हूँ
ye sab to meri hi kavita me ho jata hai... kya kare..!