Monday, April 5, 2010

टिप्पणी ब्लाग ई मेल और पत्तागोभी के रसगुल्ले

भाई साहब, आप हमारे ब्लाग पोअर पधारें और अपनी अमूल्य टिप्पणी से नवाजें

लगभग रोजाना ही कम से कम ऐसे दस- बारह सन्देश ई मेल के बक्से में मिल जाते हैं. मन में एक प्रश्न उठता है क्यों भाई क्यों पढ़ें हम तुम्हारे ब्लाग को ? हम अपनी पसन्द के लेख अपने आप नहीं छा~ट सकते क्या ?ब्लागवाणी और चिट्ठाजगत जो कल तक हमारी सहायता करते रहे हैं क्या वे बन्द हो गये हैं जो आप अपने बहुमूल्य (?) समय में से समय निकाल कर हमें लिन्क भेज रहे हैं या आपने हमको इतना अज्ञानी समझा है कि हम अपनी पसन्द के चिट्ठे और उन पर हुई पोस्ट न ढूँढ़ सकें जो आप हमारी सहायता करने पर तत्पर हैं.

ठीक है भाइ. हमने मान लिया कि हमें आपके चिट्ठे की जानकारी नहीं है परन्तु जबरदस्ती आप हमारे गले में तो मत ठूंसिये. और अगर बुला भी लिया आपने इस बहाने अपने चिट्ठे पर तो यह क्यों जरूरी है कि हम टिप्पणी भी दें.यह तो यूँ हुआ

भेज रहे हैं नेह निमंत्रण प्रियवर तुम्हें बुलाने को
वालेट अपना संग में लाना बिल चुकता कर जाने को

निमंत्रण तो है ही आने का और फिर आने का हर्जाना भी भुगतें ? न बाबा न.

तुम ई मेल लिखो या चिट्ठे हमको फ़र्क नहीं पड़ता है
मन की तो ऐसी मर्जी है जो चाहे बस वह पढ़ता है

गीत लिखो या नज़्म रचो तुम गज़लें गाओ याकि कहानी
याकि संवारो नये रूप में रोज रोज कविता कल्याणी
लिखो धर्म की बातें या फिर हमको योग तनिक सिखलाओ
और भली ही पंचम सुर में गाना मालकौंस सिखलाओ

माऊस मेरे कम्प्यूटर का लिन्कें क्लिक नहीं करता है
मन की तो ऐसी मर्जी है जो चाहे बस वह पढ़ता है

सिखलाओ तुम कैसे बनते पत्तागोभी के रसगुल्ले
कैसे करें निवेश और फिर कैसे बैठे रहें निठल्ले
राजनीति के दांवपेंच हों ,नक्षत्रों की टेढ़ी चालें
कहां हजम करती हैं चारा कागज़ पर चलती घुड़सालें

नहीं जानना हमको, हमको तो प्यारी अपनी जड़ता है
मन की तो ऐसी मर्जी है जो चाहे बस वह पढ़ता है

तो भाई अपने समय का सदुपयोग आप हमारे लिये न करें. हम आपके निमंत्रण पर न तो आपके ब्लाग पर आने वाले हैं और न ही टिप्पणी करने वाले. आप यह क्यों भूल जाते हैं कि अगर आपकी रचना में दम होगा, आपके लेख में गुंजायश होगी तो पाठक अपने आप ही टिप्पणी दे देगा बरसों पहले दूरदर्शी श्री श्री रहीम दास जी( उन्की आत्मा या रूह से क्षमायाचना सहित )कह गये थे न

बिन मांगे मोती मिले मांगे मिले न भीख
असर लेख में मूढ़ कर, यह सद्गुरु की सीख


और आशा करता हूं कि आपके ईमेल आईडी को मेरा खाता स्पैम करार देकर अवांछित न बना दे.

18 comments:

लवली कुमारी said...

:-)

रविकांत पाण्डेय said...

तात कहा है सत्य आपने शब्द-शब्द ज्यों मोती है
गुणवत्ता ही तो रचना की एक कसौटी होती है

उल्टा-सीधा लिखकर खुद को महागुणी जो कहते हैं
ऐसे महापुरुष से हम भी दूर-दूर ही रहते हैं
सुंदर रचना में होता है निहित स्वयं ही आकर्षण
वृथा दिखावा उसका जग में, वृथा भेजना आमंत्रण

टिप्पणि-लोभी की संगत में काव्य-कामिनी रोती है
गुणवत्ता ही तो रचना की एक कसौटी होती है

Jandunia said...

अच्छी पोस्ट है।

अविनाश वाचस्पति said...

गीतकार की कलम तलवार बन गई
माऊस बन गया हाथी
मैं तो रखूं ऐसी धार
कि चक्‍कू बन जाए तलवार
मतलब वही कि कलम बन जाए तलवार
चूहा बन जाए हाथी
हाथी सब का साथी।

Udan Tashtari said...

प्लीज आईये न हमारे दर पर भी कभी :)

भेज रहे हैं नेह निमंत्रण प्रियवर तुम्हें बुलाने को
वालेट अपना संग में लाना बिल चुकता कर जाने को


हा हा!! किस किस की भद्द उतरी, वो खुद ही समझ गये होंगे, हा हा!!

Suman said...

nice

मनोज कुमार said...

हमसे अलग जो आपने परिवार कर लिया
तो भेद-भाव हमने भी स्वीकार कर लिया ।
रिश्ता रहा तो इतना रहा हममें आपमें,
मिलते ही मुस्कुराए, नमस्कार कर लिया ।

डॉ टी एस दराल said...

हा हा हा ! बढ़िया व्यंग कसा है ।
कभी हमारे ब्लॉग पर भी (मत) आना भाई।

विनोद कुमार पांडेय said...

बिल्कुल सही बात..ऐसा होना ही नही चाहिए हमें जो रचना अच्छी लगेगी हम उसी पर टिप्पणी करेंगे..आप ने बढ़िया जवाब दिया....

अनूप भार्गव said...

मैं आप के ब्लौग पर टिप्पणी कर रहा हूँ यह सोच कर कि शायद आप भी एक दिन यह उपकार चुकायेंगे और यदि ज़्यादा खुश हुए तो अपने दोस्तों को भी बतायेंगे ।

अभिनव said...

सत्य सटीक वचन, वाह वाह

अब तो ब्लॉग वाणी पर आने वाले ब्लॉग भी आई बी एन लाइव हो गए हैं,
सनसनी की झनझनी में खो गए हैं.

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

आज तो आप ने अपने चिट्ठे पर आने को बाध्य कर ही दिया।

hasyakavi albelakhatri said...

ha ha ha ha

jai ho............

अमित जैन (जोक्पीडिया ) said...

बहुत बढिया ,लिखते रहो, मजा आ गया

ajit gupta said...

मन की तो ऐसी मर्जी है जो चाहे बस वह पढ़ता है
सत्‍य वचन। लेकिन ऐसा अनुभव में आ रहा है कि यदि हमने किसी की पोस्‍ट पर टिप्‍पणी नही की तो वो भी नहीं करेगा। अरे भाई पडौसी की शक्‍कर का लेन-देन मत करो। जो अच्‍छा लगे उसे पढ़ो और मन करे तो टिप्‍पणी करो। जबरदस्‍ती मत करो। हम तो ऐसा व्‍यवहार करते हैं जैसे मेहमान करते हैं। हम आपके यहाँ आ गए हैं अब आपको आना है।

Sonal Rastogi said...

नारायण नारायण ....

अजय कुमार झा said...

हरि ओम तत्सत ..आज से हम भी ई मेल ठेल शुरू करते हैं ....कित्ता असरकारक है पता चल गया
अजय कुमार झा

Anonymous said...

Couldn't agree more!
Good shot RK!
I am also so bugged up with these unsolicited mails.
So many important messages get lost coz of these "Please read my Rachna... ". And the worst part is I don't even know who these writers are :)