Thursday, June 17, 2010

याद-पुरानी यादों की गठरी से

फूलों की पांखुर से फ़िसक रही शबनम सी
साज की मुंडेरों पर थिरक रही सरगम सी
सन्ध्या के आँचल में टाँक रही गुलमोहर
निशिगन्धी महकों में लिपट खड़े मधुवन सी
याद कोई सपना बन, आंखों में तैर गई
उस पल पर जीवन की एक सांस ठहर गई

गंगा की धारा में मांझी के गीतों सी
दादी से सुनी हुई पुरखों की रीतों सी
चम्पा के सिरहाने, जूही के गजरों सी
घूँघट से झाँक रही दुल्हन की नजरों सी
याद कोई सपना बन आँखों में तैर गई
उस पल पर जीवन की एक सांस ठहर गई

लहरों की दस्तक सी, सरिता के कूलों पर
बरखा की बून्दों सी, सावन के झूलों पर
चाँदनी में भीग रहे उपवन के प्रांगण में
पुरबा की सिहरन सी मुस्काते फूलों पर
याद कोई सपना बन, नयनों में तैर गई
उस पल पर जीवन की एक सां स ठहर गई



7 comments:

विनोद कुमार पांडेय said...

याद कोई सपना बन आँखों में तैर गई
उस पल पर जीवन की एक सांस ठहर गई

यादों के झरोखों से एक सुंदर और भावपूर्ण कविता प्रस्तुत की आपने...बढ़िया कविता....धन्यवाद स्वीकारें..

उम्मेद said...

प्रकृति के माध्यम से अपनी अनुभूतियों की आकर्षक अभिव्यक्ति....शुभकामनाएं।

दिलीप said...

bahut sundar abhivyakti sirji...

निर्मला कपिला said...

इस गठरी मे बहुत सुन्दर यादें समाहित हैं पूरी गठरी खोलिये। बहुत सुन्दर बधाई

Shar said...

सांस ठहर गई :
गंगा की धारा में मांझी के गीतों सी
दादी से सुनी हुई पुरखों की रीतों सी
चम्पा के सिरहाने, जूही के गजरों सी
घूँघट से झाँक रही दुल्हन की नजरों सी
याद कोई सपना बन आँखों में तैर गई
उस पल पर जीवन की एक सांस ठहर गई
:)

Udan Tashtari said...

आज वाली रचना कहाँ गई भाई जी???

देवेन्द्र पाण्डेय said...

वाह!