Monday, May 31, 2010

मन का इकतारा अब केवल

पता नहीं किसका प्रभाव लज्जा के बन्धन खोले है
मन का इकतारा अब केवल तुमही तुमही बोले है

ओढ़ी हुई एक कमली की छायायें हो गईं तिरोहित
नातों की डोरी के सारे अवगुंठन खुल कर छितराये
बांधे अपने साथ सांस को द्रुत गति चले समय के पहिये
उगी भोर के साथ साथ ही संध्या के बादल घिर आये

वनपाखी मन द्वार तुम्हारे आने को पर तोले है
मन का इकतारा अब केवल तुमही तुमही बोले है

कालिन्दी तट हो, सरयू हो पुष्पकुंज सुरपुर के चाहे
गन्धों के हर इक झोंके में सिमटे आई चित्र तुम्हारे
जुड़ कर रही नाम के अक्षर से सुधि की रेखायें सारीं
घिरे रात के अंधियारे हों या दोपहरी के उजियारे

संवरा शब्द अधर पर जब भी नाम तुम्हारा बोले है
मन का इकतारा अब केवल तुमही तुमही बोले है

आईने के नयनों में जो बिम्ब संवरता तुम ही तो हो
तुम ही को तो झील बना कर चित्र टाँक देती बादल पर
तुमही तो हो बने अल्पना मन के बिछे हुए आंगन में
तुम ही हो चूनर प्राची की,तुम अंकित निशि के आंचल पर

धड़कन का पटवा सांसों की डोरी में तुमको पो ले है
मन का इकतारा अब केवल तुमही तुमही बोले है

5 comments:

pawan dhiman said...

जुड़ कर रही नाम के अक्षर से सुधि की रेखायें सारीं
.. awesome.

Udan Tashtari said...

मन का इकतारा अब केवल तुमही तुमही बोले है

-वाह वाह!! गजब राकेश भाई..क्या बात है!! अभिभूत हुए!!

sangeeta swarup said...

धड़कन का पटवा सांसों की डोरी में तुमको पो ले है
मन का इकतारा अब केवल तुमही तुमही बोले है

आज के गीतकारों का प्रतिनिधित्त्व करती अच्छी रचना

दिलीप said...

punah ek lajawaab rachna

vinod said...

आईने के नयनों में जो बिम्ब संवरता तुम ही तो हो
तुम ही को तो झील बना कर चित्र टाँक देती बादल पर
तुमही तो हो बने अल्पना मन के बिछे हुए आंगन में
तुम ही हो चूनर प्राची की,तुम अंकित निशि के आंचल पर.

तुमही तुमही...एक लाज़वाब भाव..सुंदर गीत के लिए बहुत बहुत बधाई ..राकेश जी हर बार बेहतरीन...प्रणाम स्वीकारें