Wednesday, August 11, 2010

टके सेर भी नहीं आजकल

लिखूँ गीत मैं क्योंकर बोलो, कोई नहीं है गाने वाला
और भावनाओं की कीमत टके सेर भी नहीं आजकल

सुविधाओं में बँधी हुई हैं परिभाषायें सम्बन्धों की
सूरज उगते बदला करतीं अनुबन्धों की सभी विधायें
सन्दर्भों पर गहरी परतें चढ़ी धूल की मोटी मोटी
चाहत के प्यालों से बंध कर रह जाती हैं सभी तॄषायें

चढ़े मुलम्मे में हो जातीं चकाचौंध रह रह कर नजरें
खोटे और खरे में अन्तर करता कोई नहीं आजकल

बन्द पड़ी हैं अनुरागों के विवरण थे जिनमें वे पुस्तक
भावों की जो नदियायें थीं वे सारी हो गईं मरुथली
पद्चिन्हों के अनुसरणों की गाथायें कल्पित लगती हैं
और भूमि का स्पर्श नहीं अब कर पाती है कोई पगतली

वाल्मीकि, तुलसी, सूरा के लिखे हुए शब्दों से दूरी
तय कर पाने का भी उपक्रम करता कोई नहीं आजकल
नयनों के सन्देशों में अब ढला नहीं करती है भाषा
मेघदूत से ले कपोत सब होकर  कार्यहीन बैठे हैं
भौतिकता के समीकरण में बंध कर हुए ह्रदय सब बन्दी
चुम्बक के ध्रुव भी लगता है साथ साथ अब तो रहते हैं

जितने भी मानक थे उनके अर्थ हुए हैं सारे नूतन
प्रासंगिकता के कारण को कोई पूछता नहीं आज्कल

Wednesday, August 4, 2010

प्रतिभाओं की कमी नहीं है--- दो पहलू

प्रतिभाओं की कमी नहीं है--१


चाहत यह वर्चस्व हमारा सदा रहे,हर घड़ी पली है

कुछ भी हो बस एक सदा ही ठकुरसुहाती लगी भली है

बिम्ब न अपना देख सकें पर चाहत है संजय कहलायें

तानसेन सब माने चाहे गर्दभ सुर में गाना गायें

दो लाइन में शब्द जोड़कर कह देते हैं लिखी गज़ल है

और लिख दिया है जो वह ही शाश्वत है सम्पूर्ण अटल है

इधर उधर के शब्द जमाकर उसको कविता कह देते हैं

नई विधा के नये रचयिता हैं, इस भ्रम में रह लेते हैं

प्रश्न उठाता है कोई तो मौन साध कर रह जाते हैं

पढ़ा नहीं साहित्य, भूमि से नाता है बस बतलाते हैं

ऊलजुलूल टिप्पणी देकर आशा बदले में पा जायें

होता हो गुणगान निरख कर पल पल फूलें और अघायें
जिनके बूते पर चलती है आत्मश्लाघा की परिपाटी

बाँटी कभी रेवड़ी जिसने रह रह कर निज को ही बाँटी

उनकी खरपतवारी फ़सलें निमिष मात्र भी थमी नहीं है

हर युग में कुछ ऐसी अद्भुत प्रतिभाओं की कमी नहीं है.



प्रतिभाओं की कमी नहीं है----२


कब आवश्यक यज्ञ होम ही केवल ईश धरा पर लायें

यह आवश्यक नहीं वेदपाठी ही केवल मंत्र सुनायें

राजकुंवर के ही हिस्से में आ पाये अधुनातन शिक्षा

कब आवश्यक बिना पुरोहित के शुभ कार्य नहीं हो पायें

जो अपना संकल्प उठा कर इच्छित प्राप्त किया करते हैं

एक कुदाली से पर्बत का सीना चीर दिया करते हैं

आंजुरि में भर सिन्धु पान की क्षमता जिनके पास रही है

अपनी निष्ठा से जो पाषाणों को प्राण दिया करते हैं

आँखें खुलने से पहले ही सीखा चक्रव्यूह का भेदन

एक गिलहरी के श्रम पर भी उमड़ा है जिनका संवेदन

कोई भी युग हो असफ़लता एकलव्य को नहीं मिली है

अंगुल अष्ट प्रमाण,सुना तो करते सहज लक्ष्य का बेधन

ध्रुव बन जिनकी कीर्ति निशा के नभ में हरपल बनी रही है

जिनके कारण अंतरिक्ष में धरा बिन्दु पर टिकी रही है

और आज की बात करें तो भी बस केवल हमी नहीं है

कोई युग हो, कोई चुनौती, प्रतिभाओं की कमी नहीं है

Monday, August 2, 2010

वह अनबूझ पल

घुल गये प्रश्न उठते हुए व्योम में
दृष्टि में अनगिनत आये उत्तर उतर
वक्त चलता हुआ भी ठिठक कर रुका
इस अछूते अजाने नये मोड़ पर
हो गया फिर दिवस का निमिष हर विलय
एक ही बिन्दु में दृष्टि की कोर पे
बन हवा की तरंगें बजे हर तरफ़
बांसुरी से उमड़ राग चितचोर के
एक पल यह न्हीं व्याख्यित हो सका
शब्द सब कोष के कोशिशें कर थके
नैन के गांव में आ बटोही बने
कुछ सितारे भरी पोटली धर रुके
मौन क ओढ़ बैठे रहे थे अधर
बोल पाये नहीं थरथरा रह गये
भाव कुछ बाहुओं के सिरे पर रहे
प ही आप में कसमसा रह गये
एक विस्तार आकर सिमटने लगा
स अनागत अनाभूत पल एक में
कुछ भी ज\कहना अस्म्भव हुआ जा रहा है
पास पाया न कहने को कुछ शेष मैं

Wednesday, July 28, 2010

कविता करना तेरे बस की बात नहीं

कविता करना तेरे बस की बात नहीं


तथाकथित कवि कविता करना तीर बस की बात नहीं
तू दिन को दिन कह न पाता और रात को रात नहीं


भरता है तू ठूँस ठूँस कर शब्द सभी बेमतलब के
तेरे अर्थ उड़ा करते हैं आंधी में बन कर तिनके
तू जो लिखता उसको शायद खुदा तलक न समझ सके
तू बदला लेता कविता के पाठक गण से गिन गिन के


सेहरा पहन समझता दूल्हा, लेकिन है बारात नहीं
तेरे बस की बात नहीं


एक पंक्ति में होतीं मात्रा सोलह,दूजी में बत्तीस
प्रश्न कोई पूछे तो रहता है तू सिर्फ़ निपोरे खीस
अपने भ्रम को ज्ञानकोष  का देता आया सम्बोधन
भावों से रहता है तेरा सदा आँकड़ा बस छत्तीस

सूखे हुए ठूँठ पर उगते हैं बासन्ती पात नहीं
तेरे बस की बात नही

तेरे सब सन्दर्भ हड़प्पा के जैसे अवशेष हुये
जिसने तुझे पढ़ा उसके ही मन में भारी क्लेश हुए
तू लाठी के जोर ठूँस देता शब्दों को कविता में
लहराते कुन्तल भी तुझको मैड्यूसा के केश हुए

टूटी तकली पर तू बिल्कुल धागे सकता कात नहीं
तेरे बस की बात नहीं

Monday, July 5, 2010

आँख का पानी--दो चित्र

भाव बन कर शिंजिनी गूँजें शिराओं में
पीर बासन्ती घुले महकी हवाओं में
करवटें मन की पिघलती हों अचानक ही
गूँज हर,रह जाये जब खोकर दिशाओं में
नव रसों में जब मिलें सहसा नये मानी
उस घड़ी बरसात करता आँख का पानी
रागिनी जब कोई आकर राग को छूले
रंग बिखराया हुआ जब फ़ाग को भूले
पाँव लौटें गांव को कर कालियामर्दन
गंध ओढ़े मोतिया, बेला महक फूले
चित्र बन जाये कोई परछाईं अनजानी
उस घड़ी आता उमड़ कर आँख का पानी
हाथ की रेखायें जन अनुकूल हो जायें
नीरजी पांखुर डगर के शूल हो जायें
जब गगनचुम्बी,समय के सिन्धु की लहरें
एक मैदानी नदी का कूल हो जायें
दोपहर में गुनगुनाये रात के रानी
तोड़ देता बांध उस पल आँख का पानी


----------------------------

बहा आँख का पानी

टुती हुई सपन की डोरी
विरहा व्याकुल एक चकोरी
उस पर ये बरसात निगोड़ी
लिख देती है भिगो पीर में फिर से एक कहानी
बहे आँख का पानी

हिना हथेली आन रचाये
अँगनाई अल्पना सजाये
शहनाई मंगल सुर गाये
कदली खंभॊं पर तारों ने जब भी चूनर तानी
बहे आँख से पानी

साध संवर कर पूरी होले
विधना बंद पिटारी खोले
बिन रुत के पड़ जायें हिंडोले
उतर गोख में आकर गाये इक चिड़िया अनजानी
बहे आँख का पानी

Thursday, June 17, 2010

याद-पुरानी यादों की गठरी से

फूलों की पांखुर से फ़िसक रही शबनम सी
साज की मुंडेरों पर थिरक रही सरगम सी
सन्ध्या के आँचल में टाँक रही गुलमोहर
निशिगन्धी महकों में लिपट खड़े मधुवन सी
याद कोई सपना बन, आंखों में तैर गई
उस पल पर जीवन की एक सांस ठहर गई

गंगा की धारा में मांझी के गीतों सी
दादी से सुनी हुई पुरखों की रीतों सी
चम्पा के सिरहाने, जूही के गजरों सी
घूँघट से झाँक रही दुल्हन की नजरों सी
याद कोई सपना बन आँखों में तैर गई
उस पल पर जीवन की एक सांस ठहर गई

लहरों की दस्तक सी, सरिता के कूलों पर
बरखा की बून्दों सी, सावन के झूलों पर
चाँदनी में भीग रहे उपवन के प्रांगण में
पुरबा की सिहरन सी मुस्काते फूलों पर
याद कोई सपना बन, नयनों में तैर गई
उस पल पर जीवन की एक सां स ठहर गई



Monday, May 31, 2010

मन का इकतारा अब केवल

पता नहीं किसका प्रभाव लज्जा के बन्धन खोले है
मन का इकतारा अब केवल तुमही तुमही बोले है

ओढ़ी हुई एक कमली की छायायें हो गईं तिरोहित
नातों की डोरी के सारे अवगुंठन खुल कर छितराये
बांधे अपने साथ सांस को द्रुत गति चले समय के पहिये
उगी भोर के साथ साथ ही संध्या के बादल घिर आये

वनपाखी मन द्वार तुम्हारे आने को पर तोले है
मन का इकतारा अब केवल तुमही तुमही बोले है

कालिन्दी तट हो, सरयू हो पुष्पकुंज सुरपुर के चाहे
गन्धों के हर इक झोंके में सिमटे आई चित्र तुम्हारे
जुड़ कर रही नाम के अक्षर से सुधि की रेखायें सारीं
घिरे रात के अंधियारे हों या दोपहरी के उजियारे

संवरा शब्द अधर पर जब भी नाम तुम्हारा बोले है
मन का इकतारा अब केवल तुमही तुमही बोले है

आईने के नयनों में जो बिम्ब संवरता तुम ही तो हो
तुम ही को तो झील बना कर चित्र टाँक देती बादल पर
तुमही तो हो बने अल्पना मन के बिछे हुए आंगन में
तुम ही हो चूनर प्राची की,तुम अंकित निशि के आंचल पर

धड़कन का पटवा सांसों की डोरी में तुमको पो ले है
मन का इकतारा अब केवल तुमही तुमही बोले है