Friday, February 29, 2008

लगा हूँ पलक मींचने

अतीत के झरोखों से

एक अनुभूति है जिसको चीन्हा नहीं
पर लगा हूँ उसे बाँह में भींचने

मेरे अहसास के दायरे में कहीं
हैं छुपे आप आते नहीं सामने
ढूँढते ढूँढते हैं निगाहें थकीं
पर बताया नहीं कुछ पता गाँव ने
एक आभास जैसे चली हो हवा
एक खुशबू कि जिसने मुझे है छुआ
एक सपना खडा नींद की कोर पर
एक मुट्ठी भरी धूप लाई उषा

रंग पानी से लेकर क्षितिज पर कहीं
रूप के चित्र फिर से लगा खींचने

कल्पना की सुराही से छलकी हुई
पी रहा हूँ मधुर ज्योत्सना की सुधा
चेतना का मेरी हर निमिष, आपके
ध्यान के सिन्धु में प्राण! डूबा हुआ
फूल की पाँखुरी में रही खोजती
चित्र बस आपके चांदनी की किरन
हर दिशा को रही खटखटा कामना
आरजुओं की कर प्रज्वलित इक अगन

फिर मिलन की उगें बेल कुछ, द्वार पर
दे के सौगन्ध उनको लगा सींचने

भोर की वीथियों में उगे ओस कण
आपके पाँव की हैं महावर बने
मोतियों सी सुघर एक पदचाप से
छन्द नूतन कई सरगमों के बने
आपके कुन्तलों से उठी इक घटा
नभ में बरखा के छींटे उडाने लगी
ओढनी के किनारे से पुरबा चली
वादियों में गज़ल गुनगुनाने लगी

आपका रूप आँखों से हो न विलग
दोपहर से लगा हूँ पलक मींचने


6 comments:

पंकज अवधिया Pankaj Oudhia said...

वाह। क्या कहने।

Udan Tashtari said...

अद्भुत-बहुत ही उम्दा.

रंग पानी से लेकर क्षितिज पर कहीं
रूप के चित्र फिर से लगा खींचने

काकेश said...

आपका रूप आँखों से हो न विलग
दोपहर से लगा हूँ पलक मींचने

बहुत खूब..

कंचन सिंह चौहान said...

आपका रूप आँखों से हो न विलग
दोपहर से लगा हूँ पलक मींचने
sundar

पंकज सुबीर said...

ओह राकेश जी अगर आप इतना सुंदर लिखेंगें तो बाकियों का क्‍या होने वाला है । बाकियों के लिये भी तो कुछ छोडि़ये गीत ने मुझे जाने कौन कौन से विदा ले चुके कवियों की याद दिला दी । एक अच्‍छी रचना पढ़वाने के लिये आभार

नीरज गोस्वामी said...

भोर की वीथियों में उगे ओस कण
आपके पाँव की हैं महावर बने
मोतियों सी सुघर एक पदचाप से
छन्द नूतन कई सरगमों के बने
अद्भुत शब्द...लाजवाब भाव...अनूठी रचना.
वाह.
नीरज