Thursday, January 18, 2007

बिन दुल्हन लौटे बाराती

आज सुबह नारद पर देखा तो गुरुओं की कथाओं की बाढ़ सी आई हुई थी. अभी हम सोच ही रहे थे कि इसका क्या इलाज तलाशा जाये, कि तथाकथित राजकवियों के गुरु सामने नजर आ गये. उनकी ओर हमने प्रश्न उछाला :

मान्य श्री तथाकथित गुरुदेव, इस नश्वर चिट्ठा जगत में आजकल छाई हुई गुरु-गाथाओं का क्या कारण है ,कॄपया हमारे ज्ञानवर्धन हेतु इस पर प्रकाश डालें

उन्होने तुरंत कहा- "तुम्हें पता नहीं चुनाव चल रहे हैं. लगता है पिछले सप्ताह के चिट्ठे नहीं देखे."

" प्रभो . चुनाव से गुरुओं का क्या लेना देना "

उन्होने फौरन सूतजी के अंदाज़ में कहा " अरे भक्त. जो जितना बड़ा गुरु साबित होता है , जितने विशेषणों का अधिकारी होता है, वह उतना ही पूज्य होकर चुनाव जीतता है. "

इतना कह कर उन्होने गुरुमंत्र की तरह कुछ नये अलंकार, उपमायें और विशेषण हमारे झोले में डाल दिये और कहा कि अब तुम अगर इन अलंकारों के साथ कविता करोगे तो इस पोस्ट में समस्त सुखपूर्ण टिप्पणियों के हकदार होकर आगे की जाने वाली पोस्टों में भी सफ़लता को चूमते रहोगे.

अब उन्ही के आशीर्वाद के फलस्वरूप, उन्ही के चुनाव के लिये समर्पित रचना:-

ओ चरखी से निचुड़े गन्ने
फटे हुए पुस्तक के पन्ने
टूटे हुए मुखौटे लेकर कब तक हमको बहलाओगे
पत्थर हो, सिन्दूर पोत कर, कितने दिन औ' पुज पाओगे
बुझे हुए दीपक की बाती
बिन दुल्हन लौटे बाराती
बोलो तो इस बार कौन सा वेश बदल कर के आओगे
मायावी मॄग और कहां तक पंचवटी को छल पाओगे
फिसले हुए चाक से कुल्लड़
पशुमेले के पागल हुल्लड़
चढ़ा चाशनी एक निबोली कितनी मीठी कर पाओगे
फटे कैनवस पर अब कितना बायस्कोप दिखा पाओगे
गिरी हुई बिल्डिंग के मलवे
छिले हुए पत्थर पर तलवे
जाग चुकी आँखों को फिर से मूरख नहीं बना पाओगे
कितना भी सिन्दूर पोत लो, और नहीं अब छल पाओगे

4 comments:

उडन तश्तरी said...

वाह वाह, एकदम ताजा और नया पैतरा!! क्या उपमायें तलाशी हैं:

फिसले हुए चाक से कुल्लड़
पशुमेले के पागल हुल्लड़


बहुत खुब!!

अनूप भार्गव said...

अनूठी उपमाएं , अनूठा अन्दाज़ !

बहुत अच्छे गीतकार जी ...

संजय बेंगाणी said...

मलवे-तलवे, कुल्हड-हुल्लड.
वाह! मजा आ गया.

अनूप शुक्ला said...

बढि़या!