Wednesday, July 28, 2010

कविता करना तेरे बस की बात नहीं

कविता करना तेरे बस की बात नहीं


तथाकथित कवि कविता करना तीर बस की बात नहीं
तू दिन को दिन कह न पाता और रात को रात नहीं


भरता है तू ठूँस ठूँस कर शब्द सभी बेमतलब के
तेरे अर्थ उड़ा करते हैं आंधी में बन कर तिनके
तू जो लिखता उसको शायद खुदा तलक न समझ सके
तू बदला लेता कविता के पाठक गण से गिन गिन के


सेहरा पहन समझता दूल्हा, लेकिन है बारात नहीं
तेरे बस की बात नहीं


एक पंक्ति में होतीं मात्रा सोलह,दूजी में बत्तीस
प्रश्न कोई पूछे तो रहता है तू सिर्फ़ निपोरे खीस
अपने भ्रम को ज्ञानकोष  का देता आया सम्बोधन
भावों से रहता है तेरा सदा आँकड़ा बस छत्तीस

सूखे हुए ठूँठ पर उगते हैं बासन्ती पात नहीं
तेरे बस की बात नही

तेरे सब सन्दर्भ हड़प्पा के जैसे अवशेष हुये
जिसने तुझे पढ़ा उसके ही मन में भारी क्लेश हुए
तू लाठी के जोर ठूँस देता शब्दों को कविता में
लहराते कुन्तल भी तुझको मैड्यूसा के केश हुए

टूटी तकली पर तू बिल्कुल धागे सकता कात नहीं
तेरे बस की बात नहीं

3 comments:

विनोद कुमार पांडेय said...

तेरे सब सन्दर्भ हड़प्पा के जैसे अवशेष हुये
जिसने तुझे पढ़ा उसके ही मन में भारी क्लेश हुए
तू लाठी के जोर ठूँस देता शब्दों को कविता में
लहराते कुन्तल भी तुझको मैड्यूसा के केश हुए

राकेश जी बहुत खूब ..आज की प्रस्तुति पहले की रचनाओं से थोड़ा हट के पर लाज़वाब ..हास्य रस का पुट लिए हुए कुछ कवियों की कहानी व्यक्त करती हुई बढ़िया रचना..वैसे आपकी हास्य रस की एक गीत हमने होली के तरही मुशायरे में पंकज जी के ब्लॉग पर भी पढ़ा था .आज भी हास्य-व्यंग का पुट....बधाई राकेश जी सुंदर रचना के लिए

ana said...

mazaa aa gayaa ..........aisa likha kewal aapke bas ki hii baat hai .......

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

सच्चाई को कहती सुन्दर रचना ....आज हम जो लिख रहे हैं सब ऐसा ही लिख रहे हैं