Thursday, February 15, 2007

सर्वश्रेष्ठ पुरस्कार वितरण

खबर छपी है कि हिन्दी ब्लागर्स का एक बार फिर चयन हुआ है चुनाव के लिये. लगता है कि फ़िल्म इन्डस्ट्री का प्रभाव अब हिन्दी ब्लाग पर चढ़ने लग गया है. जैसे अमेरिका में गोल्डन ग्लोब, आस्कर, पीपल्स चायस, पब्लिशर्स चायस, व्यूअर्स चायस और भी कई नामों से ये पुरस्कार दिये जाते रहे हैं तो भला हिन्दी ब्लागर्स क्यों पीछे छूटें. अभी तरकश ने दिये. फिर हिन्दी युग्म ने एक घोषणा की. अब इन्डी ब्लागर्स की बारी है.

अब यह तो सुनिश्चित था कि इस बार यह पुरस्कार हमें ही मिलेगा. यह दूसरी बात है हमने औपचारिक रूप से नम्रता वश इसे लेने से इंकार कर दिया है और अपने अन्य ब्लागर भाईयों को आगे आने का मौका प्रदान कर दिया है. अब हम यह सोच रहे थे कि हमारे अतिरिक्त अब किस का अनुमोदन किया जाये और सार्वजनिक तौर पर यह घोषणा की जाये. इसी उधेड़-बुन में हम सोफ़े पर बैठे बैठे लुढ़क गये

पुरस्कार वितरण समारोह में हमें आमंत्रित किया गया है. मुख्य अतिथि श्रीमान फ़ुरसतिया जी हैं मंच संचालन का जिम्मा उड़नतश्तरी वाले भाई साहब ने तालियां बजवा कर अपने हाथ में ले लिया है. उनके साथ उनके परम शिष्य अपनी टोली के साथ अपने नये छम्दों के प्रयोग को तत्पर हैं

हमें मंच पर बुलाया गया है और सर्वश्रेष्ठ चिट्ठाकार को पुरस्कार देने का आग्रह करते हुए फ़ुरसतियाजी ने हमें इस अवसर पर लखनऊ आने पर प्राप्त प्रथम अनुभव को बखान करने का आदेश दिया. हम पुरस्कार वितरण हेतु १९ घंटों की हवाई यात्रा के पश्चात विगत संध्या को ही पहुँचे थे. अतएव हमने आदेश का पालन करते हुए कहा

नींद आइ नहीं एक पल के लिये
एक कुत्ता रहा रात भर भौंकता
कुछ अजीबोगरीबाना आवाज़ थीं
मैं रहा था निमिष दर निमिष चौंकता
गाड़ियों,ट्रेन रिक्शों की खड़ खड़ बड़ी
बजतीं मंदिर की,सायकिल की भी घंटियां
और रसोई में लगता था जैसे कोई
हर घड़ी हो रहा सब्जियां छौंकता

था बदलता रहा करवटें रात भर
लेटे लेटे मैं बिस्तर पे उल्टा पड़ा
एक जलकाक आवाज़ करता रहा
खिड़कियों के परे झाड़ियों में खड़ा
रोशनी कोई छन छन के आती हुई
मेरी पलकों पे दस्तक लगाती रही
और टपटप की आवाज़ थी इस तरह
जैसे जल का लुढ़कता हो मटकी भरी

एक टूटी घड़ी लट्की दीवाल पर
घूरते घूरते , थक गई थी मुझे
यों लगा वक्त काँटों के संग में रुका
जो नहीं सूत भर भी थे आगे बढ़े
चाय काफ़ी का था दूर तक न पता
कोई बस लाठियाँ ठकठकाता रहा
और दीवार पर खिड़कियों से छना
रंग बस भोर का आता जाता रहा.

अभी हम आगे भी कहने वाले थे कि पुरस्कॄत चिट्ठाकार ने इशारा किया और देखते ही देखते ताली पुराण शुरू हो गया और हम नींद के आगोश से बाहर निकल आये. अब प्रतीक्षा में हैं कि सपना सच हो और हम पुरस्कॄत चिट्ठाकार का सम्मान करने के लिये कानपुर, लखनऊ,रतलाम और हो तो दुबई या कुवैत जायें

5 comments:

उडन तश्तरी said...

क्या क्या उपमायें तलाशी हैं, प्रभु, चरण आगे करो.

नींद आइ नहीं एक पल के लिये
एक कुत्ता रहा रात भर भौंकता
कुछ अजीबोगरीबाना आवाज़ थीं
मैं रहा था निमिष दर निमिष चौंकता
गाड़ियों,ट्रेन रिक्शों की खड़ खड़ बड़ी
बजतीं मंदिर की,सायकिल की भी घंटियां
और रसोई में लगता था जैसे कोई
हर घड़ी हो रहा सब्जियां छौंकता


--रही बात, कानपुर, लखनऊ,रतलाम और हो तो दुबई या कुवैत जायें....काहे भाई, कनाड़ा नहीं आओगे, यहाँ की बर्फ़ से डर गये क्या!!

---सही है, यह भी शतकीय पोस्ट का ही हिस्सा मानी जा रही है गीत कलश की और बहुत बधाई. क्या बात कही है. और खुल कर कहो और जितवा कर ही मानो!! हा हा

Shrish said...

वाह मजेदार तुकबंदी मिलाई।

पुरुस्कार वितरण में हमें बुलाना न भूलिएगा।

उन्मुक्त said...

मुझे भी अवश्य बुलाईयेगा

Pratyaksha said...

मज़ा आया । सपना सच हो जाये ये दुआ हमारी

अनूप शुक्ला said...

आमीन!