Tuesday, January 19, 2010

अब् मुस्कान् कहाँ आ पाये

परिणति, जलते हुए तवे पर गिरी हुई पानी की बूँदे
मन की आशा जब यथार्थ की धरती से आकर टकराये

अपने टूटे सपनों की अर्थी अपने कांधे पर ढोते
एकाकीपन के श्मशानों तक रोजाना ले जाते हैं
चुनते रहते हैं पंखुरियां मुरझा गिरे हुए फूलों की
जो डाली पर अंगड़ाई लेने से पहले झर जाते हैं

पथ की धूल निगल जाती है पदचिह्नों के अवशेषों को
सशोपंज में यायावर है, दिशाज्ञान अब कैसे पाये

सजी नहीं है पाथेयों की गठरी कब से उगी भोर में
संध्या ने दरवाज़ा खोला नहीं नीड़ जो कोई बनता
संकल्पों को लगीं ठोकरें देती नहीं दिलासा कोई
उमड़े हुए सिन्धु में बाकी नहीं कहीं पर कोई तिनका

बिखर गये मस्तूल, लहर ने हथिया लीं पतवारें सारी
टूटी हुई नाव सागर में, कब तक और थपेड़े खाये

शूल बीनते छिली हथेली में कोई भी रेख न बाकी
किस्मत के चौघड़िये मे से धुल बह गये लिखे सब अक्षर
बदल गई नक्षत्रों की गति, तारे सभी धुंध में लिपटे
सूरज निकला नहीं दुबारा गया सांझ जो अपने घर पर

अधरों के स्वर सोख लिये हैं विद्रोही शब्दों ने सारे
सन्नाटे की सरगम लेकर गीत कोई कैसे गा पाये

सने अभ्यागत बनकर अब आते नहीं नयन के द्वारे
खामशी का पर्वत बनकर बाधा खड़ा हुआ आंगन में
अभिलाषा का पथ बुहारते क्षत विक्षत होती हैं साधें
मन मरुथल है, बादल कोई उमड़ नहीं पाता सावन में
पतझर बन कर राज कुंवर, सता ले बैठा सिंहासन पर
संभव नहीं अंकुरित कोई अब मुस्कान कभी हो पाये

Monday, January 4, 2010

आज मुझे कुछ शब्द चाहिये

जी हाँ मुझको शब्द चाहिये


शब्द कि जिनकी संरचना में छुपे हुए हों कोई मानी
कोरे खाकों वाले केवल नहीं चाहता मैं बेमानी
शब्द कि जिनसे उड़ न पाये गंध तनिक भी वासीपन की

शब्द उतर जायें सीने में,जो प्रतिध्वनि बन कर धड़कन की

मुझको ऐसे शब्द चाहिये

शब्द हाँ मुझे शब्द चाहिये

शब्द कभी न लिखे गये हों,आकॄति में ढलने से पहले

शब्द,पीर का हर इक अक्षर जिनकी बाँह थाम कर बहले

शब्द कर सकें जो संप्रेषित मन में उठते उद्गारों को

शब्द मुट्ठियों में जो सीमित कर दे अगणित संसारों को

बस ऐसे कुछ शब्द चाहिये

शब्द हाँ मुझे शब्द चाहिये

शब्द कि जिनसे फूटें अंकुर आखों में कोमल सपनों के

शब्द बन सकें सावन के घन जो मन की गहरी तपनों के

शब्द निरन्तर गति पाता हो जिनसे अभिलाषा का निर्झर

शब्द तोड़ दें अविश्वास का सन्नाटा जो छाया भू पर.

बस कुछ ऐसे शब्द चाहिये

जी हाँ मुझको शब्द चाहिये.

Thursday, December 31, 2009

वर्ष प्रस्थान

झर गये पत्र सब पेड़ की शाख से

तीन सौ साठ के सँग रहे पाँच वे

कुछ हरे,पीत कुछ, कुछ थे सूखे हुए

पारदर्शी रहे ज्यों बने काँच के

कुछ किरण स्वर्ण से थी नहाई हुई

और कुछ ओढ़ कर चाँदनी को मिली

कुछ चलीं गांव को छोड़ कर, राह में

थी भटकती रहीं मंज़िलें न मिली

स्वप्न ने अल्पनायें रँगी नैन में

आस ने थे नये कुछ गलीचे बुने

कुछ स्वरों ने निरन्तर थी आवाज़ दी

और कुछ सुर किसी ने तनिक न सुने

बीत जाते पलों ने लिखे पॄष्ठ कुछ

खिंच गई याद की इक ्नई वीथिका

एक इतिहास फिर से संवारने लगा

दो कदम साथ बस जो चली प्रीत का

जम गई धूल पहले गिरे पत्र पर

एक अंकुर नया फिर दहकने लगा

एक बूढा बरस शायिका पर गिरा

बालपन का दिवस इक चहकने लगा

क्या खबर है उसे ? उसकी परिणति वही

जोकि जाते हुए की हुई आज है

आज आरोह ले जो खडा गा रहा

बस उसी ने ही कल खोनी आवाज़ है

इसलिए आओ हम आज को बाँध लें

हाथ अपने बढ़ा मुट्ठियाँ बंद कर

कौन जाने लिखे क्या समय की कलम

कल पुराने हुए एक अनुबंध पर

Thursday, December 10, 2009

पंकज सुबीरजी- प्रणय वर्षगाँठ शुभ हो

श्वेत पत्रों पे बैठी हुई शारदा, बीन के राग में गीत गाती रहे
रक्त वर्णी किये पांखुरी, विष्णु की प्रियतमा पायलें झनझनाती रहे
ज्योत्सना की परी आ धरा पे रँगे चान्दनी की किरन से दिवस आपके
और रेखा स्वयं जयश्री बन सदा, आपके भाल टीका लगाती रहे
 
शुभकामनायें
 
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पंकज के पत्रों पर रेखा लिखती है शबनम से पाती
लगी झूमने शुभ्र चांदनी तारों सा आँचल लहराती
परियां बन कर अभिलाषाएं उड़ती फिरती है आँगन में
नाच रही हर एक पंखुरी मलयज के संग संग बतियाती

मौसम ने ली ओढ़ अचानक फागुन सी रंगीन चुनरिया
प्रीत छेड़ती नई धुनों में भीगी हुई मिलन बाँसुरिया
करते हैं अभिषेक नयन की कोरों से रिस रिस कर सपने
लगा आज सीहोर आ गए राधा के संग में सांवरिया

दसों दिशाएँ हुई उल्लासित आज दिसंबर दस के दिन को
मढ़ कर स्वर्णमयी करती हैं उस रजताभ अनूठे छिन को
कमल पत्र पर उभर गई थी रेखाएं जब घनी प्रीत की
मन के इतिहासों ने सौंपा सत्र स्वयं का पूरा जिनको

नौ वर्षों के पथ में चलते कदम साथ हो गये नवग्रह
ढली प्रेरणाओं में मन की सहज भावना कर कर आग्रह
नयी नयी मंज़िल पायें नित, यही कामना सजती है अब
और लुटाते रहें आप दोनों मिल कर सब ही पर अनुग्रह

Wednesday, November 18, 2009

तुझे भेंट मे मैं क्या दूँ

ओ अनुरागी तुझे भेंट मे मैं क्या दूँ, तू ही है दाता
तेरे सिवा विश्च में जो भी प्राणी है, वो है इक याचक

तेरी अनुकम्पा की बारिश से जब भीगा मेरा आँचल
सुधा कलश बन गई हाथ में जो थी मेरे जल की छागल
दीपित हुईं दिशायें मेरी जिनपर परत जमी थी काली
तेरे आशीषों से मेरी हर मावस बन गई दिवाली

है बस इक ये ही अभिलाषा ओ मेरे प्राणेश ! सदा ही
तू आराध्य रहे नित मेरा ,और रहूँ मैं बन आराधक

जब जब तेरे अनुदानों की महिमा गाये मेरी वाणी
स्वत: झरा करती है तब तब होठों से कविता कल्याण
तू ही भाव और स्वर तू ही, तू ही तो है संवरा अक्षर
तू ही मन की अनुभूति है, तू ही अभिव्यक्ति का निर्झर
तेरे वरद हस्त की छाया रहती है जिसके मस्तक प
साहस नहीं किसी का उसके पथ में आये बन कर बाधक

तरे इंगित से जलती है ज्योति ज्ञान की अज्ञानों में
तेरी दॄष्टि बदल देती है विपदाओं को मुस्कानों में
तेरी इच्छा बिना न होती जग में कोई हलचल संभव
सांस सांस में व्याप्त रहा है मेरी बस तेरा ही अनुभव

तेरे दरवाजे पर आकर भिक्षा एक यही मैं माँगूं
धड़कन रहे ह्रदय की मेरे बनकर बस तेरी ही साधक.

Monday, November 2, 2009

एक तुम्हारा वॄन्दावन

अभिलाषा का दीप जला कर खड़ा हुआ हूँ द्वारे पर
अपनी करुणा के पारस से छू मुझको कर दो कंचन

जीवन की आपाधापी में भूल गया अपने को भी
लेकिन यह मेरी गति तुमसे आखिर कब है अनजानी
कर्म प्रकाशित मेरे जितने हैं बस ज्योति तुम्ही से पा
व्यथा हदय की तुमसे, तुमसे ही आंखों का है पानी

करता हूँ करबद्ध प्रार्थना बीन दया की छेड़ो तुम
भक्ति भाव की गूँजे मेरे प्राणों में जिससे सरगम

मन के आईने में दिख पाता है केवल धुंधलापन
सीमित है द्वारे तक मेरी नजरों की ये बीनाई
आओ बनकर ज्योति दिशा दो भ्रमित हुए पागल मन को
सारथि बन कर जैसे तुमने दिशा पार्थ को दिखलाई

फिर से फ़ूंको प्राण, प्राण की सोई हुई बाँसुरी में
गूँज उठे मीठी मोहक तानों से ये मन का आँगन

तुम्हें ज्ञात तुम ही भ्रम देते तुम्हीं ज्ञान सिखलाते हो
बिना तुम्हारे इंगित के मैं चलूँ एक भी पग ,मुश्किल
तुम ही गुरु हो, सखा तुम्ही हो और तुम्ही हो प्राणेश्वर
है विशालता नभ की तुम में, और सूक्ष्म तुम जैसे तिल

मुझको अपने विस्तारों के अंश मात्र में आज रखो
रोम रोम में आकर बस ले एक तुम्हारा वॄन्दावन

Sunday, October 11, 2009

पंकज सुबीर जी- जन्मदिन शुभ हो

भाल टीका लगाती रहे जयश्री
हो कथा सत्यनारायणी आँगना
दीप्त हो आपकी राह, हर मोड़ पर
और बाधाओं से हो नहीं सामना



हर सितारा चले चाल अनुकूल ही
औ’ दिशायें सभी आपकी मित्र हों
जो क्षितिज पर बनें भोर में सांझ में
आपके ही सभी रंगमय चित्र हों
द्वार गूँजे सदा प्रीत की बाँसुरी
भारती तान अपनी सुनाती रहे
पांव में सरगमें बाँध कर रागिनी
नॄत्य करती रहे, गुनगुनाती रहे



कोंपलें पल की होती रहें अंकुरित
ईश से कर रहा हूँ यही प्रार्थना



आपका पथ सजाती रहे रात दिन
ओस भीगी हुई फूल की पांखुरी
भोर गंगाजली से उंड़ेली हुई
सांझ हो अर्चना की भरी आंजुरी
मंत्रपूरित रहे दोपहर आपकी
हो निशा चाँदनी में नहाये हुए
और मौसम सुनाता रहे बस वही
गीत जो आपने गुनगुनाये हुए



आपकी लेखनी से सहज ही खुले
हो कहीं कोई भी एक संभावना



नित्य जलते रहें दीप विश्वास के
और संकल्प, संकल्प नूतन करें
लौ अखंडित रहे ज्ञान की प्रज्ज्वलित
प्राण निष्ठाओं के सौष्ठव से भरें
आपका पायें सान्निध्य जो भी वही
पुष्प की वाटिका से सँवरते रहें
गीत हो हो गज़ल या कहानी कोई
आपका स्पर्श पायें सँवरते रहें



लिख रहा हूँ ह्रदय में उठी भावना
जो समय मिल सके तो इसे बाँचना