Wednesday, January 16, 2008

ओस की बून्द ने

हर दिवस हो गया हीरकनियों जड़ा, मोरपंखी हुई मेरी हर शाम है
ओस की बून्द ने फूल की पंखुड़ी पर लिखा धूप से जब तेरा नाम है

रात भर थी टपकती हुई चाँदनी
को पिरोती रही भोर की धूप में
गंध को घोल कर स्याहियां फिर बना
थरथराते अधर की कलम में भरा
रोशनी की पिघलती हुई इक किरण
पांव को चूमने के लिये बिछ गई
जब बही धूप ने था कलम से निकल
नाम चुम्बन से इक पंखुड़ी पर जड़ा

एक पल वह सपन का शिलालेख बन, नैन के पाटलों पर सुबह शाम है
ओस की बून्द ने फूल की पंखुड़ी पर लिखा धूप से जब तेरा नाम है

झील में से उठी इक उनींदी लहर
राग नूतन अचानक लगी छेड़ने
सात रंगो भरा भोर का बिम्ब तब
पंखुड़ी बन गई जिस निमिष आईना
नरगिसी हो क्षितिज लीन होने लगा
सूर्य के चक्र की रुक गई फिर गति
जगमगाती हुई दीप्ति से जो घिरा
नाम उठ कर खड़ा हो गया आँगना

अंत-आरंभ-सुध-बुध बिसर कर गये नाम के पास ये मेरा अनुमान है
ओस की बून्द ने फूल की पंखुड़ी पर लिखा धूप से जब तेरा नाम है

तारकों की सघन छांह में थे उगे
कल्पना के हठीले निमिष रात भर
एक खाके को आकार करते रहे
चाँदनी में भिगो, बदलियां कात
एक मुट्ठी हवा, गुनगुनाती रही
बाँसुरी पे मचलती हुई रागिनी
और प्राची की उंगली पकड़ थी खड़ी
तूलिका आतुरा और उन्मादिनी

स्वर्ण का एक प्रासाद जो बन गया, क्यारियों में वही पांचवा धाम है
ओस की बून्द ने पंखुड़ी पर लिखा, धूप से जब प्रिये ये तेरा नाम है

2 comments:

जेपी नारायण said...

हर दिवस हो गया हीरकनियों जड़ा, मोरपंखी हुई मेरी हर शाम है
ओस की बून्द ने फूल की पंखुड़ी पर लिखा धूप से जब तेरा नाम है

....आजकल बहुत अच्छा लिख रहे हैं। बधाई

मोहिन्दर कुमार said...

राकेश जी,
आरम्भ से अन्त तक एक ही सांस में पढ गया.... लाजवाव रचना.. हर पंक्ति कुछ कहती हुई लगती है..