Tuesday, January 23, 2007

शब्द हैं अजनबी

शब्द आते नहीं होंठ पर अब मेरे,
भावना सो गई शाल इक ओढ़ कर
कंठ में स्वर अटकते हुए रह गये,
आये बाहर नहीं मौन को तोड़ कर
कुछ कहा न गया, कुछ लिखा न गया,
वाणी चुप हो रही, शब्द हो अजनबी
और वह इक कलम जिसको अपना कहा,
वो भी चल दी मेरे हाथ को छोड़ कर

3 comments:

Upasthit said...

Shabd ajanabi, bhavnayen shaal odh kar so gayin, nayepan ka savagat hai, par shabdon ko ajnabi banane mat dijiye...

Divine India said...

Oh!बहुत सुंदर रचना…गागर में सागर जैसा वर्णन…उत्तम।

उडन तश्तरी said...

लघु किन्तु संपूर्ण. बहुत बढ़ियां.