Monday, December 4, 2006

ओ प्रवासी

उग रहे आकार अम्बर में मरुस्थल के भ्रमों से
कल्पना की हर छुअन, पर हो गई रह कर हवा सी
कब तलक यों पीर की अंगनाईयों में कसमसाता
दूर हो परिवेश से अपने रहेगा ? ओ प्रवासी

ज़िन्दगी की इस चकई का खींचता है कौन धागा
कौन दे सन्देस छत पर भेजता है रोज कागा
कौन सी कठपुतलियों के हाथ की रेखा बना है
उलझनों में और उलझा जा रहा है मन अभागा

साध उलझे केश सी पगडंडियों में छटपटाता
मिल सके छाई अमावस को किसी दिन पूर्णमासी

उंगलियों को कौन थामे ही बिना देता दिशायें
कौन कहता है घटित जो है करे वह मंत्रणायें
संकुचित कर दायरों में दॄष्टि को बन्दी बना कर
कौन कहता है क्षितिज के पार हैं संभावनायें

घेरती हैं एक ऊहापोह में सुईयां घड़ी की
क्या भरेगी आंजुरि में आस की चुटकी जरा सी

धार के प्रतिकूल जाती नाव पर नाविक अकेला
थक रहा है बाऊलों के गीत को दे रोज हेला
चाहता है छोड़ना पतवार पर घेरे विवशता
फिर थमाता हाथ में चप्पू प्लावित कोई रेला

चक्र में आरोह के अवरोह के आधार खोकर
चल रही है, सांस पल पल पर हुई है अनमनासी

खुल रही पुस्तक दिवस की पॄष्ठ रहते किन्तु कोरे
संचयों को शब्द दें, पहले उड़ा लेते झकोरे
सांझ की पठनीयता के भाग में बस शून्य रहता
और कहती चल पुन: तू आस्था अपनी संजो रे

पौष की चौथी निशा में घिर रहे गहरे कुहासे
की घनेरी चादरों में कामना जाती समा सी

कट चुकी हैं जो पतंगें, कौन उनकी डोर थामे
स्वप्न होवे स्नात कोई भोर की धुंधली विभा में
आगतों के प्रश्न का उत्तर, विगत ही सौंप जाये
ज्योत्सना उगती रहे, हर बार की घिरती अमा में

आस बोती बीज, यद्दपि जानती उनकी नियति है
उग चुके दिन के दिये की बुझ रही धूमिल शिखा सी

1 comment:

Ripudaman said...

गीतकार जी !

बहुत सुंदर लिखा है !

सादर
रिपुदमन