Monday, February 15, 2010

जो हैं वही तुम्हारे होंगे

जो दर्पण से बिछुड़ गये हैं
वे प्रतिबिम्ब हमारे होंगे
सपनों से जुड़ सके नहीं तो
द्रवित नयन के तारे होंगें

संघर्षों की खिली धूप में
पांव तले खोती परछाईं
तपी आग की छाया पीती
चेहरे पर छाई अरुणाई
खुली उंगलियां पकड़ न पातीं
आशा की चादर के कोने
चाहत रहती बन कर रानी
किसी मंथरा की बहकाई

जो हैं बँधे रहे बंधन में
वे ही बहते धारे होंगें
उड़ते हैं जो बादल जैसे
वे संकल्प हमारे होंगे

दॄष्टि पलक की सीमाओं से
आगे जाकर नहीं विचरती
और खिलखिलाहट होठों की
दहलीजों से नहीं बिखरती
अपने ही प्रश्नों के उत्तर में
फिर प्रश्न उठाता है मन
शंकाओं की बस तस्वीरें
रह रह बनतीं और बिगड़ती

जो पल हैं कर चुके समर्पण
फिर जीवित भिनसारे होंगें
हार मान कर ज्पो गर्वित हैं
ढीठ और बजमारे होंगे

पछतावा करता है अपने
दोषों पर मन ही मन कोई
सज्जित करता है समाधि को
अपनी फूल लगा कर कोई
उठी हुई नजरों के आगे
मौन मुस्कुराता रह जाता
पीड़ाओं के अनुबन्धों को
निभा रहा पल पल पर कोई

एक उसी की सांस सांस में
मचले हुए शरारे होंगे
कुछ ऐसे हैं प्रहर, हमारे
जो हैं वही तुम्हारे होंगे

6 comments:

Udan Tashtari said...

जो पल हैं कर चुके समर्पण
फिर जीवित भिनसारे होंगें
हार मान कर ज्पो गर्वित हैं
ढीठ और बजमारे होंगे

-बहुत शानदार अभिव्यक्ति!!

भिनसारे शब्द इतने समय बाद सुना, अपनी दादी की याद आ गई!!

निर्मला कपिला said...

बहुत अच्छी लगी आपकी ये रचना। धन्यवाद्

Shardula said...

:(

Shar said...

सही मायने में एक बहुआयामी कविता, अपने में कितने ही अर्थ समेटे... गहरी गहरी.. जब भी हम पढ़ते हैं लगता है एक नया अध्याय खोल रहे हैं ...
पर प्रशंसा से पहले शिकायत... अब आपकी लेखन प्रक्रिया को समझते हैं सो ये नहीं कहेंगे कि वर्तनी की गलतियाँ न करें... पर कम से कम शीर्षक तो कृपया जांच लिया करें... प्लीज़, प्लीज़ :)
अब कविता :
हर बंद अति सुन्दर! सच में बहुत ही graphic और philosophical.
हर पंक्ति कई बिम्बों को बनाती हुई सी... कभी लगता है शायद भाव पकड में आ गया मेरे... फ़िर दूसरे ही क्षण लगता है की कोई deeper undercurrent है जो शायद समझ नहीं पा रहे हैं हम. Penultimate para तो आपके साहित्य कुञ्ज वाले परिचय की याद दिला रहा है ... है ना!
मुझे लग रहा है कि अगर मैं literature की student होती तो इस कविता की बिलकुल दो अलग अलग तरह से व्याख्या करती ... यही वह क्षण भी है जब मन होता है कि लिखने वाले से ही पूछा जाय ... :)
But that too would be a futile excercise ... :) सो in summary...काफी बार आयेंगे इस कविता पे लौट के और एकलव्य की तरह खुद ही खोजेंगे इसका सत्य ...
आपका आभार ... एक मन आनंदित और मस्तिष्क विशाल करने वाली excercise अनायास ही देने के लिए ...

Anonymous said...

Pranam!
Itne dino se kuchh naya nahin? Sab theek toh hai?

Archana said...

दिल की बात...............