Friday, April 13, 2007

ये हमारे बस की बात नहीं है

एक सप्ताह हो गया चिन्तन और मनन करते हुए. पहले समीर लाल जी का उपदेश सुना और फिर उसके बाद फुरसतिया जी का विश्लेषण कवि और कविता के बारे में.

रोज सुबह आईने के सामने जाते तो उधर से कोई मुँह चिढ़ाता नजर आता कि मियाँ बड़े बनते रहे हो गीतकार की दुम. अब देखो न इतनी सारी खूबियाँ जो गिनवाई गईं हैं, है क्या उनमे से कोई एक भी है तुम्हारे अन्दर ? कभी जागे हो रात भर ? कभी नाउम्मीदी के दामन से आँखें पोंछी हैं ? और तो और मियाँ खाँ तुमसे ये दो अदद आँखें भी नहीं लड़ाईं गईं और चल दिये झंडा उठाकर कि हम गीतकार हैं.
अरे कभी बेजार होकर फिल्मी गाने गाते कि " तेरी दुनिया में दिल लगता नहीं " हमें पता है कि इश्किया गाने कवि लोग नहीं गाते क्योंकि

वियोगी होगा पहला कवि
आह से उपजा होगा गान

अब तुमने न आह की न आँसू बहाये, न रातों की नींदें हराम की, फिर कैसे कह रहे हो कि तुम कवि हो ?

हमने हर बार समझाने की कोशिश की , भाई हम अपने आपको कवि कहाँ कहते हैं. अगर कवि होते तो हम भी अतुकांत कवितायें फ़ुरसतियाजी के बताये स्टाईल में करते. प्रयोगवाद के नाम पर कठिन कठिन शब्दों की पुड़िया बना कर उन्हें कुल्लड़ में खँगालते और फिर करीने से लगा कर कहते कि आओ भाई,
हमारा प्रयोग पढ़ो और सुनो और फिर अपना सर धुनो कि हमने क्या लिखा है. यार हमें तो खादी भंडार का रास्ता भी नहीं मालूम, जहाँ से एक अदद कवि वाली वेशभूषा खरीद लाते.

लेकिन साहब , उधर वाला आदमी हमारी सुनने को तैयार नहीं हुआ. कहने लगा कि जब तक एक प्रयोगवादी अतुकांत कविता लिख कर नहीं लाते, तुमसे यह नाम ( गीतकार ) छीन लिया जायेगा. यह भयंकर धमकी सुन कर हमारे होश उड़ना स्वाभाविक था क्योंकि अगर नाम खो गया तो बस :
याद में गीत बजने लगे

नाम गुम जायेगा, चेहरा ये बदल जायेगा
तेरी आवाज़ ही तेरी पहचान है, गये कि रहे

अब हमें नाम तो गुमवाना नहीं इसलिये फौरन एक प्रयोगधर्मी रचना लेकर हाजिर हुए:
संतरा
खाया छमिया ने
फ़ेंका उसका छिलका
अटक गया बबूल में
भिनसारे का चाँद
नदी की नाव
लुटेरों का घर
हाय रे हाय
धनिये की पुड़िया
और तिरछी नजर


अब इतना कह कर हमने आईने की तरफ़ देखा तो पाया कि छह सात लोग और आकर जमा हो गये हैं और तालियां बजा रहे हैं. उधर से वाह वाह की आवाज़ें आ रही थीं. अजी क्या खूब लिखा है. कलम तोड़ के रख दी. अरे साब भावों को अभिव्यक्ति देना तो कोई आपसे सीखे.

आँखें मिचमिव्हा कर देखा हमने कहीं कोई सपना तो नहीं देख रहे हम. नहीं साहब. उधर से बार बार वाह वाह की आवाज़ें आ रहीं थीं. जैसे ही थमी, उधर वाले एक बिम्ब ने कहा अब आप हमारी रचना सुनिये और जैसे हमने आप को दाद दी है वैसे ही आप दें. हम कुछ बोलें इससे पहले ही वे शुरू हो गये

हाथ में
क्या है ?
क्या नहीं है
क्या होना था
चान्द ?
फ़ावड़ा ?
या भावनाओं का तसला ?
उफ़
यह कुंठा
यह संत्रास
रे मन
खांस खांस खांस !!!!


भाई साहब. हमने जैसे ही सुना, अपने हथियार डाल दिये. यह अतुकांत और प्रयोगवाद हमारे बस की बात नहीं है. हमने वापिस अपनी औकात पर आ गये हैं और उन सभी बिम्बों से विदा लेते लेते यह पंक्तियाँ उन्हें समर्पित किये जारहे हैं:-


मान्यवर आप कविता न अपनी पढ़ें
वरना श्रोता हर इक बोर हो जायेगा
आप ज़िद पर अगर अपनी अड़ ही गये
दर्द सर का, सुनें , और बढ़ जायेगा

आपने जिसको कह कर सुनाया गज़ल
वो हमें आपकी लंतरानी लगी
और जिसको कहा आपने नज़्म है
वो किसी सरफ़िरे की कहानी लगे
छोड़िये अपना खिलवाड़, ओ मेहरबां
शब्द भी शर्म से वरना मर जायेगा

टांग तोड़ा किये आप चौपाई की
और दोहों को अतुकान्त करते रहे
शब्दकोशों की लेकर प्रविष्टि जटिल
आप अपने बयानों में भरते रहे
मान लें कविता बस की नहीं आपके
आपके बाप का क्या चला जायेगा

चार तुक जो मिला लीं कभी आपने
आप समझे कि कविता पकड़ आ गई
मान्यवर एक आवारा बदली है वो
आप समझे घटा सावनी छा गई
और ज्यादा सुनेगा अगर आपकी
देखिये माईक भी मौन हो जायेगा

4 comments:

Udan Tashtari said...

हा हा!! बहुत सही!!
वैसे अगर आप अतुकांत्त रहने ही दें तो ठीक... :)


छोड़िये अपना खिलवाड़, ओ मेहरबां
शब्द भी शर्म से वरना मर जायेगा


--- हा हा :)
बहुत बढ़िया, छा गये. बधाई!!

Reetesh Gupta said...

सच्चाई लिये सुंदर व्यंग लिखा है आपने...

अनूप शुक्ला said...

बहुत खूब ! बड़ी जल्दी औकात में आ जाते हैं आप !

मोहिन्दर कुमार said...

Rakesh Ji,

Tukkant bhi achaa tha or Us se pehle ka Drishtaant bhi.
Jo bhee shabad Dil se likhe jaate hein wo Dil ko Choo hi lete hein... kisi bhi roop mein hoen.