Wednesday, June 29, 2016

अचल रहे संकल्प, विकल्पों पर विचार का समय नहीं है


अचल रहे संकल्प, विकल्पों पर विचार का समय नहीं है 
हुई व्यवस्था ही प्रधान, जो करे व्यवस्था अभय नहीं है

अभय दान जो मांगा करते उन हाथों में शक्ति नहीं है
पाना है अधिकार अगर तो कमर बांध कर लड़ना होगा
कौन व्यवस्था का अनुयायी? केवल हम हैं या फिर तुम हो
अपना हर संकल्प हमीं को अपने आप बदलना होगा
मूक समर्थन कृत्य हुआ है केवल चारण का भाटों का
विद्रोहों के ज्वालमुखी को फिर से हमें जगाना होगा
रहे लुटाते सिद्धांतों पर और मानयताओं पर् अपना
सहज समर्पण कर दे ऐसा पास हमारे ह्रदय नहीं है

अपराधी है कौन दशा का ? जितने वे हैं उतने हम है
हमने ही तो दुत्कारा है मधुमासों को कहकर नीरस
यदि लौट रही स्वर की लहरें कंगूरों से टकरा टकरा
हम क्यों हो मौन ताकते हैं उनको फिर खाली हाथ विवश
अपनी सीमितता नजरों की अटकी है चौथ चन्द्रमा में
रह गयी प्रतीक्षा करती ही द्वारे पर खड़ी हुई चौदस
दुर्गमता से पथ की डरकर जो ्रहे नीड़ में छुपा हुआ
र्ग गंध चूमें आ उसको, ऐसी कोई वज़ह नहीं है

द्रोण अगर ठुकरा भी दे तो एकलव्य तुम खुद बन जाओ
तरकस भरा हुआ है मत का, चलो तीर अपने संधानो
बिना तुम्हारी स्वीकृति के अस्तित्व नहीं सुर का असुरों का
रही कसौटी पास तुम्हारे , अन्तर तुम खुद ही पहचानो
पर्वत, नदिया, वन उपवन सब गति के सन्मुख झुक जाते हैं
कोई बाधा नहीं अगर तुम निश्चय अपने मन में ठानो
सत्ताधारी हों निशुम्भ से या कि शुम्भ से या रावण से
बतलाता इतिहास राज कोई भी रहता अजय नहीं है.

Tuesday, June 28, 2016

चेतन का संक्रातिकाल है


कातर मन उठ! और थाम ले जो सन्मुख जलती मशाल है
भूल नहीं पल भर को भी यह चेतन का संक्रातिकाल है

गली व्यवस्था को उखाड़ना जड़ से है हाथों में तेरे
तेरा निश्चय ले आएगा परिवर्तन के नए सवेरे
हिले नहीं तेरा अंगदपग निष्ठां पूरी से जो रोपे
हो जाएंगे सभी तिरोहित तेरे पथ में घिरे अँधेरे

उत्तर दे! तेरी साँसों का जो तुझसे जलता सवाल है
भूल नहीं यह पल भर को भी चेतन का संक्रातिकाल है

जितनी चाहे। कर शिकायते  कुछ बदलाव नहीं आएगा
जब तक तू अपने निश्चय को फौलादी न कर पायेगा 
सावित्री के संकल्पों को यदि अपना आधार बना ले
क्या हस्ती भ्रष्टाचारी की,, स्वयं काल भी झुक जाएगा  

दुहरा देख तनिक मिलती इतिहासों में जिसकी मिसाल है
भूल नहीं पल भर को भे एयह चेतन का संक्रान्तिकाल है

जरासन्ध से शिशुपालों की सत्ता कितनी देर टिकी है
धुन्ध सूर्य की प्रखर रश्मियां, आखिर कितनी देर ढकी है
हो हताश मत, कर स्वतंत्र तू अपने चिन्तन को अनुरागी
तुझे विदित परिवर्तन की गति, रोके से भी नहीं रुकी है


रोक न उसको धधक रही जो अन्तर्मन में एक ज्वाल है
भूल नहीं पल भर को भी यह चेतन का संक्रान्तिकाल है

Monday, February 16, 2015

इसलिए आओ हृदय में

नयन ने दिन रात दीपक इक प्रतीक्षा के जलाये
होंठ ने तव नाम सरगम में पिरो कर गीत गाये
साधना के मंत्र रह रह कर तुम्हें उच्चारते है
इसलिए आओ हृदय में, प्यास प्यासी रह न जाए

ज़िंदगी के कक्ष में बढ़ती हुई एकाकियत की
आँधियों में घिर रहा है पूर्ण यह अस्तित्व मेरा
रूप की खिलती हुई जब धूप का सान्निध्य पाउन
सहज ही मिट जाएगा बढता हुआ गहरा अन्धेरा
हर अलक्षित कल्पना के बंधनों को काट आओ
गंध में कस्तूरियों की ताकि मन न छटपटाये
 
ला रहीं पुरबाइयां चन्दन महक अँगनाई द्ववारे
कह रही हैं तुम अगोचर हो भले ,पर पास में हो
मैं तुम्हें अनुभूतियों की गोद में महसूसता हूँ
तुम गगन में रंग जैसे, सांस के विश्वास में हो
केंद्र हो तुम, लक्ष्य हो तुम ध्येय तुम हो अंत तक का
इसलिए आओ हृदय में साध हो सम्पूर्ण जाए
 
सिंधु की लहरें उमड़ती तीर आकर लौट जाती
सौंप कर सिकताओं को कुछ शंख सीपी अंजलि में
मैं विरूपित पुष्प बन कर एक सिकता कण खड़ा हूँ
प्राप्ति की अविरल सुधायें डाल दो कुछ पंखुरी में
 
उठ रहे झंझा झकोरे ताकि मन ना डगमगायें
इसलिये आओ ह्रदय में अर्थ नव सम्बन्ध पाये

Monday, February 9, 2015

मोगरे के फूल पर थी चांदनी सोई हुई



भोर की ले पालकी आते दिशाओं के कहारों 
के पगों की चाप सुनते स्वप्न में खोई हुई 
नीम की शाखाओं से झरती तुहिन की बूँद पीकर 
मोगरे के फूल पर थी चांदनी सोई हुई 
 
पूर्णिमा में ताज पर हो 
छाँह तारों की थिरकती 
याकि जमाना तीर पर हो 
आभ रजती रास करती 
झील नैनी में निहारें 
हिम शिखर प्रतिबिम्ब अपना 
हीरकणियों में जड़ित 
इक रूप की छाया दमकती 
 
दूध से हो एक काया संदली धोई हुई 
मोगरे के फूल पर थी चांदनी सोई हुई 
 
वर्ष के बूढ़े थके हारे 
घिसटते पाँव रुककर 
देखते थे अधनिमीलित 
आँख से वह रूप अनुपम
आगतों की धुन रसीली 
कल्पना के चढ़ हिंडोले
छेड़ती थी सांस की 
सारंगियों पर कोई सरगम
 
मोतियों की क्यारियों में रागिनी बोई हुई 
मोगरे के फूल पर थी चांदनी सोई हुई 
 
एक पंकज पर सिमट कर 
क्षीर सागर आ गया हो 
खमज,जयवंती कोई
हिंडोल के सँग गा गया हो 
देवसलिला  तीर पर 
आराधना में हो निमग्ना 
श्वेत आँचल ज्योंकि  प्राची का 
तनिक लहरा गया हो 
 
या कहारों ने तुषारी, कांवरी ढोई  हुई 
मोगरे के फूल पर थी चांदनी सोई हुई 
 
सो, का हो अर्क आकर
घुल गया वातावरण में
कामना की हों उफानें 
कुछ नै अंत:करण  में 
विश्वमित्री भावनाओं का
करे खण्डन  समूचा 
रूपगर्वित मेनका के 
आचरण के अनुकरण में 
 
पुष्पधन्वा के शरों  में टाँकती कोई सुई 
मोगरे के फूल पर है चांदनी सोई हुई 

Friday, February 6, 2015

केसर घोल रहा है सूरज,---2


केसर घोल रहा है सूरज, अभिनन्दन को थाली में
दीपित रहे स्वस्ति माथे पर जैसे दीप दीवाली में

प्राची की क्यारी में उगते जवाकुसुम को चुन चुन कर
ऊषा की स्वर्णिम चूनर पर सिन्दूरी रंग टाँक रहा
जाती हुई विभा के आँचल को अक्षत में बुन बुन कर
कीर्ति पताका को लहराने के संचित पल आँक रहा


भरता है सोनहरी रंगत हर इक घड़ी उजाली में
केसर घोल रहा है सूरज अभिनन्दन को थाली में

भरता है उंड़ेल कर अनगिन कनी हीरकी शब्दों में
कलियों के अधरों पर जड़ देता मुस्कानें धीरे से 
देता नई  प्रेरणा पाखी के पर को उड़ान भरने 
लहरों को पहनाता स्वर्णिम हार, खड़ा हो तीरे पे 

करता है संचार प्राण का हर पत्ती हर डाली में
केसर घोल रहा है सूरज अभिनन्दन को थाली में

सप्त अश्व के पग में भर कर सप्तसुरी मोहक सरगम 
दोपहरी की खिड़की पर जड़ विजय घोष का सम्बोधन
दीवारों पर जड़े कक्ष की मानपत्र की आकृतियाँ
प्रगति पंथपर गतिमय पग को देने ्को नव उद्बोधन

ज्योति सुधा भरने को आतुर हर  इक आँजुर खाली में
केसर घोल रहा है सूरज अभिनन्दन को थाली में


Thursday, January 15, 2015

केसर घोल रहा है सूरज


केसर घोल रहा है सूरज अभिनंदन का थाल सजाकर 
किरणें छेड़ रही सारंगी, सरगम के सुर नए सजा कर 

प्राची की देहरी पर रंग कर सिंदूरी अल्पना नई  इक 
तुहिन कणों पर इन्द्रधनुष की कूची फेर रहा रह रह कर 
पिघले हुए स्वर्ण से रचता  आभूषण बहती धारा में 
कोंपल की निद्रा को तोड़े स्पर्श गुनगुने से सहला कर 


 पादानों पर चढ़ता अपना अश्व -ताल संगीत बजा कर 
केसरघोल रहा अहै सूरज अभिनन्दन का थाल सजा कर 


कोटर में छिपते तम के घट हाथ बढ़ा कर पीते पीते 
पाखी के पर में भरता है निर्णय नए उड़ानों वाले 
अपनी किरणों की कैंची से एक एक कर छांट रहा है 
बिखरे हुए व्योम में जितने थे आवारा बादल काले 

ईश भवन के पट को खोले मंगल सुर में आरती गाकर 
केसर घोल रहा है सूरज अभिनन्दन का थाल सजा कर

पनघट बन आवाज़ लगाता आएं नृत्य करें पैंजनिया 
चूम कली को हौले से मुस्कान जगाता है अधरों पर 
कर्मनिष्ठता को करता है सहज अग्रसर  जीवन पथ पर 
अलसाया शैथिल्य हटाता, नई ऊर्जा संचारित कर

लिखने को अध्याय नया नवदिन के नव कोरे कागज़ पर
केसर घोल रहा है सूरज अभिनन्दन को थाल सजाकर

Monday, November 24, 2014

उत्तर दिशि की सर्द हवायें

छूकर तुमको  आई  लगता उत्तर दिशि से सर्द हवायें
दुलरा कर मेरे तन मन को भर देती नस नस में सिहरन
 
अन्त:सलिला की लहरों का हुआ तरंगित कम्पन लेकर
शिव केशों से निर्झर  बन कर बहती धाराओं का गुंजन 
हिमशिखरों  पर रचे धूप ने, स्वर्णकलश की छलकन को ले
सांस सांस में बो देती हैं आकर के थर थर  सी सरगम
अधरों पर की  स्निग्ध तरलता को भर कर अपने झोंकों में
मेरे अधरों पर जड़ देती मीत तुम्हारा कल्पित चुम्बन
कहती मुझसे ओढ़ूँ मैं फिर  यादों वाली गर्म दुशाला
मन के गलियारे में दीपित सपनों की फिर करूँ दिवाली
और जकड़ लूँ भुजपाशों में झीने से आभास तुम्हारे
और आँज  लूँ आंखों में इक पुष्प-सज्जिता सुरभित डाली
देह तुम्हारी की लहराती बलखाती सी पदचापों से
कर देती छवियों से रंजित, मेरा एकाकी सूनापन
बासंती उषा में छलके पंखुरियों पर तुहित कणों की 
शीतलता को सहस गुना कर जब छूती हैं मुझको आकर 
अनायास ही चित्र तुम्हारे दृष्टि क्षितिज पर आ मंडराते 
रांगोली बन रंग देते हैं मेरे मन की सूनी बाखर 
पत्र विहीना शाखाओं को देती हैं सन्देश तुम्हारा
अभी मोड़ से तनिक परे है पुनर्पल्लवन वाला मौसम
 
इक अनन्त के सघन शीत का अंशजन्य संचित गुण लेकर
तन को मन को यों कचोटती, जैसे तुमने फ़ेरी नजरें
कभी मंद हो, कभी हुईं द्रुत आ कपोल मेरे सहलाती 
कवितामय कर देती मन में कम्पित हुईं हजारों सतरें
रखतीं बांध धूप की गर्मी, अपने आँचल के छोरों में
औ बिखेरती हैं निशि वासर एक अजब बोझिल सी जकड़न.