फूलों की पांखुर से फ़िसक रही शबनम सी
साज की मुंडेरों पर थिरक रही सरगम सी
सन्ध्या के आँचल में टाँक रही गुलमोहर
निशिगन्धी महकों में लिपट खड़े मधुवन सी
याद कोई सपना बन, आंखों में तैर गई
उस पल पर जीवन की एक सांस ठहर गई
गंगा की धारा में मांझी के गीतों सी
दादी से सुनी हुई पुरखों की रीतों सी
चम्पा के सिरहाने, जूही के गजरों सी
घूँघट से झाँक रही दुल्हन की नजरों सी
याद कोई सपना बन आँखों में तैर गई
उस पल पर जीवन की एक सांस ठहर गई
लहरों की दस्तक सी, सरिता के कूलों पर
बरखा की बून्दों सी, सावन के झूलों पर
चाँदनी में भीग रहे उपवन के प्रांगण में
पुरबा की सिहरन सी मुस्काते फूलों पर
याद कोई सपना बन, नयनों में तैर गई
उस पल पर जीवन की एक सां स ठहर गई
Thursday, June 17, 2010
Monday, May 31, 2010
मन का इकतारा अब केवल
पता नहीं किसका प्रभाव लज्जा के बन्धन खोले है
मन का इकतारा अब केवल तुमही तुमही बोले है
ओढ़ी हुई एक कमली की छायायें हो गईं तिरोहित
नातों की डोरी के सारे अवगुंठन खुल कर छितराये
बांधे अपने साथ सांस को द्रुत गति चले समय के पहिये
उगी भोर के साथ साथ ही संध्या के बादल घिर आये
वनपाखी मन द्वार तुम्हारे आने को पर तोले है
मन का इकतारा अब केवल तुमही तुमही बोले है
कालिन्दी तट हो, सरयू हो पुष्पकुंज सुरपुर के चाहे
गन्धों के हर इक झोंके में सिमटे आई चित्र तुम्हारे
जुड़ कर रही नाम के अक्षर से सुधि की रेखायें सारीं
घिरे रात के अंधियारे हों या दोपहरी के उजियारे
संवरा शब्द अधर पर जब भी नाम तुम्हारा बोले है
मन का इकतारा अब केवल तुमही तुमही बोले है
आईने के नयनों में जो बिम्ब संवरता तुम ही तो हो
तुम ही को तो झील बना कर चित्र टाँक देती बादल पर
तुमही तो हो बने अल्पना मन के बिछे हुए आंगन में
तुम ही हो चूनर प्राची की,तुम अंकित निशि के आंचल पर
धड़कन का पटवा सांसों की डोरी में तुमको पो ले है
मन का इकतारा अब केवल तुमही तुमही बोले है
मन का इकतारा अब केवल तुमही तुमही बोले है
ओढ़ी हुई एक कमली की छायायें हो गईं तिरोहित
नातों की डोरी के सारे अवगुंठन खुल कर छितराये
बांधे अपने साथ सांस को द्रुत गति चले समय के पहिये
उगी भोर के साथ साथ ही संध्या के बादल घिर आये
वनपाखी मन द्वार तुम्हारे आने को पर तोले है
मन का इकतारा अब केवल तुमही तुमही बोले है
कालिन्दी तट हो, सरयू हो पुष्पकुंज सुरपुर के चाहे
गन्धों के हर इक झोंके में सिमटे आई चित्र तुम्हारे
जुड़ कर रही नाम के अक्षर से सुधि की रेखायें सारीं
घिरे रात के अंधियारे हों या दोपहरी के उजियारे
संवरा शब्द अधर पर जब भी नाम तुम्हारा बोले है
मन का इकतारा अब केवल तुमही तुमही बोले है
आईने के नयनों में जो बिम्ब संवरता तुम ही तो हो
तुम ही को तो झील बना कर चित्र टाँक देती बादल पर
तुमही तो हो बने अल्पना मन के बिछे हुए आंगन में
तुम ही हो चूनर प्राची की,तुम अंकित निशि के आंचल पर
धड़कन का पटवा सांसों की डोरी में तुमको पो ले है
मन का इकतारा अब केवल तुमही तुमही बोले है
Tuesday, April 27, 2010
आज लगा अपवाद हो गये
जो अपने से हो न सका है अब तक वह संवाद हो गये
एक अजनबी सी भाषा का अनचाहा अनुवाद हो गये
कथाकार तो राजद्वार पर चाटुकारिता में उलझे थे
इसीलिये संदेसे जितने नीतिपरक थे गौण रह गये
ललित भैरवी के पदचिह्नों पर चल पाने में अक्षम था
बंसी के स्वर सारंगी की ओढ़ उदासी मौन रह गये
बलिदानों के इतिहासों पर जमीं धूल की मोटी परतें
जहाँ प्राप्ति गलहार बनी थी,केवल वह पल याद हो गये
रथवाहों का कार्य शेष बस द्वारे तक रथ को पहुँचना
मत्स्य वेध का कौशल भी तो नहीं धनुर्धर में अब बाकी
चीरहरण के नाटक में सब पात्र भूमिका भूल गये हैं
कितना कुछ अभिनीत हो गया,कितनी शेष अभी है झांकी
जयमालों के सम्मोहन ने सब कुछ भुला दिया है मन को
आर्त्तनाद के स्वर द्वारे तक आये तो जयनाद हो गये
अक्षर अक्षर चिन चिन रखते कविताओं के कारीगर तो
सहज भावना को शब्दों का कोई रूप नहीं दे पाता
मल्हारों के मौसम में भी राजगायकी के लालच में
कुशल गवैय्या भी अब केवल मालकोंस ही मिलता गाता
कविता तो बन गई चुटकुला मंचों की आपाधापी में
गीत गज़ल के सभी उपासक आज लगा अपवाद हो गये
एक अजनबी सी भाषा का अनचाहा अनुवाद हो गये
कथाकार तो राजद्वार पर चाटुकारिता में उलझे थे
इसीलिये संदेसे जितने नीतिपरक थे गौण रह गये
ललित भैरवी के पदचिह्नों पर चल पाने में अक्षम था
बंसी के स्वर सारंगी की ओढ़ उदासी मौन रह गये
बलिदानों के इतिहासों पर जमीं धूल की मोटी परतें
जहाँ प्राप्ति गलहार बनी थी,केवल वह पल याद हो गये
रथवाहों का कार्य शेष बस द्वारे तक रथ को पहुँचना
मत्स्य वेध का कौशल भी तो नहीं धनुर्धर में अब बाकी
चीरहरण के नाटक में सब पात्र भूमिका भूल गये हैं
कितना कुछ अभिनीत हो गया,कितनी शेष अभी है झांकी
जयमालों के सम्मोहन ने सब कुछ भुला दिया है मन को
आर्त्तनाद के स्वर द्वारे तक आये तो जयनाद हो गये
अक्षर अक्षर चिन चिन रखते कविताओं के कारीगर तो
सहज भावना को शब्दों का कोई रूप नहीं दे पाता
मल्हारों के मौसम में भी राजगायकी के लालच में
कुशल गवैय्या भी अब केवल मालकोंस ही मिलता गाता
कविता तो बन गई चुटकुला मंचों की आपाधापी में
गीत गज़ल के सभी उपासक आज लगा अपवाद हो गये
Thursday, April 15, 2010
तुमने जो दे दी मंजूरी
यादों की पुस्तक के खुल कर लगे फ़ड़फ़ड़ाने वे पन्ने
जिन पर अंकित, मेरे प्रस्तावों को तुमने दी मंजूरी
पाणि ग्रहण के पावन पल की वह मॄदु बेला याद आ गई
नयनों की फुलवारी में जब रंग बिरंगे फूल खिले थे
मंत्रोच्चार जगाता था जब अनचीन्ही हर एक भावना
भावों का अतिरेक उमड़ता और मौन से अधर सिले थे
दीपशिखा के नयनों से उठ रहे धुए से बातें करती
लगती थी मंडप में उड़ती हुई गंध पावन कर्पूरी
जो पुरूरवा के अधरों ने लिखी उर्वशी के कपोल पर
भुजपाशों में बांध शची को जोकि पुरन्दर ने दोहराई
वह गाथा अँगड़ाई लेकर फिर मन में जीवन्त हो ग
पुलकित हुईं भावनाऒं में डूब डूब सुधियाँ बौराईं
हैं सुधियों में जगमग जगमग दीवाली के दिये बने वे
निमिष भीगकर हुई चाँदनी जिनमें सहसा ही सिन्दूरी
एक बिन्दु पर जहां धरा से मि्ला गगन बाँहें फ़ैलाकर
जहाँ शून्य के स्वर से मिल कर मन की वाणी छंद हो गई
जब अतॄप्ति की तॄषा पा गई अकस्मात ही सुधा कलश को
उस पल उड़ी धूल पतझड़ की भी जैसे रसगंध हो गई
खोल रहे मन वातायन पट, सुरभित वही हवा के झोंके
जिनमें तुमने घोल रखी है अपने तन मन की कस्तूरी
जिन पर अंकित, मेरे प्रस्तावों को तुमने दी मंजूरी
पाणि ग्रहण के पावन पल की वह मॄदु बेला याद आ गई
नयनों की फुलवारी में जब रंग बिरंगे फूल खिले थे
मंत्रोच्चार जगाता था जब अनचीन्ही हर एक भावना
भावों का अतिरेक उमड़ता और मौन से अधर सिले थे
दीपशिखा के नयनों से उठ रहे धुए से बातें करती
लगती थी मंडप में उड़ती हुई गंध पावन कर्पूरी
जो पुरूरवा के अधरों ने लिखी उर्वशी के कपोल पर
भुजपाशों में बांध शची को जोकि पुरन्दर ने दोहराई
वह गाथा अँगड़ाई लेकर फिर मन में जीवन्त हो ग
पुलकित हुईं भावनाऒं में डूब डूब सुधियाँ बौराईं
हैं सुधियों में जगमग जगमग दीवाली के दिये बने वे
निमिष भीगकर हुई चाँदनी जिनमें सहसा ही सिन्दूरी
एक बिन्दु पर जहां धरा से मि्ला गगन बाँहें फ़ैलाकर
जहाँ शून्य के स्वर से मिल कर मन की वाणी छंद हो गई
जब अतॄप्ति की तॄषा पा गई अकस्मात ही सुधा कलश को
उस पल उड़ी धूल पतझड़ की भी जैसे रसगंध हो गई
खोल रहे मन वातायन पट, सुरभित वही हवा के झोंके
जिनमें तुमने घोल रखी है अपने तन मन की कस्तूरी
Monday, April 5, 2010
टिप्पणी ब्लाग ई मेल और पत्तागोभी के रसगुल्ले
भाई साहब, आप हमारे ब्लाग पोअर पधारें और अपनी अमूल्य टिप्पणी से नवाजें
लगभग रोजाना ही कम से कम ऐसे दस- बारह सन्देश ई मेल के बक्से में मिल जाते हैं. मन में एक प्रश्न उठता है क्यों भाई क्यों पढ़ें हम तुम्हारे ब्लाग को ? हम अपनी पसन्द के लेख अपने आप नहीं छा~ट सकते क्या ?ब्लागवाणी और चिट्ठाजगत जो कल तक हमारी सहायता करते रहे हैं क्या वे बन्द हो गये हैं जो आप अपने बहुमूल्य (?) समय में से समय निकाल कर हमें लिन्क भेज रहे हैं या आपने हमको इतना अज्ञानी समझा है कि हम अपनी पसन्द के चिट्ठे और उन पर हुई पोस्ट न ढूँढ़ सकें जो आप हमारी सहायता करने पर तत्पर हैं.
ठीक है भाइ. हमने मान लिया कि हमें आपके चिट्ठे की जानकारी नहीं है परन्तु जबरदस्ती आप हमारे गले में तो मत ठूंसिये. और अगर बुला भी लिया आपने इस बहाने अपने चिट्ठे पर तो यह क्यों जरूरी है कि हम टिप्पणी भी दें.यह तो यूँ हुआ
भेज रहे हैं नेह निमंत्रण प्रियवर तुम्हें बुलाने को
वालेट अपना संग में लाना बिल चुकता कर जाने को
निमंत्रण तो है ही आने का और फिर आने का हर्जाना भी भुगतें ? न बाबा न.
तुम ई मेल लिखो या चिट्ठे हमको फ़र्क नहीं पड़ता है
मन की तो ऐसी मर्जी है जो चाहे बस वह पढ़ता है
गीत लिखो या नज़्म रचो तुम गज़लें गाओ याकि कहानी
याकि संवारो नये रूप में रोज रोज कविता कल्याणी
लिखो धर्म की बातें या फिर हमको योग तनिक सिखलाओ
और भली ही पंचम सुर में गाना मालकौंस सिखलाओ
माऊस मेरे कम्प्यूटर का लिन्कें क्लिक नहीं करता है
मन की तो ऐसी मर्जी है जो चाहे बस वह पढ़ता है
सिखलाओ तुम कैसे बनते पत्तागोभी के रसगुल्ले
कैसे करें निवेश और फिर कैसे बैठे रहें निठल्ले
राजनीति के दांवपेंच हों ,नक्षत्रों की टेढ़ी चालें
कहां हजम करती हैं चारा कागज़ पर चलती घुड़सालें
नहीं जानना हमको, हमको तो प्यारी अपनी जड़ता है
मन की तो ऐसी मर्जी है जो चाहे बस वह पढ़ता है
तो भाई अपने समय का सदुपयोग आप हमारे लिये न करें. हम आपके निमंत्रण पर न तो आपके ब्लाग पर आने वाले हैं और न ही टिप्पणी करने वाले. आप यह क्यों भूल जाते हैं कि अगर आपकी रचना में दम होगा, आपके लेख में गुंजायश होगी तो पाठक अपने आप ही टिप्पणी दे देगा बरसों पहले दूरदर्शी श्री श्री रहीम दास जी( उन्की आत्मा या रूह से क्षमायाचना सहित )कह गये थे न
बिन मांगे मोती मिले मांगे मिले न भीख
असर लेख में मूढ़ कर, यह सद्गुरु की सीख
और आशा करता हूं कि आपके ईमेल आईडी को मेरा खाता स्पैम करार देकर अवांछित न बना दे.
लगभग रोजाना ही कम से कम ऐसे दस- बारह सन्देश ई मेल के बक्से में मिल जाते हैं. मन में एक प्रश्न उठता है क्यों भाई क्यों पढ़ें हम तुम्हारे ब्लाग को ? हम अपनी पसन्द के लेख अपने आप नहीं छा~ट सकते क्या ?ब्लागवाणी और चिट्ठाजगत जो कल तक हमारी सहायता करते रहे हैं क्या वे बन्द हो गये हैं जो आप अपने बहुमूल्य (?) समय में से समय निकाल कर हमें लिन्क भेज रहे हैं या आपने हमको इतना अज्ञानी समझा है कि हम अपनी पसन्द के चिट्ठे और उन पर हुई पोस्ट न ढूँढ़ सकें जो आप हमारी सहायता करने पर तत्पर हैं.
ठीक है भाइ. हमने मान लिया कि हमें आपके चिट्ठे की जानकारी नहीं है परन्तु जबरदस्ती आप हमारे गले में तो मत ठूंसिये. और अगर बुला भी लिया आपने इस बहाने अपने चिट्ठे पर तो यह क्यों जरूरी है कि हम टिप्पणी भी दें.यह तो यूँ हुआ
भेज रहे हैं नेह निमंत्रण प्रियवर तुम्हें बुलाने को
वालेट अपना संग में लाना बिल चुकता कर जाने को
निमंत्रण तो है ही आने का और फिर आने का हर्जाना भी भुगतें ? न बाबा न.
तुम ई मेल लिखो या चिट्ठे हमको फ़र्क नहीं पड़ता है
मन की तो ऐसी मर्जी है जो चाहे बस वह पढ़ता है
गीत लिखो या नज़्म रचो तुम गज़लें गाओ याकि कहानी
याकि संवारो नये रूप में रोज रोज कविता कल्याणी
लिखो धर्म की बातें या फिर हमको योग तनिक सिखलाओ
और भली ही पंचम सुर में गाना मालकौंस सिखलाओ
माऊस मेरे कम्प्यूटर का लिन्कें क्लिक नहीं करता है
मन की तो ऐसी मर्जी है जो चाहे बस वह पढ़ता है
सिखलाओ तुम कैसे बनते पत्तागोभी के रसगुल्ले
कैसे करें निवेश और फिर कैसे बैठे रहें निठल्ले
राजनीति के दांवपेंच हों ,नक्षत्रों की टेढ़ी चालें
कहां हजम करती हैं चारा कागज़ पर चलती घुड़सालें
नहीं जानना हमको, हमको तो प्यारी अपनी जड़ता है
मन की तो ऐसी मर्जी है जो चाहे बस वह पढ़ता है
तो भाई अपने समय का सदुपयोग आप हमारे लिये न करें. हम आपके निमंत्रण पर न तो आपके ब्लाग पर आने वाले हैं और न ही टिप्पणी करने वाले. आप यह क्यों भूल जाते हैं कि अगर आपकी रचना में दम होगा, आपके लेख में गुंजायश होगी तो पाठक अपने आप ही टिप्पणी दे देगा बरसों पहले दूरदर्शी श्री श्री रहीम दास जी( उन्की आत्मा या रूह से क्षमायाचना सहित )कह गये थे न
बिन मांगे मोती मिले मांगे मिले न भीख
असर लेख में मूढ़ कर, यह सद्गुरु की सीख
और आशा करता हूं कि आपके ईमेल आईडी को मेरा खाता स्पैम करार देकर अवांछित न बना दे.
Monday, March 29, 2010
बस वही बिकते नहीं हैं
भेजते हैं ज़िन्दगी को पल निराशा के निमंत्रण
और अस्वीकार करने को, पता लिखते नहीं हैं
द्वार पर आते लिपट कर भोर की अँगड़ाईयों में
मुस्कुराते हर दुपहरी धूप की परछाईयों में
और जब सिन्दूर भरती मांग में संध्या लजाकर
उस घड़ी सन्देश भरते गूँजती शहनाईयों में
रात के पथ में बिछे रहते संवरते स्वप्न के संग
हां अगोचर हैं, तभी प्रत्यक्ष ये दिखते नहीं हैं
स्वर उमड़ता है गले से कुछ कहे, पर रीत जाता
उत्तरों के व्यूह में घिर प्रश्न सहसा बीत जाता
शब्द की गोलाईयों में भूलतीं अनुभूतियां पथ
भाव हो जाता विफ़ल इक बार फिर से, गीत गाता
आस ने भर अंक अपने रात दिन पाला जिन्हें था
खो गये वे प्रीत के पल आजकल मिलते नहीं हैं
उग रहे हैं शाख पर दिन की निरन्तर पत्र काले
झर चुके हैं पतझरों के साथ, हो बूढ़े उजाले
दिख नहीं पाती कलाई भी बिना अब आरसी के
लड़खड़ाती गिर रही धड़कन नहीं संभले, संभाले
सांस के सौदाई थैली खोल कर पथ में खड़े हैं
चाहते हैं क्रय जिन्हें कर लें, वही बिकते नहीं हैं
और अस्वीकार करने को, पता लिखते नहीं हैं
द्वार पर आते लिपट कर भोर की अँगड़ाईयों में
मुस्कुराते हर दुपहरी धूप की परछाईयों में
और जब सिन्दूर भरती मांग में संध्या लजाकर
उस घड़ी सन्देश भरते गूँजती शहनाईयों में
रात के पथ में बिछे रहते संवरते स्वप्न के संग
हां अगोचर हैं, तभी प्रत्यक्ष ये दिखते नहीं हैं
स्वर उमड़ता है गले से कुछ कहे, पर रीत जाता
उत्तरों के व्यूह में घिर प्रश्न सहसा बीत जाता
शब्द की गोलाईयों में भूलतीं अनुभूतियां पथ
भाव हो जाता विफ़ल इक बार फिर से, गीत गाता
आस ने भर अंक अपने रात दिन पाला जिन्हें था
खो गये वे प्रीत के पल आजकल मिलते नहीं हैं
उग रहे हैं शाख पर दिन की निरन्तर पत्र काले
झर चुके हैं पतझरों के साथ, हो बूढ़े उजाले
दिख नहीं पाती कलाई भी बिना अब आरसी के
लड़खड़ाती गिर रही धड़कन नहीं संभले, संभाले
सांस के सौदाई थैली खोल कर पथ में खड़े हैं
चाहते हैं क्रय जिन्हें कर लें, वही बिकते नहीं हैं
Monday, February 15, 2010
जो हैं वही तुम्हारे होंगे
जो दर्पण से बिछुड़ गये हैं
वे प्रतिबिम्ब हमारे होंगे
सपनों से जुड़ सके नहीं तो
द्रवित नयन के तारे होंगें
संघर्षों की खिली धूप में
पांव तले खोती परछाईं
तपी आग की छाया पीती
चेहरे पर छाई अरुणाई
खुली उंगलियां पकड़ न पातीं
आशा की चादर के कोने
चाहत रहती बन कर रानी
किसी मंथरा की बहकाई
जो हैं बँधे रहे बंधन में
वे ही बहते धारे होंगें
उड़ते हैं जो बादल जैसे
वे संकल्प हमारे होंगे
दॄष्टि पलक की सीमाओं से
आगे जाकर नहीं विचरती
और खिलखिलाहट होठों की
दहलीजों से नहीं बिखरती
अपने ही प्रश्नों के उत्तर में
फिर प्रश्न उठाता है मन
शंकाओं की बस तस्वीरें
रह रह बनतीं और बिगड़ती
जो पल हैं कर चुके समर्पण
फिर जीवित भिनसारे होंगें
हार मान कर ज्पो गर्वित हैं
ढीठ और बजमारे होंगे
पछतावा करता है अपने
दोषों पर मन ही मन कोई
सज्जित करता है समाधि को
अपनी फूल लगा कर कोई
उठी हुई नजरों के आगे
मौन मुस्कुराता रह जाता
पीड़ाओं के अनुबन्धों को
निभा रहा पल पल पर कोई
एक उसी की सांस सांस में
मचले हुए शरारे होंगे
कुछ ऐसे हैं प्रहर, हमारे
जो हैं वही तुम्हारे होंगे
वे प्रतिबिम्ब हमारे होंगे
सपनों से जुड़ सके नहीं तो
द्रवित नयन के तारे होंगें
संघर्षों की खिली धूप में
पांव तले खोती परछाईं
तपी आग की छाया पीती
चेहरे पर छाई अरुणाई
खुली उंगलियां पकड़ न पातीं
आशा की चादर के कोने
चाहत रहती बन कर रानी
किसी मंथरा की बहकाई
जो हैं बँधे रहे बंधन में
वे ही बहते धारे होंगें
उड़ते हैं जो बादल जैसे
वे संकल्प हमारे होंगे
दॄष्टि पलक की सीमाओं से
आगे जाकर नहीं विचरती
और खिलखिलाहट होठों की
दहलीजों से नहीं बिखरती
अपने ही प्रश्नों के उत्तर में
फिर प्रश्न उठाता है मन
शंकाओं की बस तस्वीरें
रह रह बनतीं और बिगड़ती
जो पल हैं कर चुके समर्पण
फिर जीवित भिनसारे होंगें
हार मान कर ज्पो गर्वित हैं
ढीठ और बजमारे होंगे
पछतावा करता है अपने
दोषों पर मन ही मन कोई
सज्जित करता है समाधि को
अपनी फूल लगा कर कोई
उठी हुई नजरों के आगे
मौन मुस्कुराता रह जाता
पीड़ाओं के अनुबन्धों को
निभा रहा पल पल पर कोई
एक उसी की सांस सांस में
मचले हुए शरारे होंगे
कुछ ऐसे हैं प्रहर, हमारे
जो हैं वही तुम्हारे होंगे
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