Wednesday, February 7, 2007

वे फ़ल और सब्जी-ए-मशरिक कहाँ हैं

सुबह सवेरे खिड़की से झांका तो बाहर बर्फ़ की चादर बिछी हुई थी. काफ़ी की चुस्कियाँ (यह धॄतराष्ट्र से नहीं सीखा, अपनी भी आदत है ) लेते हुए सोचने लगे कि आफ़िस न जाने के लिये क्या बहाना बनाया जाये कि आवाज़ आई

"सुन:

इधर देखा, उधर देखा. कमरे में कोई नहीं और खिड़की के बाहर सफ़ेद कंबल ओढ़े खड़ी कारों के सिवा कुछ नहीं. समझे कि शायद भ्रम था, परन्तु आवाज़ फिर आई

" सुन. यहां वहां मत देख और केवल सुन "

असमंजस की सी स्थिति थी. फिर सोचा सुन ही लिया जाये, जो कोई भी कह रहा है क्या कहना चाहता है.

हमने कहा " फ़रमाईये "

आवाज़ आई, गीत वीत कविता वविता तुम बहुत कर चुके. बहुत लिख चुके हो प्यार व्यार, याद, आंसू, मिलन, श्रंगार, रूप, मौसम वौसम पर. जानते हो लेखन में क्रान्ति आ रही है. अब नये विषय तलाशो. देखो चोटी के चिट्ठाकार भी अब चोटी ( बालों वाली )
की बात लेकर चिट्ठा लिखते हैं. तुम अब कुछ हट कर लिखो. "

बात में दम है. हमने सोचा. पर विषय कहाँ से लायें. इसी उलझन में डायनिंग टेबल पर पड़ी फ़लों की टोकरी देखने लगे और सीडी का अलर्म बजना शुरू हो गया. साहिर लुधियानवी का गाना बज रहा था

ये कूचे ये नीलामघर

फ़लों की टोकरी देखते देखते और गाना सुनते सुनते हमने चिट्ठावाणी का आदेश माना इस तरह

ये अंगूर, ये संतरे और केले
ये स्ट्राबरी और कीवी गदेले
बढ़ा हाथ अपनी प्लेटों में लेले
यहाँ हैं यहाँ हैं यहाँहैं यहाँ हैं

मगर वे कहाँ मौसमी वे पपीते
कहाँ घर के बाहर मिलें, वे सुभीते
लिये याद हम रसभरी की ्हैं जीते
कहाँ हैं कहाँ हैं कहाँ हैं कहाँ हैं

वो नाजुक सी शै, जैसे लैला की उंगली
हुई जिसपे कुर्बान मजनू की पसली
लुटा जिसपे महुआ, लुटी जिसपे देहली
हरी लखनवी ककड़ियां वे कहाँ हैं

वो शहतूत जिनसे शहद था टपकता
वो बैंगन बनाते थे जिसका कि भरता
कहाँ फ़ालसे जिनसे शरबत निकलता
कहाँ हैं कहाँ हैं कहाँ हैं कहाँ हैं

कहाँ आम लँगड़े ? कहाँ हैं दशहरी
कहाँ धान की बालियाँ वे सुनहरी
खड़ी खेत में ज्वार चंचल छरहरी
कहाँ हैं कहाँ हैं कहाँ हैं कहाँ हैं

यहाँ पीच औ नैक्ट्रीनें भी मिलतीं
औ" अंजीर ऐसी कि मुंह में हो घुलती
मगर याद फिर खिन्नियों पर फ़िसलती
कहाँ हैं कहाँ हैं कहाँ हैं कहाँ हैं

वे फ़ल और सब्जी-ए-मशरिक कहाँ हैं ?

7 comments:

उडन तश्तरी said...

भाई जी, अब तो याद ही किया जा सकता है:

यहाँ पीच औ नैक्ट्रीनें भी मिलतीं
औ" अंजीर ऐसी कि मुंह में हो घुलती
मगर याद फिर खिन्नियों पर फ़िसलती
कहाँ हैं कहाँ हैं कहाँ हैं कहाँ हैं

वे फ़ल और सब्जी-ए-मशरिक कहाँ हैं ?
--बड़ा बेहतरीन प्रयोग रहा यह भी, बहुत बधाई. :) :)

Beji said...

बात भले ही आप फलों की कर रहें हो....अभी भी बहुत गंभीर ही लग रहे हो.... यह ट्रैफिक की दिशा की बात है....कुछ लोगों के दिमाग से दिल तक बात जाती है...बाकियों के दिल से दिमाग तक। जुबान पर दोनो ही अच्छी लगती हैं।

प्रत्यक्षा said...

मज़ा आ गया ये नया अंदाज़ !

Dr.Bhawna said...

बहुत खूब। :)

रीतेश गुप्ता said...

बढ़िया लिखा है ...मजा आ गया ..बधाई

manya said...

sachmuch aap jitna asli swaad maine nahi liya hoga magar phir bhi aaj aur kal me fark mahssos hota hai.. bahut achchha andaaz hai...

गीतकार said...

आप सभी को रचना पसन्द आई. आभार स्वीकार करें