Monday, July 21, 2014

किसी की अधूरी कहानी

समय के परों  पर किसी की अधूरी कहानी लिखी ज़िन्दगी ने तड़प के
रहा बीनता जो उमर की  डगर पर झरी स्वप्न की पांखुरी हाथ मलते

लिखीं दॄष्टि की रश्मियाँ जो क्षितिज पर टँगे शून्य को ताकती रह गईं थीं
लिखी भावना की तरंगें ह्रदय के भंवर में उलझती हुई बह गई थीं
लिखा ज़िन्दगी ने हुये शुष्क सावन में घिरता हुआ जेठ का कोप भारी
लिखी जिसकी गलियों से आती बहारें कही दूर ही राह में रह गई थी

लिखी पृष्ठ इतिहास के पर किसी की अधूरी कहानी दिवस  ने पलट के
लिखीं आंसुओं की झड़ी रह गई थी हुई कैद पलकों मे बिन बूंद छलके

अधूरी कहानी शुरू जो हुई थी लिए कुछ सितारे जनम कुंडली मे
सभी शुभ मुहूरत में  ले लाभ का धन खड़े द्वार आकर के इक मंडली में 
मगर भाग्य के एक तिरकौन  से जब छनी रश्मियाँ वक्र होकर चली तो 
लिखी वह कहानी हथेली की रेखा हुई श्याम लटकी गली संदली में 

लिखी भोज के झरझरे पत्र पर इक, किसी की अधूरी कहानी घटित ने 
रही एक अस्पष्ट सी पर लिखावट हुए पृष्ठ बेरंग पर अब समय के 

बदलती रही साथ मन्वन्तरों के मगर हो रही बस अधूरी कहानी
बंधी रह गई बढ़ रही बंदिशों में, चली एक नदिया सी बहती रवानी 
कटी उद्गमों से चली तो सफर में बिना मंज़िलों का पता साथ लेकर 
कहानीनिगारों की नाकामियों पर, रही खिलखिलाती अधूरी कहानी

लिखी लेखनी ने किसी की अधूरी कहानी यहाँ आज फिर गीत बनके 
मगर शब्द फिर रह गये हैं अधूरे, मसी न बनी दृग से जो अश्रु ढलके

Monday, June 30, 2014

मिली ही नहीं व्याकरण की गली

हम भटकते रहे काव्य के गांव में
पर मिली ही नहीं व्याकरण की गली
आंजुरी में भरी शब्द की पंखुरी
सँग उड़ा ले गई इक हवा मनचली
 
चाह थी कुंडली का पता कुछ चले
डोर परिचय की बांधें नई छन्द से
मुक्तकों के महकते हुए बाग में
साँस भर जाये रसगीत की गंध से
सोरठे अंकुरित हो जहाँ पर रहे
मिल सकें अक्षरों को वही क्यारियाँ
ड्यौढ़ियों से  सवैय्यों की मिलती हुई
हौं जहाँ पर कवित्तों की फुलवारियाँ
 
भोर उगती रही है जहाँ पद्य की
गद्य की सांझ जा मोड़ जिसके ढल्ली
ढूँढ़ता हूँ वही व्याकरण की गली
 
गुनगुनाती रही एक कामायनी
जिस जगह फूल साकेत के थे खिले
सूर का सिन्धु उमड़ा निरन्तर बहा
बोल मीरा की थे भावना को मिले
मंत्र के बीज बोकर गई थी जहाँ
वाहिनी हंस की,बीन झंकार कर
मानसी गंग तुलसी प्रवाहित किये
राम का नाम बस एक उच्चार कर
 
मृग सी तृष्णा लिये मन भटकता रहा
होंठ पर प्यास उगती रही बस जली
पर मिली ही नहीं व्याकरण की गली
 
कोई नवगीत हो न सका पल्लवित
शब्द  अनुशासनों में नहीं बँध सके
भाव बैसाखियों पर टिके रह गये
एक पग छन्द की ओर न चल सके
रागिनी,राग के प्रश्नपूरित नयन
भोर से सांझ तक ताकते रह गये
शब्द जो एक पल होंठ पर आ रुके
वे सभी मौन की धार में बह गये
 
और फिर पूर्णता के बिना रह गयी
आस जो एक मन में सदी से पली
क्योंकि मिल न सकी व्याकरण की गली

Monday, May 19, 2014

वात्सल्य का कम्बल

 
हृदय के प्रथम स्पंदन से नभों के सातवें तट तक 
लपेटा ज़िंदगी ने हर घड़ी वात्सल्य का कम्बल 
 
ठिठुरती ठण्ड मे बनता रहा है स्रोत ऊष्मा का
 बरसते मेंह में छाता बना है शीश पर तन कर 
मरुस्थल के तपे पथ पर चले हैं पांव जब दो डग
घिरा है उस घड़ी नभ पर उमड़ती बदलियाँ  बन कर 
 
सुधी के दूर तक फैले हुये विस्तार में अपने
परस की गंध को बुनता रहा हर इक घड़ी हर पल 
 
थिरकता जल तरंगों सा छुअन पुरबाइयों की ले
सदा अनुराग भरता हो शहद भीगा हुआ चन्दन
किनारी के सिरे छूकर दिवस की अलगनी पे आ
लटकते भोर के सँग में बहारों से लदे मधुवन
 
मिला है ज़िन्दगी को ये सहज वरदान बन कर के
विगत के कोटि पुण्यों का प्रसादी रूप यह प्रतिफ़ल
 
भ्रमों की धुंध ने जब भी उपेक्षायें कभी की हैं
घनेरे हो गये है और इसके रँगमय धागे
उॠण होती नहीं है ज़िन्दगी की सांस इन इससे
न इसने कर्ज के लेखे कभी अपने कहीं माँगे

जुलाहे ने बुना इसको पिरो कर लक्ष चौरासी
निरंतर तंतुओं का प्रीत में डूबा हुआ हर बल

Monday, March 24, 2014

कुछ भीगी तानें होली की

हो गया आज आतुर यह मन, जाने को उस इक बस्ती में
चंगों पर जहाँ ठुमकती हों कुछ भीगी तानें होली की
 
घड़ियों की सुइयों से बँधकर हैं चले पांव निशिदिन गति में
हर निमिष डूबता गया दुपहरी की ढलती असफ़ल कृति में
लिखते लिखते चौराहों से जीवन का आत्मकथ्य पल पल
जो नहीं ज़िल्द में बँध पाई उस बिखरी बिखरी सी प्रति में
पर आज बाँध सब तोड़ चला इक पाखी सा विस्तृत हो मन
सुनने गलियों में आवाज़ें   रसियों की  गाती टोली की
चंगों पर जहाँ ठुमकती हों कुछ भीगी तानें होली की
जकड़े   रहता   नकाब  ओढ़ा, कैलेंडर  के  चौखानों  में
रह  जाता है मन  एकाकी इन   भीड़ भरे   वीरानों  में
होठों पर बिखरी कृत्रिमता, आँखों में नजर नहीं आती
इक आग सुलगती  रहती है  अन्तर्तल के तहखानों में
मन कहता सब कुछ छोड़ चलें उस जगह, जहाँ पर गुंजित है
आवाज़ें देवर-चुहलों की, भाभी की हँसी ठिठोली की
चंगों पर जहाँ ठुमकती हों कुछ भीगी तानें होली की
ये ट्विटर फ़ेसबूक के लफ़ड़े, ईमेलों के बढ़ते ववाल
ये हफ़्ते की मीटिंगें बीस, दिन में दस दस कान्फ़्रेन्स काल
ये डेड लाईन के फ़न फ़ैले बढ़ती रिपोर्ट्स की मांगों पर
इक उत्तर के सँग उगते हैं फ़िर से आधा दर्ज़न सवाल
इस सबसे ऊब चुका अब मन, चाहे जाना वृन्दावन में
कुंजों में जहाँ खनकती है, सरगम धुन वंसी बोली की
चंगों पर जहाँ ठुमकती हों कुछ भीगी तानें होली की
वे पनघट, गलियाँ, चौराहे, चौराहों  पर कीकरी  ढेर
सूखी, गोबर की थपी हुई उन पर अटकी अनगिन गुलेर
दादी, नानी का सूत बाँध   हल्दी  कुमकुम से रँग देना
होली पर सभी बलाओं को भस्मित करने के वार- फ़ेर
मन के गलियारों में उपजे फिर चित्र यही दीवारों पर
रह रह कर खेला करता है मन जिनसे आँखमिचौली सी
चंगों पर जहाँ ठुमकती हों कुछ भीगी तानें होली की

Friday, December 13, 2013

मेरा तो बस स्पर्श मात्र है,

 
 

मेरा तो बस स्पर्श मात्र है, यह घनश्याम तुम्हीं कह सकते
तुम ही तो कनकी उंगली पर सकल चराचर को धर रहते
 
मथुरा गोकुल वृन्दावन की, नन्दगांव की वीथि वीथि में
उपवन की अलसाई शीतल कदम्ब कुंज की गहरी छाया
बांसुरिया की टेर निरन्तर एक तुम्हारे इंगित से है
जमना रज ने होकर प्रेरित जिससे प्रतिपल रास रचाया
 
अधर तुम्हारे बिना खुले ही शत शत गीतायें रच सकते
तुम ही तो कनकी उंगली पर सकल चराचर को धर रहते
 
संरचना का कारण तुम ही, और अंत भी तुम ही तो हो
तुम बोते नीहारिकाओं में एक सांस में शंख सितारे
आदि अनादि अनंत अंत सब एक तुम्हारे ही परिचायक
तुमने रचे शब्द, वे भी तो वर्णन करते करते हारे
 
धूप छांह ही तरह रात दिन तुम नूतन लीलायें रचते
तुम ही तो कनकी उंगली पर सकल चराचर को धर रहते
 
गगनों के क्रम से लेकर विस्तार अगिन लोकों का तुमसे
पलकों के विचलन से थिरकें नभ में लक्ष कोटि गंगायें
शांति,वायु,जल, अग्नि धरा सब और शून्य तुम ही हो केवल
एक तुम्हारे स्पर्श मात्र से रचने लगती हैं रचनायें
 
एक तुम्हारे स्पर्श मात्र के लिये अहर्निश वन्दन करते
तुम ही तो कनकी उंगली पर सकल चराचर को धर रहते

Wednesday, December 11, 2013

अंधेरा धरा पर कही रह न जाये

अंधेरा धरा पर कही रह न जाये
 
 
 
 

रखो आज दीपक जलाकर रजत के
या मणियों जड़ी एक बाती जलाओ
रखो पूर कर चौक, आटे का दीपक
या टिमटिम कोई एक् ढिबरी जलाओ
मन याद रखो कि मन के अन्धेरें
हर इक कक्ष में रोशनी जाये पहुँचे
उठो है निमंत्रण तुम्हें वक्त देता
नई एक इक फिर कहानी से सुनाओ
 
है परिवर्तनों की अपेक्षायें तुमसे
कोई कमना अधखिली रह न जाये
 
अंधेरा चढायें है अनगिन मुखौटे
कभी कायदे का कभी सीरिया का
कभी सिन्धु की लहर कर नृत्य करता
कभी वेश धारे यह सोमालिया का
कभी रैलियों में ये विस्फ़ोट करहा
रहा ओढ़ कर स्वार्थ के कुछ कलेवर
न जड़ से मिटे न उभर फिर से आता
लिर्फ़ रूप यह फिर से ट्यूनीसिया सा
 
उठो आज तुम बाल लो एक बाती
अखंडित रहे, हर तिमिर को मिटाये
 
तिमिर कितना धर्मान्धता का बड़ा है
रहा रोकता ये मलालायें कितनी
मदरसों में तालीम का ले बहाना
रहा बोता नफ़रत की ज्वालायें कितनी
चलो आओ संकल्प लें इक नया अब
अंधेरा भरे ज्ञान की रोशनी से
रहे हर जगह पूर्व का ही सवेरा
जला कर रखें हम पताकायें इतनी
नई कूचिया ले लिखें नव कथानक
ये इतिहास खुद को कभी दुहरा न पाये
 

Monday, December 9, 2013

पग में गति आती है, छाले छिलने से..

पग में गति आती है, छाले छिलने से..
 
बिछुड़ नहीं पाया विश्वास डगर में से
भ्रमित नहीं कर सका मुझे कोई दर्पण
पग में गति आती है छाले छिलने से
बाधाओं से लड़ मैं हो जाता चन्दन
 
पग के छाले बने मेरे स्वर्णाभूषण  
स्वर दिया इन्होंने नव गीतों के छन्दों को
नये शिल्प में ढाला दृग के आंसू को
नया अर्थ दे दिया प्रीत की गंधों को
 
रहा भूलता बिसराता मैं सब अग जग
ठुकराता मिलते विश्रामों का वैभव
पग के छालों को सुविधायें मान लिया
रखा कोष में अपने प्राप्त हुआ यह धन
 
कब मेरे विद्रोही मन ने स्वीकारा
कटी आस्था टूटी मर्यादा ओढ़ूँ
मैं झरने सा जिधर हुआ मन बढ़ जाता
कभी न ऐसा लगा हठी सम्बल छूड़ूँ
 
आँधी बरसातों से यह मन डिगा नहीं
तूफ़ानिओं में मेरा निश्चय झुका नहीं
गति मैं लेता रहा छिल रहे छालों से
बाधाओं से झूझ महकता बन चन्दन
 
मैं पाथेय सजाता हूँ, सज जाते हैं
पथ पर साथ साथ नौचन्दी के मेले
तारे उगने लगते नभ की क्यारी में
मेरे पग के चिह्न डगर पर से ले ले
 
संध्या नीड़ लिये आती अगवानी में
नई गंध भर जाती निशि की रानी में
गति, गति लेती मेरे पग के छालों से
और चेतना पाया करती नवजीवन
 
चूड़ी,महावर,काजल,मेंहदी,कुमकुम से
बँधे एक पल, पर मेरे पग रुके नहीं
अवरोधों के झंझावात घने उभरे
पर मेरे संकल्प जरा भी झुके नहीं
 
मैं बन रहा उदाहरण नव इतिहासों का
गति से रिश्ता जुड़ा हुआ है सांसों का
पग में गति आती है छाले छिलने से
वाक्य हुआ यह यात्राओं का सम्बोधन.