Friday, November 5, 2010

जलते रहें दीपक सदा कायम रहे ये रोशनी

जलते रहें दीपक सदा कायम रहे ये रोशनी




आस के पौधे बढे बढ़ कर उनहत्तर हो गए

एक ही बस लक्ष्य बाकी द्रश्य सारे खो गए

वर्तिका जलती रही तेतीस धागों में बंटी

बंध गए बस एक डोरी में हजारों अजनबी

फिर अमावस में खिली आ कर कहे ये चांदनी

दीप ये जलते रहें कायम रहे ये रोशनी



बाद मंथन के सदा ही रत्न जिसने थे उलीचे

जब जलधि लगाने लगा थक सो गया है आँख मीचे

पर सतत भागीरथी आराधना फलने लगी तो

ईक नई सीपी उगाने लग गई नूतन फसल को

मुस्कुरा गाने लगी वह धूप जो थी अनमनी

दीप ये जलते रहें कायम रहे ये रोशनी



ये घटित कहता न धीमी आग हो विश्वास की

चूनारें धानी रहें मन में हमेशा आस की

ठोकरों का रोष पथ में चार पल ही के लिए

आ गए गंतव्य अपने आप जब निश्चय किये

और संवरी है शिराओं में निरंतर शिंजिनी

दीप ये जलते रहें,कायम रहे ये रोशनी

Thursday, October 28, 2010

प्रियतम तेरे इन्तज़ार में

प्रियतम तेरे इन्तज़ार में पिछले दो महीने में मैने

घर में जितनी मूँग रखी थी वो सारी की सारी दल दी



हफ़्ते भर का वादा करके गये पर्यटन को तुम बाहर

और कहा था थोड़ा सा है काम उसे कर के आता हूँ

थोड़े से पकवानों की तुम फ़रमाईश कर मुझे गये थे

कहकर अभी लौटकर इनको साथ तुम्हारे मिल खाता हूँ



इसीलिये मैने बज़ार से ताजा सभी मंगा कर रखे

जीरा,धनिया,सौंफ़ हींग के संग संग अजवायन और हल्दी



रबड़ी का कुल्ला मंगवाया था हलवाई से जो परसौं

डेढ़ किलो वह मैने ही बस जैसे तैसे निपटाया है

कलाकंद,रसगुल्ले,लड्डू, बालूसाही और जलेबी

इनके सिवा न कुछ भी मैने बिना तुम्हारे प्रिय,खाया है



पिट्ठी जो मँगवा रक्खी थी दहीबड़ों की खातिर मैने

दरवाजे पर नजर टिकाये,जाने कैसे मैने तल दी



लिए गिट्स के पैकेट जो थे चार रवे की इडली वाले

उन्हें बनाया, साथ ढोकला दो पैकेट तैयार किया था

और पड़ोसन ने भी परसौं चार पांच सौ बना लिए थे

दाल मूंग की भरे समोसों का मुझको उपहार दिया था



बाट जोहते मीत तुम्हारी पता नहीं क्या मुझे हो गया

मेरी परछाईं आकर के इन सब को खा पीकर औ चल दी

Tuesday, September 28, 2010

जाते हुए सितम्बर का एक दिन

लाल पीली चूनरी ओढ़े हुए शाखायें हँसतीं
ये सितम्बर मास जाने के लिये सामान बाँधे
साझ के पल ग्रीष्म में फ़ैले हुए थे धूप खाकर
ओढ़ने अब लग गये तन पर सलेटी शाल सादे

तापक्रम सीढ़ी उतरता आ रहा वापिस धरा पर
लग गयीं बहने हवा में कुछ अजानी सी तरंगें

खिड़कियों पर भोर की आ बैठता झीना कुहासा
सूर्य आंखों को मसलते ले रहा रह रह उबासी
रात की अंगनाईयों में दीप से जल कर सितारे
भूमिका लिखने लगे आये शरद की पूर्णमासी

एक सिहरन सी लगी है दौड़ने हर इक शिरा में
ले रही अंगड़ाईयां मन में उमग अनगिन उमंगें

पाखियों ने दूत भेजे हैं पुन: दक्षिण दिशा में
नेघ फ़सलें ला रहे सँग में कपासी ओटने को
ऊन के गोले सुलझ कर टँक गये फिर अलगनी पर
और बन पटुआ दिवस किरणें बटोरे पोटने को

घाटियों से लौट कर आती हुई आवाज़ कोई
उड़ रही आकाश पर मन के बनी पीली पतंगें

गीतकार
२७ सितम्बर २०१०

Monday, September 20, 2010

मुहब्बत में

लुटा उनकी अदाओं से जिसे सब दिल बताते हैं


न जाने क्यों हमें सब लोग अब गाफ़िल बताते हैं

मुहब्बत है नहीं सस्ती, बहुत खर्चा हुआ इसमें

ये आये आज क्रेडिट कार्ड वाले बिल बताते हैं



कहा हमने मुहब्बत में जो उनसे एक दिन गाकर

कहें तो मांग में भर दें, सितारे चांद हम लाकर

बड़े अन्दाज़ से बोले, न जाओ दूर इतना तुम

हमें बस पांच केरट का महज स्टोन दो लाकर

Friday, September 10, 2010

मैने तो बस शब्द लिखे हैं

जो गीतों का सॄजन कर रहा वो मैं नहीं और है कोई
मैने तो बस कलम हाथ में अपने लेकर शब्द लिखे हैं

जो ढले हैं छंद में वे भाव किसके हैं, न जाने
जो पिरोये बिम्ब हैं वे हैं नये या हैं पुराने
अन्तरों में कौन से सन्दर्भ की गांठें लगीं हैं
और किस की लय लगी है गीत की सरिता बहाने

भटक रहा हूँ मैं भी यह सब प्रश्न लिये द्वारे चौबारे
किन्तु अंधेरे ही छाये हर इक द्वारे पर मुझे दिखे हैं

किस तरह बन फूल संवरे कागज़ों पर आन अक्षर
रह गये हैं शब्द किसकी रागिनी में आज बंधकर
कौन करता है प्रवाहित इस सरित को, कौन जाने
मैं धुंये के बिम्ब में ही रह गया लगता उलझकर

शायद कोई किरन ज्योति की आये आकर मुझे बताये
क्या है वह जिस पर इस मन के आशा व विश्वास टिके हैं

कौन सहसा खींच देता चित्र,श्ब्दों में पिरोकर
व्योम भरता बिन्दु में, ला एक मुट्ठी में सम्न्दर
प्रेरणा में कल्पना में चेतना में भावना में
फूँकता अभिव्यक्तियों में धड़कनें अपनी समोकर

ढाल रहा है कौन न जाने स्वर के सांचे में शब्दों को
किसका है अलाव न जाने,जिसमें ये सब सदा सिके हैं

Friday, August 27, 2010

जाने क्यों उदास हो ते हम

जिन्हें छोड़ हम पीछे आये, उनकी दशा वही बस जानें
लेकिन सहसा एकाकीपन में उदास हो जाते हैं हम

पग चुम्बन को हमें विदित है आतुर अब भी वह पगडंडी
जिस पर से चौपाल निहारी थी आते,पीछे मुड़ कर के
पीपल की वह झुकी हुई सी बूढ़ी शाखा बाट जोहती
जिस पर लटकाते थे धागे,सन्ध्या को मन्नत कर कर के

उनकी मौन पुकारों का स्वर बादल के डोले चढ़ आता
है तब सांझ सवेरे आंखें अकस्मात हो जाती हैं नम
दरवाजे पर नजर टिकाये बैठा होगा लंगड़ा टेसू
दीवाली के दिये अनगिनत जिसके साथ जलाये हमने
अटक होगी अभी नीम की डालों पर वे कटी पतंगें
जिनके साथ उड़ा करते थे नभ में रंग बिरंगे सपने

होता है कुछ भान इस तरह,ये सब महज भुलावा ही है
किन्तु न जाने क्यों मन इनसे बचने का न करता उपक्रम
अब भी तीज तला करती है शायद वहां तई में घेवर
अब भी उलझा करते होंगें फ़ैनी के लच्छों में लोचन
अब भी पंडा हुआ प्रतीक्षित हो संभव विश्राम घाट पर
लहर घटायें करती होंगी मंदिर में अब भी सम्मोहन

बढ़ आये हैं लगता अपनी परछाई से भी अब आगे
प्रगति मान अपनाया जिसको,लगता है वह मति का था भ्रम
वह कुम्हार का चाक, और वह बूढ़े बैलों वाला तेली
धोबी ग्वाला और ठठेरा,तकनीकी वह सन्तराज भी
वे बजाज,दर्जी हलवाई नाई पनवाड़ी फ़रेटिया
सम्बोधित करते हैं हमको आवाज़ें दे, लगे आज भी

किन्तु रोशनी की वे किरणें हैं वितान के परे दृष्टि के
उठते नहीं पांव जाने को, जंजीरों में जकड़े है तम

Monday, August 16, 2010

मन में दृढ़ विश्वास लिये

पथ में उगती हौं बाधायें

उमड़ उमड़ आयें झंझायें

अवरोधों के फ़न फ़ैलायें

मंज़िल के अनुरागी बढ़ते रहते अनबुझ प्यास लिये

यायावर गति में रहते हैं, मन में दृढ़ विश्वास लिये



अगन उगलती हो दोपहरी

घिरी घटायें हौं या गहरी

लगें घड़ी की सुइयाँ ठहरी

संकल्पों को बाँध,तिमिर का रह रह कर उपहास किये

यायावर चलते रहते हैं,मन में दृढ़ विश्वास लिये



घिरता आये घ्हना कुहासा

पल पल ठोकर खाये आशा

साथ छोड़ती हो अभिलाषा

नये दिवस की अगवानी में दीप्त हुआ आकाश लिये

यायावर चलते रहते हैं,मन में दृढ़ विश्वास लिये



नज़्म कतओं की सभी विधायें

तुकविहीन रहती कवितायें

अपनी ढपली खूब बजायें

कालजयी बस गीत रहा है,अलंकार अनुप्रास लिये

और साधना करें उपासक,मन में दृढ़ विश्वास लिये.