Monday, July 8, 2013

फिर से धूप धरा पर उतरी

फिर से  धूप धरा पर उतरी
 
 
बादल का घूँघट उतार कर खोल गगन के वातायन को
फ़ेंक मेघ का काला कम्बल,तोड़ मौसमी अनुशासन को
तपन घड़ें में भर कर रख दी
फ़िर से धूप धरा पर उतरी
 
उफ़नी हुई नदी के गुस्से को थोड़ा थोड़ा सहला कर
वृक्ष विहीना गिरि के तन को सोनहरा इक शाल उढ़ा कर
हिम शिखरों की ओर ताकते हुये तनिक मन में अकुलाकर
छनी हवा से हो गई उजरी
फ़िर से धूप धरा पर उतरी
 
रँगते हुये प्रेमियों के मन में भावों की चित्रकथायें
देते हुये बुलावा अधरों को अब मंगल गीत सुनायें
और नयन में आगत को कर रजताभी नव स्वप्न सजायें
प्राची में लहरा कर चुनरी
फ़िर से धूप धरा पर उतरी
 
पावसान्तक और हिमान्तक होती सुखदा याद कराते
और ग्रीष्म में क्रुद्ध न होगी इतनी अधिक अगन बरसाते
अगर प्रकृति का करते आदर हम सब अपने शीश नवाते
सच्चाई की लेकर पुटरी
फ़िर से धूप धरा पर उतरी

Sunday, June 9, 2013

प्राण ही शब्दित हुये हैं

व्याकरण से बिंध अधर के
रह गये जब स्वर बिखर के
प्राण ही शब्दित हुये हैं उस घड़ी इक गीतिका में
 
उंगलियों के सामने आ टिक रहें जब भावनायें
छट्पटायें पंथ में गिर ठीकरों सी कामनायें
व्यूह में आक्षेप के तीखे शरों की घिर झड़ी में
दग्ध पायल सोचती हों किस तरह से झनझनायें
 
गुम दिशा में हों सवेरे
खिलखिलाते हों अँधेरे
प्राण ही शब्दित हुये हैं उस घड़ी इक दीपिका में
 
अर्थ के सन्दर्भ भी जब अर्थ खोने लग पड़ें हों
प्रश्न के उत्तर स्वयं ही प्रश्न बन बन कर खड़े हों
नाम अजनबियत लिखे जब परिचयों के पृष्ठ पर आ
यामिनी के स्वप्न जब टूटे सितारों से झड़े हों
 
रात की गहराई पी कर
आस के अवशेष सी कर
प्राण ही शब्दित हुये हैं उस घड़ी आ चन्द्रिका में
 
बोध बुनने लग पड़े जब जाल खुद दिन रात छल के
बन रहें अवरोध पथ के अनकिये अपराध कल के
तर-बतर करती रहे नैराश्य की बदली घिरे बिन
और दिन का दीप रह ले रात के ही द्वार जल के
 
चीरने निस्तब्धता को
छाँटने अस्पष्टता को
प्राण ही शब्दित हुये हैं उस घड़ी आ बोधिका में

Sunday, June 2, 2013

याद आई आज मुझको

याद आई आज मुझको सूचना के बिन तुम्हारी
 
चेतना के तार की झंकार पर तन्द्रा बिठाकर
आस की अनुभूतियों के केन्द्र पर निद्रा बिछाकर
नैन के आवास की दीवार को रंगीन कर के
डाल कर सम्मोहिनी,सुधियाँ सभी मेरी  भुलाकर
 
व्याकरण अनुभूतियों की इक नई रच कर सँवारी
याद आई आज मुझको सूचना के बिन तुम्हारी
 
डाउनटाउन सांझ को जाते हुये ज्यों ट्रेन खाली
में किसी भी सीट को सुविधाजनक कर बैठ जायें
ठीक वैसे कक्ष से मन के सभी का निष्क्रमण कर
थी तुम्हारी याद बन कर आ घिरी श्यामल घटायें
 
रह गई थी शेष जो परछाईं वो भी थी बुहारी
याद आई आज मुझको सूचना के बिन तुम्हारी
 
पार कर स्पैम फ़िल्टर आ गईं ज्य जंक मेलें
कोई अंकुश जिस तरह उनको नियंत्रित कर न पाये
उस तरह ही याद के दीपक तुम्हारे,बातियों बिन
बन गये दीपावली के दीप रह रह झिलमिलाये
 
खींच कर हर कोण पर बस एक ही आकृति तुम्हारी
याद आई आज मुझको सूचना के बिन तुम्हारी

Monday, March 4, 2013

बोल हैं कि वेद की ऋचाएं

 
 
शब्द शब्द होंठ पर चढ़ा लगे  भोजपत्र पर लिखी कथाएं हैं 
स्वर में जब ढला तो प्रश्न ये उठा,बोल हैं कि वेद  की  ऋचाएं  हैं 
 
सांस में मलय वनों की गंध ले बांसुरी की तान जैसे गात पर 
सात रंग की उठाये तूलिका रेख खींचता है भागु हाथ पर 
देवलोक के सलिल प्रवाह सा रूप व्योम भूमि पे  दमक रहा 
यों लगे की कांति सूर्य मांग कर शीश पर चढ़े हुए चमक रहा 
 
गंध  देह की समेट कर चलीं काननों में प्रीतमय हवाएं हैं 
बोलती तो हर कली ये पूछती बोल हैं कि वेद  की  ऋचाएं  हैं  
 
सप्त सिंधु नीर के भरे कलश होड़ कर रहेकिपाँव धो सकें 
पुष्प हरसिंगार के मचल रहे स्पर्श पाके धन्य आज हो सकें 
रोम रोम क्यारियाँ हैं केसरी रक्त वर्ण शतदलों से पग लिए
कल्पना उतर रही है देह धर,पुष्प-धन्व  और साथ शर लिए  
 
दृष्टि भेद कर उतरती शिंजिनी , थरथरा रही सभी शिराएँ हैं 
और घंटियाँ गले में गूंजती, बोल हैं कि वेद  की  ऋचाएं  हैं   
 
शिल्प के सरोवरों के स्रोत सी प्रेरणा अजन्ता भित्तिचित्र की 
छंद में जडी है प्रिय प्रवास के इन्द्रलोक से उतर के उर्वशी 
फूल में है रंग औ सुगंध बन भोर सद्यस्नात है प्रयाग की 
ले मल्हार सावनी है या कहो है उमंग रंग और फाग की 
 
शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी निशा चन्द्रमा की खिल रही कलाएं हैं
चांदनी भी गीत गा रही सुनो बोल हैं कि वेद  की  ऋचाएं  हैं  

Monday, February 18, 2013

ये कैदे बामशक्कत

ये कैदे बामशक्कत जो तूने की अता है
मैं सोचता हूँ पाया किस बात का सिला है


दीवार हैं कहाँ जो घेरे हुए मुझे है
है कौन सी कड़ी जो बांधे हुए पगों को
मुट्ठी में भींचता है इस दिल को क्या हवाएं
है कौन सा सितम जो बांधे हुए रगों को
धमनी में लोहू जैसे जम कर के रुक गया है
धड़कन को ले गया है कोई उधार जैसे
साँसों की डोरियों में अवगुंठनों के घेरे
हर सांस मांगती है मज़दूरियों के पैसे

ये कौन से जनम की बतला मुझे खता है
जो कैदे वामाशाक्कत ये तूने की अता है
हो काफ़िये के बिन ज्यों ग़ज़लों में शेर कोई
बहरो वज़न से खारिज आधी लिखी रुबाई
इस ज़िंदगी का मकसद बिखरा हुआ सिफर है
स्याही में घुल चुकी है हर रात की जुन्हाई
आवारगी डगर की हैं गुमशुदा दिशायें
हर दर लगाये आगल उजड़े हुये ठिकाने
कल की गली में खोया लो आज ,कल हुआ फिर
अंजाम कल का दूजा होगा ये कौन माने

खाली फ़लक से लौटी दिल की हर इक सदाहै
क्या कैदे बामशक्कत ये तूने की अता है

काँधे की एक झोली उसमें भी हैं झरोखे
पांवों के आबलो की गिनती सफर न गिनता
सुइयां कुतुबनुमा की करती हैं दुश्मनी अब
जाना किधर है इसका कोई पता ना मिलता
हर एक लम्हा मिलता होकर के अजनबी ही
अपनी गली के पत्थर पहचान माँगते हैं
सुबह से सांझ सब ही सिमटे हैं दो पलों में
केवल अँधेरे छत बन मंडप सा तानते हैं

अपना कहीं से कोई मिलता नहीं पता है
क्या कैदे बामशक्कत ये तूने की अता है।

Monday, February 4, 2013

अभी गीत कोई नहीं होंठ छूता

अभी गीत कोई नहीं होंठ छूता  अभी भाव मन के सभी नींद में हैं
रही रोशनी  श्याम चूनर लपेटे, अभी कल्पनाएँ गगन सीप में हैं 
लहर कोई उमड़ी नहीं सिन्धु में जो किनारे से जा बात कोई संवारे
सपन को निमंत्रण रहा भेजता मैं,छुपी दस्तकें अजनबी द्वीप में हैं
 
 
रहे ताकते सरगमों के सभी सुर, हुये तार खामोश सारंगियों के
फ़िसल्ती रही होंठ की कोर पर से गज़ल ने कोई नज़्म जो गुनगुनाई
उबासी समेटे रहे खिड्कियूं पर सकल सरजना के निमिष लड़खड़ाते
हवाओं की थिरकन रही प्रश्न ओढ़े, न संभव हुआ पत्र कुछ भी सुनाते
 
बिछी पंथ पर दृष्टि की चादरें जो बिना स्पर्श के रह गईं चांदनी सी
क्षितिज के सिरे तक टंगा शून्य केवल धुँआसा न हो कोई आकार उभरा
उठा टुटती डोर के चन्द टुकड़े नहीं उंगलियां बुन सकी हैं दुशाला
ना आया पुन:: चित्र बन सामने भी गया डूब स्मृति की गली में जो मुखड़ा
 

बुने मंत्र जितने कभी साधना को नहीं कोई सुर की चढ़ा  पालकी में
रही दीप की वर्तिका थरथराती ना ढाढस अनिश्चय ने कोई बंधाया
सूना था टपकती सुधा है निशा में,टंके  व्योम पर चौदहवें चन्द्रमा से
हथेली बढी ड़ी की बढी रहगई  है  नहीं आंजुरी में अभी कुछ समाया

Sunday, February 3, 2013

नया आज इतिहास लिखें हम

नया आज इतिहास लिखें हम
 
लिखें कथायें जो अंकित हैं आज हुईं युग की करवट पर
शासन का अधिकार हाथ में लेकर यहाँ शिखंडी बैठे
धूर्त शकुनि के अभिमंत्रित पासों से कर गठजोड़ निरन्तर
हर बाजी पर अपनी जय का कर प्रबन्ध मन में हैं ऐंठे
 
यह भी लिखें कलम कहती है जितना लिखे वही पड़ता कम
नया आज इतिहास लिखें हम
 
लिखें गल्प का नाम पा गये यहाँ सभी वे नाम सुने जो
भगतसिंह,बटुकेश्वर, बिस्मिल सभी अलिफ़-लैला के किस्से
बोस ,शिवा,आज़ाद तांतिया सभी कल्पना की उड़ान थे
दरबारी हर एक अपरिचित होकर रहा सदा ही जिससे
 
लिखें उजाले को दोपहरी में आ निगल लिया करता तम
नया आज इतिहास लिखें हम
 
लिखें देश में चीर हरण की घटना होती थी रोजाना
लिखें नित्य ही दुशासन के अट्टहास से दिशा गूँजती
लिखें यहां पर न्यायपालिका रही कैद होकर मुट्ठी में
लिखें अंधेरे में अन्धों को यहां दूर की रही सूझती
 
लिखें यहां पर पीर देख कर आंख नहीं हो पाती थी नम
नया आज इतिहास लिखें हम
 
 
लिखें यहां पर आदर्शों की नई एक पीढ़ी जन्मी थी
यहां पान की दोकानें पर होती रहीं समस्यायें हल
छिद्रान्वेषण को तत्पर थी रही मानसिकता जन जन की
यहां भगीरथ रखे कैद में अपनी ही ला गंगा का जल
 
हर दिन ऐसा पहले जैसा कोई भी तो हुआ नहीं सम
नया आज इतिहास लिखें हम
 
लिखें यहाँ पर प्रतिपादित थी नित ही नूतन परिव्हाषायें
जिसका जैसा मन उसने था वैसा ही निष्कर्ष निकाला
लिखें प्रतिष्ठा पा लेने की अभिनव आकाँक्षा पलती थीं
लिखें पूज्य वह हुआ किया हि जिसने बड़ा कोई घोटाला
 
आर्त्तनाद को ढक लेती थी लिखें यहाँ पायल की छम छम
नया आज इतिहास लिखें हम.