Monday, September 3, 2007

रसोई और तुम

जो कभी सोचा भी नहीं था, वह हो गया. रचनाधर्मिता के क्षेत्र में बढ़ती हुई
कलमों का प्रभाव अपना विस्तार हमारे घर तक ले आयेगा इसकी हमने कल्पना नहीं की थी.यह निश्चय ही रजनीगंधा,भावना, सीमा,रचना के साथ साथ प्रत्यक्षा और लावण्या का प्रभाव नहीं तो और क्या हैजिसने हमारी आपबीती--
रसोई और हम -- को सिरे से धो कर रख दिया.

उनके वापिस आने के दूसरे दिन ही यह शब्द-समूह हमारे सामने डाल दिया गया. हम
तो निरुत्तर हो गये हैं. जो कहना है आप ही पढ़ कर कहें. लीजिये पेश है- लेखकीय प्रतिक्रिया




सचमुच अबकी बार मुझे भी महंगा पड़ा मायके जाना

वापस आ जब घुसी किचन में, वहीं रह गई खड़ी ठिठक कर
था विश्वास नहीं हो पाया, है ये सचमुच मेरा ही घर
सब कुछ उलट पुलट बिखरा था और काउंटर बना पैन्ट्री
आधा गैलन तेल गिरा था, लगता यहाँ फ़र्श के ऊपर

घर का ये हिस्सा लगता है, मुझको बिल्कुल ही अनजाना

पता नहीं क्या कर डाला है, ओवरफ़्लो हुआ डिशवाशर
कोई बर्तन साफ़ किया है नहीं, कभी भी लगता खाकर
डिश क्लाथ पन्द्रह थे, संग में किचन टावलें पूरी बारह
सब कुछ इधर उधर बिखरा है कुछ भी रक्खा नहीम उठाकर

रग-डाक्टर को मुझे बुलाकर, पूरा कार्पेट धुलवाना

फ़्रिज के दरवाज़े में परतें जमीं दूध की टपक टपह कर
उगा हुआ जंगल फ़फ़ूँद का, क्रीम चीज की पूरी ब्रिक पर
सूख गये क्रिस्पर में सारे, पीच, नेक्ट्रिन, स्ट्राबेरी
और मसाले दानी में बस भरी हुई थी केवल शक्कर

डायनिंग टेबल पर ला छोड़ा, स्क्रूड्रायवर, प्लायर, पाना

तोड़ी आठ प्लेटें, तोड़े शीशे के चौदह गिलास भी
गायब तीन प्यालियाँ चम्मच चार और कुछ छुरी साथ भी
काफ़ी के मगनहीं कहीं भी, बोन चायना के कप खंडित
क्रिस्टल वाली डिश भी तोड़ी, जो पसन्द की मेरी खास थी

कैसे उड़े यहाँ गुलछर्रे, मुश्किल हुआ समझ में आना

फ़्रीज़र में, मैं छोड़ गई थी तीन थैलियाँ भरी पकौड़ी
चार बैग थी स्वाद ब्रांड की फ़्रोज़न लाकर रखी कचौड़ी
पाँच नान के पैकेट भी थे, बीस परांठे आलू वाले
डोंगा भर कर गई बना कर, मैं पनीर के साथ मंगौड़ी

चार पौंड का डब्बा भर कर रखा हुआ था हरा वटाना

आटा सूजी , मैदा, बेसन, डिब्बे हुए सभी के खाली
सारी दालें छूमन्तर थीं, केवल उड़द बची थी काली
कैबिनेट में सिर्फ़ हवा है, झाड़ू लगी सभी खानों पर
ये बेतरतीबी सोच रही हूँ कैसे मुझसे जाये संभाली

हफ़्ते भर का काम हो गया, पूरा किचन मुझे संगवाना

रसगुल्ले, गुलाबजामुन की कैन रखीं थीम सभी नदारद
रिट्ज़. क्लब क्रैकर के डब्बे, हुए कहाँ पर जाने गारद
चिप्स एहोय, ओरियो का तो चूरा तक भी बचा न बाकी
न्यूट्रीशन के लिये न जाने कैसी बुद्धि दे गई शारद

फिर से नये सिरे से सब कुच, मुझे पड़ेगा अब समझाना

सचमुच अबकी बार बहुत ही महँगा पड़ा मायके जाना

6 comments:

Udan Tashtari said...

हम तो भाभी के साथ हो लिये हैं...सही कहा है उन्होंने. भाभी, आप ही सही हैं बिल्कुल. हा हा!! भाई साहब, आप भी न!!

अनूप शुक्ला said...

सही है। अब इसकी जांच बैठाई जायेगी। नुकसान का जिम्मेदार चिन्हित करके अनुशासनिक कार्यवाही होगी।

Pratyaksha said...

इतने कम समय में इतनी ज़्यादा तबाही ! कोई मेडल मिलना चाहिये आपको ।
मधुजी से पूरी सिम्पथी है ।

रजनी भार्गव said...

राकेश जी अच्छी खासी आपबीती सुना लेते हैं,लगता है मधु की ही नहीं,मेरी भी सुना रहे हैं.अचरच है कि रसोई की इतनी जानकारी है जब कि हमें मालूम है कि होमफ़्रन्ट कौन संभालता है.बहुत खूब.

Divine India said...

यह प्रतिक्रिया ज्यादा सच दिखा गई :)

deepanjali said...

जो हमे अच्छा लगे.
वो सबको पता चले.
ऎसा छोटासा प्रयास है.
हमारे इस प्रयास में.
आप भी शामिल हो जाइयॆ.
एक बार ब्लोग अड्डा में आके देखिये.