व्यस्तताओं ने जकड़ा है अस्तित्व यों, भाव आते नहीं गीत बनता नहीं
रात की सेज पर लेटता हूँ मगर आंख में कोई सपना संवरता नहीं
गीत दोहे गज़ल सोरठे कुंडली, सबको आवाज़ देते थका हूँ मगर
लेखनी का सिरा थाम कर कोई भी सामने मेरे आकर उतरता नहीं
Friday, October 12, 2007
Wednesday, October 3, 2007
क्या क्या न किया तेरे लिये ओ----
अब क्योंकि एक नाम से पोस्ट करे तो लोग पढ़ें या न पढें यह समस्या रहती है. समाधान ये कि एक ही पोस्ट को अलग अलग नामों से किया जाये तो कोई न कोई तो पढ़ेगा ही. देखें
http://vikashkablog.blogspot.com/2007/10/blog-post_02.html
और
http://iitbkivaani.wordpress.com/2007/10/02/%e0%a4%b8%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%a6%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a5%8b%e0%a4%82-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%ae%e0%a5%8c%e0%a4%b8%e0%a4%ae/
जी हाँ रचना एक ही है एक विकास के नाम से और दूसरी वाणी के नाम से. दोनों नारद पर एक ही दिन थोड़ा आगे पीछे आईं हैं. इसका मुख्य कारण तो शायद टिप्पणियों की तलाश ही है जिसके बारे में कई बार लिखा जा चुका है परन्तु सोये हुए पाठकों की उंगलियों में हरकत नहीं होती कीबोर्ड पर ठकठकाने के लिये.
अब हर कोई लाला समीर लाल तो हैं नहीं कि अपनी टिप्पणी लिये हमेशा इन्टर्नेट पर दौड़ता रहें और जैसे ही कोई पोस्ट हो उस प अपनी टिप्पणी का ठप्पा मार दें. जी यह काम भी बड़े जिगर वालों का है ( वैसे बड़े जिगर से परेशानियां भी होती हैं पर उनका ज़िक्र यहाँ जरूरी नहीं है )
कई बार तो बाकायदा निमंत्रनभेजा जाता आपको कि कोई आयें और अपनी टिप्पणी से नवाज़ें. पर हाय री किस्मत ! कुम्भकर्णी नींद में सोये पाठक की चेतना में जुम्बिश का प्रवेश नहीं हो पाता और बिचारी पोस्ट विधवा की मांग की तरह सूनी पड़ी रह जाती है टिप्पणियों के इन्तज़ार में.
अब आप सोच रहे होंगे कि भाई अब तो टिप्पणी करनी ही पड़ेगी लेकिन फिर यह जरूर सोचियेगा कि किस वाली पर करनी है. दोनों पर भी की जा सकती है क्योंकि केवल एक पर करने से डिसक्रिमिनेशन के भागी बन सकते हैं. अब देखिये न टिप्पणी के इन्तज़ार में हमने भी यह सब लिख डाला
नहीं इक प्रेरणा पाई थके हम पोस्ट कर कर के
हुए हैं बेवफ़ा वे भी जिन्हें समझा था हैं घर के
किसी की पोस्ट पर होतीं तिरेपन टिप्पणी देखो
यहां पर एक की खातिर कटोरा हाथ में थामा
न बदले में मिले हमको महज दो बोल आशा के
लुटाईं रिश्वतों में पास की हर एक थी उपमा
लगाई आस बोलेगा कभी तो कोई चढ़ सर पे
हुए हैं बेवफ़ा वो भी जिन्हें समझा था हैं घर के
लिखीं ईमेल पिच्चासी, किये फिर फोन दो दर्जन
नहीं पर हो सका फिर भी किसी के मन का परिवर्तन
रहे हम ताकते, बैरंग खत बन कर सभी लौटे
हमरी पोस्ेट बन कर रह गई गोपाल बस ठनठन
न भूला रास्ता कोई, लगाये दस्तकें दर पे
हुए हैं बेवफ़ा वे भी जिन्हें समझा था हैं घर के
उमीदे टिप्पणी अपनी सभी बस टुट कर बिखरीं
न शुक्लाजी, न प्रत्यक्षा न नारद की कोई तिकड़ी
गई जो पार नभ के तश्तरी, लौटी नहीं उड़ कर
बिचारी पोस्ट देखो रह गई तूफ़ान में छितरी
लिखा कीबोर्ड को हमने ये आँसू में डुबो कर के
मिलेगी दाद जैसे पात कोई पेड़ से झर के
भाई अब तो टिपिया दो नहीं तो हमें भी यही पोस्ट अलग अलग नामों से दस- बारह बार डालनी पड़ेगी
http://vikashkablog.blogspot.com/2007/10/blog-post_02.html
और
http://iitbkivaani.wordpress.com/2007/10/02/%e0%a4%b8%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%a6%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a5%8b%e0%a4%82-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%ae%e0%a5%8c%e0%a4%b8%e0%a4%ae/
जी हाँ रचना एक ही है एक विकास के नाम से और दूसरी वाणी के नाम से. दोनों नारद पर एक ही दिन थोड़ा आगे पीछे आईं हैं. इसका मुख्य कारण तो शायद टिप्पणियों की तलाश ही है जिसके बारे में कई बार लिखा जा चुका है परन्तु सोये हुए पाठकों की उंगलियों में हरकत नहीं होती कीबोर्ड पर ठकठकाने के लिये.
अब हर कोई लाला समीर लाल तो हैं नहीं कि अपनी टिप्पणी लिये हमेशा इन्टर्नेट पर दौड़ता रहें और जैसे ही कोई पोस्ट हो उस प अपनी टिप्पणी का ठप्पा मार दें. जी यह काम भी बड़े जिगर वालों का है ( वैसे बड़े जिगर से परेशानियां भी होती हैं पर उनका ज़िक्र यहाँ जरूरी नहीं है )
कई बार तो बाकायदा निमंत्रनभेजा जाता आपको कि कोई आयें और अपनी टिप्पणी से नवाज़ें. पर हाय री किस्मत ! कुम्भकर्णी नींद में सोये पाठक की चेतना में जुम्बिश का प्रवेश नहीं हो पाता और बिचारी पोस्ट विधवा की मांग की तरह सूनी पड़ी रह जाती है टिप्पणियों के इन्तज़ार में.
अब आप सोच रहे होंगे कि भाई अब तो टिप्पणी करनी ही पड़ेगी लेकिन फिर यह जरूर सोचियेगा कि किस वाली पर करनी है. दोनों पर भी की जा सकती है क्योंकि केवल एक पर करने से डिसक्रिमिनेशन के भागी बन सकते हैं. अब देखिये न टिप्पणी के इन्तज़ार में हमने भी यह सब लिख डाला
नहीं इक प्रेरणा पाई थके हम पोस्ट कर कर के
हुए हैं बेवफ़ा वे भी जिन्हें समझा था हैं घर के
किसी की पोस्ट पर होतीं तिरेपन टिप्पणी देखो
यहां पर एक की खातिर कटोरा हाथ में थामा
न बदले में मिले हमको महज दो बोल आशा के
लुटाईं रिश्वतों में पास की हर एक थी उपमा
लगाई आस बोलेगा कभी तो कोई चढ़ सर पे
हुए हैं बेवफ़ा वो भी जिन्हें समझा था हैं घर के
लिखीं ईमेल पिच्चासी, किये फिर फोन दो दर्जन
नहीं पर हो सका फिर भी किसी के मन का परिवर्तन
रहे हम ताकते, बैरंग खत बन कर सभी लौटे
हमरी पोस्ेट बन कर रह गई गोपाल बस ठनठन
न भूला रास्ता कोई, लगाये दस्तकें दर पे
हुए हैं बेवफ़ा वे भी जिन्हें समझा था हैं घर के
उमीदे टिप्पणी अपनी सभी बस टुट कर बिखरीं
न शुक्लाजी, न प्रत्यक्षा न नारद की कोई तिकड़ी
गई जो पार नभ के तश्तरी, लौटी नहीं उड़ कर
बिचारी पोस्ट देखो रह गई तूफ़ान में छितरी
लिखा कीबोर्ड को हमने ये आँसू में डुबो कर के
मिलेगी दाद जैसे पात कोई पेड़ से झर के
भाई अब तो टिपिया दो नहीं तो हमें भी यही पोस्ट अलग अलग नामों से दस- बारह बार डालनी पड़ेगी
Monday, September 17, 2007
स्वप्न रह गया स्वप्न ही
बात तो कुछ भी नहीं थी बस कुछ दिन पहले दिल्ली की खबर पढ़ी थी जिसमें लिखा था फ़ुरसतिया महाराज अपने मशहूर लड्डुओं के डिब्बे के साथ दिल्ली आये थे तो साहब हमारे मुँह में भी बाढ़ आ गई. इसी दौरान टोरांटो से श्री श्री कुंडली नरेश ने फोन खड़का दिया कि वे दिवाली के फ़ौरन बाद दिल्ली पधारने वाले हैं हमारे पास भी पेंडिंग में ढेरों तकाजे पड़े थे ( अब सब के नाम तो गिनवा नहीं सकते ), इसलिये आव देखा न ताव, फ़ुरसतियाजी के लड्डुऒं और उड़नतश्तरी के प्रोत्साहन ने हमें विवश कर दिया कि हम भी भारत यात्रा का कार्यक्रम बना लें. पर साहब लगता है कि हमने निर्णय लेने में बड़ी भूल कर दी. हमारा निर्णय लेते ही जो हाल हुआ है वह काबिले गौर है. आप देखें और बतायें कि इसका दोष किस माथे पर तिलक की तरह लगाया जाये ?
मित्रों ने रिश्तेदारों ने बार बार था हमें पुकारा
निश्चित हुआ भ्रमण को जाना भारत में इस बार हमारा
जैसे ही छुट्टी की अर्जी की हमने दाखिल दफ़्तर में
हमें बास ने पकड़ लिया, जो गलती से था हिन्दुस्तानी
उसे भेजना था कुछ अपने छोटे भाई के बेटे को
न सुन पाने की आदत थी रही सदा उससे अनजानी
उसने मोबाईल का नम्बर और पता हमको दे मारा
श्रीमतीजी ने घर आते ही हमको इक लिस्ट थमा दी
छह पन्नों पर लिखा हुआ था किस किसको क्या ले जाना है
पाँच भतीजी चार भतीजे तीन भांजी सात भांजे
साला साली, भाई भाभी सब का ध्यान रखा जाना है
अविरल बहती थी सूची हो जैसे इक नदिया की धारा
लैपटाप लेटेस्त माडलों वाले दो, सोनी के लेने
तीन एम पी थ्री प्लेयर चालीस गिग की ड्राइव वाले
डिजिटल चार कैमरे जिनके पिक्सेल भी छह मिलियन तो हों
और फोने दो चिप जिनमें हों जी एस एम की क्षमता वाले
प्रथम पॄष्ठ ही देख लगा है घिघियाने अब बजट हमारा
हों पर्फ़्यूम डिजाइन वाले कुछ डियोर के कुछ शनेल के
एक अंगूठी नगों जड़ी हो जिसे टिफ़ैनी से लाना है
घड़ी ब्रेटलिंग और कार्टिये, इनसे नीचे नहीं उतरना
आखिर को रिश्तेदारी में अपना चेहरा दिखलाना है
एक बार होती फ़रमाईश, कोई करता नहीं दुबारा
लिस्ट अभी आधी देखी थी टोटल खर्चा बीस हजारी
उस पर अभी तीन टिकटों की रकम जोड़नी भी बाकी है
और वहां पर दिल्ली, बम्बई, जयपुर व कलकत्ता जाना
वॄन्दावन जा हमें देखनी कॄष्ण कन्हैया की झांकी है
लिस्ट हाथ से लगी छूटने, हो जैसे तपता अंगारा
हमें गाज़ियाबाद और फिर गुड़गांवा भी तो जाना है
फिर प्रतापनगरी में जाकर कवितापाठ सुनाना होगा
छह गज़लों से चार गीत से शायद काम वहां चल जाये
लखनऊ जाकर लेकिन हमको गीतकलश छलकाना होगा
फ़ुरसतियाजी का सन्देसा दरवाज़े पर आन पुकारा
तभी दूसरी लिस्ट थमाई गई हाथ में हमको लाकर
उसमें था सामान, खरीदारी जो करनी है भारत में
पाँच शरारे, आठ गरारे, दस सलवार सूट रेशम के
पन्द्रह साड़ी, मिल जायेंगी नई सड़क वाली आढ़त में
घंटे वाले हलवाई का मावा लिपटा हुआ छुआरा
और दरीबा दिल्ली वाला जहाँ जेवरों की दुकान हैं
एक सेट हीरे पन्ने का और एक दो मोती वाले
कुन्दन वाला नया डिजाईन मिल जाये तो लेना होगा
चांदी के लाने गिलास हैं बारह, छह थाली, छह प्याले
गर्मी के मौसम में हमको लगने लगा भयंकर जाड़ा
कहा चैकबुक ने ये सब उसके बूते की बात नहीं है
क्रेडिट कार्ड मैक्स आऊट हैं, उनका कुछ भी नहीं भरोसा
छोड़ो अब लड्डू के सपने वो न तुम्हें मिलने पाऒ
बैठो घर पर खाओ प्यारे चार रोज का रखा समोसा
इसी तरह ही सरदर्दी से मिल पाये तुमको छुटकारा
भारत जाना अब तो लगता संभव होगा नहीं हमारा
मित्रों ने रिश्तेदारों ने बार बार था हमें पुकारा
निश्चित हुआ भ्रमण को जाना भारत में इस बार हमारा
जैसे ही छुट्टी की अर्जी की हमने दाखिल दफ़्तर में
हमें बास ने पकड़ लिया, जो गलती से था हिन्दुस्तानी
उसे भेजना था कुछ अपने छोटे भाई के बेटे को
न सुन पाने की आदत थी रही सदा उससे अनजानी
उसने मोबाईल का नम्बर और पता हमको दे मारा
श्रीमतीजी ने घर आते ही हमको इक लिस्ट थमा दी
छह पन्नों पर लिखा हुआ था किस किसको क्या ले जाना है
पाँच भतीजी चार भतीजे तीन भांजी सात भांजे
साला साली, भाई भाभी सब का ध्यान रखा जाना है
अविरल बहती थी सूची हो जैसे इक नदिया की धारा
लैपटाप लेटेस्त माडलों वाले दो, सोनी के लेने
तीन एम पी थ्री प्लेयर चालीस गिग की ड्राइव वाले
डिजिटल चार कैमरे जिनके पिक्सेल भी छह मिलियन तो हों
और फोने दो चिप जिनमें हों जी एस एम की क्षमता वाले
प्रथम पॄष्ठ ही देख लगा है घिघियाने अब बजट हमारा
हों पर्फ़्यूम डिजाइन वाले कुछ डियोर के कुछ शनेल के
एक अंगूठी नगों जड़ी हो जिसे टिफ़ैनी से लाना है
घड़ी ब्रेटलिंग और कार्टिये, इनसे नीचे नहीं उतरना
आखिर को रिश्तेदारी में अपना चेहरा दिखलाना है
एक बार होती फ़रमाईश, कोई करता नहीं दुबारा
लिस्ट अभी आधी देखी थी टोटल खर्चा बीस हजारी
उस पर अभी तीन टिकटों की रकम जोड़नी भी बाकी है
और वहां पर दिल्ली, बम्बई, जयपुर व कलकत्ता जाना
वॄन्दावन जा हमें देखनी कॄष्ण कन्हैया की झांकी है
लिस्ट हाथ से लगी छूटने, हो जैसे तपता अंगारा
हमें गाज़ियाबाद और फिर गुड़गांवा भी तो जाना है
फिर प्रतापनगरी में जाकर कवितापाठ सुनाना होगा
छह गज़लों से चार गीत से शायद काम वहां चल जाये
लखनऊ जाकर लेकिन हमको गीतकलश छलकाना होगा
फ़ुरसतियाजी का सन्देसा दरवाज़े पर आन पुकारा
तभी दूसरी लिस्ट थमाई गई हाथ में हमको लाकर
उसमें था सामान, खरीदारी जो करनी है भारत में
पाँच शरारे, आठ गरारे, दस सलवार सूट रेशम के
पन्द्रह साड़ी, मिल जायेंगी नई सड़क वाली आढ़त में
घंटे वाले हलवाई का मावा लिपटा हुआ छुआरा
और दरीबा दिल्ली वाला जहाँ जेवरों की दुकान हैं
एक सेट हीरे पन्ने का और एक दो मोती वाले
कुन्दन वाला नया डिजाईन मिल जाये तो लेना होगा
चांदी के लाने गिलास हैं बारह, छह थाली, छह प्याले
गर्मी के मौसम में हमको लगने लगा भयंकर जाड़ा
कहा चैकबुक ने ये सब उसके बूते की बात नहीं है
क्रेडिट कार्ड मैक्स आऊट हैं, उनका कुछ भी नहीं भरोसा
छोड़ो अब लड्डू के सपने वो न तुम्हें मिलने पाऒ
बैठो घर पर खाओ प्यारे चार रोज का रखा समोसा
इसी तरह ही सरदर्दी से मिल पाये तुमको छुटकारा
भारत जाना अब तो लगता संभव होगा नहीं हमारा
Monday, September 3, 2007
रसोई और तुम
जो कभी सोचा भी नहीं था, वह हो गया. रचनाधर्मिता के क्षेत्र में बढ़ती हुई
कलमों का प्रभाव अपना विस्तार हमारे घर तक ले आयेगा इसकी हमने कल्पना नहीं की थी.यह निश्चय ही रजनीगंधा,भावना, सीमा,रचना के साथ साथ प्रत्यक्षा और लावण्या का प्रभाव नहीं तो और क्या हैजिसने हमारी आपबीती-- रसोई और हम -- को सिरे से धो कर रख दिया.
उनके वापिस आने के दूसरे दिन ही यह शब्द-समूह हमारे सामने डाल दिया गया. हम
तो निरुत्तर हो गये हैं. जो कहना है आप ही पढ़ कर कहें. लीजिये पेश है- लेखकीय प्रतिक्रिया
सचमुच अबकी बार मुझे भी महंगा पड़ा मायके जाना
वापस आ जब घुसी किचन में, वहीं रह गई खड़ी ठिठक कर
था विश्वास नहीं हो पाया, है ये सचमुच मेरा ही घर
सब कुछ उलट पुलट बिखरा था और काउंटर बना पैन्ट्री
आधा गैलन तेल गिरा था, लगता यहाँ फ़र्श के ऊपर
घर का ये हिस्सा लगता है, मुझको बिल्कुल ही अनजाना
पता नहीं क्या कर डाला है, ओवरफ़्लो हुआ डिशवाशर
कोई बर्तन साफ़ किया है नहीं, कभी भी लगता खाकर
डिश क्लाथ पन्द्रह थे, संग में किचन टावलें पूरी बारह
सब कुछ इधर उधर बिखरा है कुछ भी रक्खा नहीम उठाकर
रग-डाक्टर को मुझे बुलाकर, पूरा कार्पेट धुलवाना
फ़्रिज के दरवाज़े में परतें जमीं दूध की टपक टपह कर
उगा हुआ जंगल फ़फ़ूँद का, क्रीम चीज की पूरी ब्रिक पर
सूख गये क्रिस्पर में सारे, पीच, नेक्ट्रिन, स्ट्राबेरी
और मसाले दानी में बस भरी हुई थी केवल शक्कर
डायनिंग टेबल पर ला छोड़ा, स्क्रूड्रायवर, प्लायर, पाना
तोड़ी आठ प्लेटें, तोड़े शीशे के चौदह गिलास भी
गायब तीन प्यालियाँ चम्मच चार और कुछ छुरी साथ भी
काफ़ी के मगनहीं कहीं भी, बोन चायना के कप खंडित
क्रिस्टल वाली डिश भी तोड़ी, जो पसन्द की मेरी खास थी
कैसे उड़े यहाँ गुलछर्रे, मुश्किल हुआ समझ में आना
फ़्रीज़र में, मैं छोड़ गई थी तीन थैलियाँ भरी पकौड़ी
चार बैग थी स्वाद ब्रांड की फ़्रोज़न लाकर रखी कचौड़ी
पाँच नान के पैकेट भी थे, बीस परांठे आलू वाले
डोंगा भर कर गई बना कर, मैं पनीर के साथ मंगौड़ी
चार पौंड का डब्बा भर कर रखा हुआ था हरा वटाना
आटा सूजी , मैदा, बेसन, डिब्बे हुए सभी के खाली
सारी दालें छूमन्तर थीं, केवल उड़द बची थी काली
कैबिनेट में सिर्फ़ हवा है, झाड़ू लगी सभी खानों पर
ये बेतरतीबी सोच रही हूँ कैसे मुझसे जाये संभाली
हफ़्ते भर का काम हो गया, पूरा किचन मुझे संगवाना
रसगुल्ले, गुलाबजामुन की कैन रखीं थीम सभी नदारद
रिट्ज़. क्लब क्रैकर के डब्बे, हुए कहाँ पर जाने गारद
चिप्स एहोय, ओरियो का तो चूरा तक भी बचा न बाकी
न्यूट्रीशन के लिये न जाने कैसी बुद्धि दे गई शारद
फिर से नये सिरे से सब कुच, मुझे पड़ेगा अब समझाना
सचमुच अबकी बार बहुत ही महँगा पड़ा मायके जाना
कलमों का प्रभाव अपना विस्तार हमारे घर तक ले आयेगा इसकी हमने कल्पना नहीं की थी.यह निश्चय ही रजनीगंधा,भावना, सीमा,रचना के साथ साथ प्रत्यक्षा और लावण्या का प्रभाव नहीं तो और क्या हैजिसने हमारी आपबीती-- रसोई और हम -- को सिरे से धो कर रख दिया.
उनके वापिस आने के दूसरे दिन ही यह शब्द-समूह हमारे सामने डाल दिया गया. हम
तो निरुत्तर हो गये हैं. जो कहना है आप ही पढ़ कर कहें. लीजिये पेश है- लेखकीय प्रतिक्रिया
सचमुच अबकी बार मुझे भी महंगा पड़ा मायके जाना
वापस आ जब घुसी किचन में, वहीं रह गई खड़ी ठिठक कर
था विश्वास नहीं हो पाया, है ये सचमुच मेरा ही घर
सब कुछ उलट पुलट बिखरा था और काउंटर बना पैन्ट्री
आधा गैलन तेल गिरा था, लगता यहाँ फ़र्श के ऊपर
घर का ये हिस्सा लगता है, मुझको बिल्कुल ही अनजाना
पता नहीं क्या कर डाला है, ओवरफ़्लो हुआ डिशवाशर
कोई बर्तन साफ़ किया है नहीं, कभी भी लगता खाकर
डिश क्लाथ पन्द्रह थे, संग में किचन टावलें पूरी बारह
सब कुछ इधर उधर बिखरा है कुछ भी रक्खा नहीम उठाकर
रग-डाक्टर को मुझे बुलाकर, पूरा कार्पेट धुलवाना
फ़्रिज के दरवाज़े में परतें जमीं दूध की टपक टपह कर
उगा हुआ जंगल फ़फ़ूँद का, क्रीम चीज की पूरी ब्रिक पर
सूख गये क्रिस्पर में सारे, पीच, नेक्ट्रिन, स्ट्राबेरी
और मसाले दानी में बस भरी हुई थी केवल शक्कर
डायनिंग टेबल पर ला छोड़ा, स्क्रूड्रायवर, प्लायर, पाना
तोड़ी आठ प्लेटें, तोड़े शीशे के चौदह गिलास भी
गायब तीन प्यालियाँ चम्मच चार और कुछ छुरी साथ भी
काफ़ी के मगनहीं कहीं भी, बोन चायना के कप खंडित
क्रिस्टल वाली डिश भी तोड़ी, जो पसन्द की मेरी खास थी
कैसे उड़े यहाँ गुलछर्रे, मुश्किल हुआ समझ में आना
फ़्रीज़र में, मैं छोड़ गई थी तीन थैलियाँ भरी पकौड़ी
चार बैग थी स्वाद ब्रांड की फ़्रोज़न लाकर रखी कचौड़ी
पाँच नान के पैकेट भी थे, बीस परांठे आलू वाले
डोंगा भर कर गई बना कर, मैं पनीर के साथ मंगौड़ी
चार पौंड का डब्बा भर कर रखा हुआ था हरा वटाना
आटा सूजी , मैदा, बेसन, डिब्बे हुए सभी के खाली
सारी दालें छूमन्तर थीं, केवल उड़द बची थी काली
कैबिनेट में सिर्फ़ हवा है, झाड़ू लगी सभी खानों पर
ये बेतरतीबी सोच रही हूँ कैसे मुझसे जाये संभाली
हफ़्ते भर का काम हो गया, पूरा किचन मुझे संगवाना
रसगुल्ले, गुलाबजामुन की कैन रखीं थीम सभी नदारद
रिट्ज़. क्लब क्रैकर के डब्बे, हुए कहाँ पर जाने गारद
चिप्स एहोय, ओरियो का तो चूरा तक भी बचा न बाकी
न्यूट्रीशन के लिये न जाने कैसी बुद्धि दे गई शारद
फिर से नये सिरे से सब कुच, मुझे पड़ेगा अब समझाना
सचमुच अबकी बार बहुत ही महँगा पड़ा मायके जाना
Wednesday, August 29, 2007
समीर भाई- यह बरस भी शुभ हो
लिखूँ बधाई और साथ में केक आपको भेज रहा हूँ
ताकि बाँट कर सबसे खायें, और शिकायत कोई करे न
सबसे छुप कर वर्ष गाँठ जो प्रणय दिवस की मना रहे हो
शायद सोचा तुम्हें तकाजा मिष्ठानों का कोई करे न
इतिहासों में लिखा हुआ है स्वर्ण- पत्र पर
जब समीर की पूर्ण हुई थी सतत साधना
यज्ञभूमि उसकी स्मॄतियों से महक रही है
यदों में खो, पुलक र्ही है अभी भावना
यह सुरभित पल बरस बरस हों और घनेरे
जहाँ स्पर्श हो, बहीं खिल उठे पुष्प-वाटिका
दुहराता है आज पुन: इस पावल दिन पर
पोर पोर मेरे मन का बस यही कामना
ताकि बाँट कर सबसे खायें, और शिकायत कोई करे न
सबसे छुप कर वर्ष गाँठ जो प्रणय दिवस की मना रहे हो
शायद सोचा तुम्हें तकाजा मिष्ठानों का कोई करे न
इतिहासों में लिखा हुआ है स्वर्ण- पत्र पर
जब समीर की पूर्ण हुई थी सतत साधना
यज्ञभूमि उसकी स्मॄतियों से महक रही है
यदों में खो, पुलक र्ही है अभी भावना
यह सुरभित पल बरस बरस हों और घनेरे
जहाँ स्पर्श हो, बहीं खिल उठे पुष्प-वाटिका
दुहराता है आज पुन: इस पावल दिन पर
पोर पोर मेरे मन का बस यही कामना
Wednesday, August 22, 2007
जंतर-मंतर: अपनी किस्मत बदलवा लें
हुआ यूँ कि कान्फ़्रेंस से वापिस आकर काम पर पहुँचते ही पहला प्रश्न हमारी ओर उछलता हुआ आया- कितना जीते कितना हारे ?
क्योंकि आफ़िस में सभी को पता था कि हमारी कान्फ़्रेंस लास वेगास में थी तो यह प्रश्न स्वाभिविक ही था. बड़े सकुचाते सकुचाते हमने उत्तर दिया कि हमें तो वहाँ कैसीनो जाने का समय ही नहीं मिला तो यकायक किसी को हमारी बात पर विश्वास नहीं हुआ. अब कैसे समझाते कि सुबह सात बजे से शाम छह बजे तक कान्फ़्रेंस के सेशन्स और उसके बाद साढ़े छह बजे से दस बजे तक की डिनर मीटिंग्स ने दिन के खाते में इतना समय छोड़ा ही नहीं कि क्रेप, रालेट , ब्लैकजैक या स्लाट्स पर अपनी किस्मत आजमाते.
घर वापिस आकर टीवी आन किया और फिर अपनी अगली कान्फ़्रेंस की रूपरेखा बनाने लगे कि सामने ज़ी टीवी पर आते हुए विज्ञापन ने हमें झकझोर दिया- हे मूर्ख, अपनी किस्मत बदल. फ़ौरन बाबा महाराज को फोने कर और देख गारंटी के साथ सात दिनों में कैसे तकदीर पलटती है हमारे ज्ञान चक्षु खुल गये और निश्चय कर लिया कि लास वेगास जाने से पहले अपनी किस्मत बदलवा लें . तो साहब
हम पे विज्ञापनों का हुआ यूँ असर
भाग्य की रेख को हम बदलने चले
पीर साहब को सत्रह किये फोन फिर
वेवसाइट पे बाबा की लाग इन किया
भेजी ईमेल पंडितजी महाराज को
पिर जलाया दिया, ज्योतिषी का दिया
स्वामीजी के दिये जंत्र बाँधे हुए
मंत्र पढ़ते लगे हर घड़ी रात दिन
और जैसा कहा एक सौ आठ ने
हमने रातें बिताईं सितारों को गिन
अपनी डायट से हमने बचाया बटर
सींचते हम रहे दीप जितने जले
एक ब्रजधाम के, एक थे गोकुली
एक बरसाने वाले पुजारी मिले
उनके वचनामॄतों को पिया घोलकर
जोड़ कर अपनी आशाओं के सिलसिले
ब्राह्मणों को दिये भोज, की परिक्रमा
नित्य श्वलिंग पर जल चढ़ाते रहे
हाथ में एक माला पकड़ राम का
नाम हर सांस में गुनगुनाते रहे
सूर्य वन्दन किया नित्य ही भोर को
करते स्तुतियां रहे, रोज संध्या ढले
कुंभकर्णी मगर नींद सोया रहा
भाग्य का लेख जो था हमारा लिखा
बीते दिन मास सप्ताह पल पल सभी
किन्तु बदलाव हमको न कोई दिखा
कोष संचित गंवा कर, विदित हो गया
ये सभी स्वप्न विक्रय की दूकान हैं
उतना फ़ंसता रहा चंगुलों में वही
जो हुआ जितना ज्यादा परेशान है
और फिर सत्य ये भी पता चल गया
है अँधेरा सदा दीपकों के तले.
क्योंकि आफ़िस में सभी को पता था कि हमारी कान्फ़्रेंस लास वेगास में थी तो यह प्रश्न स्वाभिविक ही था. बड़े सकुचाते सकुचाते हमने उत्तर दिया कि हमें तो वहाँ कैसीनो जाने का समय ही नहीं मिला तो यकायक किसी को हमारी बात पर विश्वास नहीं हुआ. अब कैसे समझाते कि सुबह सात बजे से शाम छह बजे तक कान्फ़्रेंस के सेशन्स और उसके बाद साढ़े छह बजे से दस बजे तक की डिनर मीटिंग्स ने दिन के खाते में इतना समय छोड़ा ही नहीं कि क्रेप, रालेट , ब्लैकजैक या स्लाट्स पर अपनी किस्मत आजमाते.
घर वापिस आकर टीवी आन किया और फिर अपनी अगली कान्फ़्रेंस की रूपरेखा बनाने लगे कि सामने ज़ी टीवी पर आते हुए विज्ञापन ने हमें झकझोर दिया- हे मूर्ख, अपनी किस्मत बदल. फ़ौरन बाबा महाराज को फोने कर और देख गारंटी के साथ सात दिनों में कैसे तकदीर पलटती है हमारे ज्ञान चक्षु खुल गये और निश्चय कर लिया कि लास वेगास जाने से पहले अपनी किस्मत बदलवा लें . तो साहब
हम पे विज्ञापनों का हुआ यूँ असर
भाग्य की रेख को हम बदलने चले
पीर साहब को सत्रह किये फोन फिर
वेवसाइट पे बाबा की लाग इन किया
भेजी ईमेल पंडितजी महाराज को
पिर जलाया दिया, ज्योतिषी का दिया
स्वामीजी के दिये जंत्र बाँधे हुए
मंत्र पढ़ते लगे हर घड़ी रात दिन
और जैसा कहा एक सौ आठ ने
हमने रातें बिताईं सितारों को गिन
अपनी डायट से हमने बचाया बटर
सींचते हम रहे दीप जितने जले
एक ब्रजधाम के, एक थे गोकुली
एक बरसाने वाले पुजारी मिले
उनके वचनामॄतों को पिया घोलकर
जोड़ कर अपनी आशाओं के सिलसिले
ब्राह्मणों को दिये भोज, की परिक्रमा
नित्य श्वलिंग पर जल चढ़ाते रहे
हाथ में एक माला पकड़ राम का
नाम हर सांस में गुनगुनाते रहे
सूर्य वन्दन किया नित्य ही भोर को
करते स्तुतियां रहे, रोज संध्या ढले
कुंभकर्णी मगर नींद सोया रहा
भाग्य का लेख जो था हमारा लिखा
बीते दिन मास सप्ताह पल पल सभी
किन्तु बदलाव हमको न कोई दिखा
कोष संचित गंवा कर, विदित हो गया
ये सभी स्वप्न विक्रय की दूकान हैं
उतना फ़ंसता रहा चंगुलों में वही
जो हुआ जितना ज्यादा परेशान है
और फिर सत्य ये भी पता चल गया
है अँधेरा सदा दीपकों के तले.
Thursday, August 9, 2007
हाय रसोई और हम
हुआ यों कि श्रीमतीजी ने एकदम एलान कर दिया कि कुछ दिनों के लिये वे हमसे छुटकारा पाना चाहती हैं, इसलिये उन्होने अपनी टिकट बुक करा ली और तीसरे दिन ही प्रस्थान कर दिया अपने मायके के लिये. पहले तो हमने सोचा कि चलो अच्छा हुआ. कुछ दिन तक हम सारे चिट्ठे ध्यान देकर भली भांति पढ़ेंगे और समझने की ईमानदार कोशिश भी करेंगे. एक लिस्ट भी बना ली जिसमें सीधे साधे चिट्ठे जैसे उड़नतश्तरी, फ़ुरसतिया और दिल के दर्पण या दिल के दर्म्याँ को कोई जगह नहीं दी. सोचा उन चिट्ठों को पढ़ना भी क्या पढ़ना जो सीधी बात करते हैं.
खैर, पहले दिन ही जैसे यह सोचा कि खाना पीना निपटा कर चिट्ठे पढ़ेंगे, सारा प्रोग्राम धरा का धरा रह गया. चिट्ठे पढ़ पाना तो दूर, कम्प्यूटर तक पहुँचने की नौबत ही नहीं आई. रसोई से बाहर निकल पाना असम्भव हो गया. सारी कोशिशें बस यों सिमट कर रह गईं :-
तुमने कहा चार दिन, लेकिन छह हफ़्ते का लिखा फ़साना
सच कहता हूँ मीत, तुम्हारा महंगा पड़ा मायके जाना
कहां कढ़ाई, कलछी, चम्मच,देग, पतीला कहां कटोरी
नमक मिर्च हल्दी अजवायन, कहां छुपी है हींग निगोड़ी
कांटा छुरी, प्लेटें प्याले, सासपेन इक ढक्कन वाला
कुछ भी हमको मिल न सका है, हर इक चीज छुपा कर छोड़ी
सारी कोशिश ऐसी जैसे खल्लड़ से मूसल टकराना
सच कहता हूँ मीत तुम्हारा महंगा पड़ा मायके जाना
आटा सूजी, मैदा, बेसन नहीं मिले, न दाल चने की
हमने सोचा बिना तुम्हारे यहाँ चैन की खूब छनेगी
मिल न सकी है लौंग, न काली मिर्च, छोंकने को न जीरा
सोड़ा दिखता नहीं कहीं भी, जाने कैसे दाल गलेगी
लगा हुआ हूँ आज सुबह से, अब तक बना नहीं है खाना
सच कहता हूँ मीत, तुम्हारा महंगा पड़ा मायके जाना
मेथी, केसर,काजू,किशमिश, कहीं छुपे पिस्ते बदाम भी
पिछले महीने रखी बना जो, मिली नहीं वो सौंठ आम की
ढूँढ़ छुहारे और मखाने थका , न दिखती कहीं चिरौंजी
जिनके परस बिना रह जाती खीर किसी भी नहीं काम की
सारी कैबिनेट उलटा दीं, मिला न चाय वाला छाना
सच कहता हूँ मीत, तुम्हारा महंगा पड़ा मायके जाना
आज सुबह जब उठ कर आया, काफ़ी, दूध, चाय सब गायब
ये साम्राज्य तुम्हारा, इसको किचन कहूँ या कहूँ अजायब
कैसे आन करूँ चूल्हे को, कैसे माइक्रोवेव चलाऊँ
तुम थीं कल तक ताजदार, मैं बन कर रहा तुम्हारा नायब
कैलेन्डर की तस्वीरों से, सूजी का हलवा दे ताना
सच कहता हूँ मीत, तुम्हारा महंगा पड़ा मायके जाना
आलू, बैंगन, गोभी, लौकी, फ़ली सेम की और ग्वार की
सब हो गये अजनबी, टेबिल पर बोतल है बस अचार की
कड़वा रहा करेला, सीजे नहीं कुन्दरू, मूली गाजर
दाल मूँग की जिसे उबाला, आतुर है घी के बघार की
नानी के संग, आज बताऊँ याद आ रहे मुझको नाना
सच कहता हूँ मीत, तुम्हारा महंगा पड़ा मायके जाना
डोसा, इडली, बड़ा, रसम के साथ याद आती है सांभर
बड़ा-पाव, उत्तपम, खांडवी, पूरन-पोली, वाड़ी -भाकर
बाटी, दाल, चूरमा, गट्टे, छोले और तंदूरी रोटी
मुँह में घुलते हुए याद बन, चटनी संग उज्जैनी पापड़
संभव नहीं एक पल को भी, आँखों से इनकी छवि जाना
सच कहता हूँ मीत, तुम्हारा महंगा पड़ा मायके जाना
पीज़ा हट के पीज़ा में अब स्वाद नहीं कुछ आ पाता है
बर्गर में लगता है मुझको, भूसा सिर्फ़ भरा जाता है
चाट-पापड़ी, और कचौड़ी, स्वादहीन बिन परस तुम्हारे
और समोसा बहुत बुलाया, लेकिन पास नहीं आता है
संदेसा पाकर, उड़ान ले अगली जल्दी वापिस आना
सच कहता हूँ मीत तुम्हारा महंगा पड़ा मायके जाना
रतलामी सब सेव खो गये, मिली न भुजिया बीकानेरी
दालमोठ के पैकेट गायब, सूखे पेठे और गँड़ेरी
आलू के लच्छे या चिवड़ा गुड़धानी न भुने चने हैं
भूल भुलैया बनी रसोई, पेट बजाता है रणभेरी
तुम आओ तो लिखा नाम है जिस मेरा, पाऊं खाना
सच कहता हूँ मीत, तुम्हारा महंगा पड़ा मायके जाना
खैर, पहले दिन ही जैसे यह सोचा कि खाना पीना निपटा कर चिट्ठे पढ़ेंगे, सारा प्रोग्राम धरा का धरा रह गया. चिट्ठे पढ़ पाना तो दूर, कम्प्यूटर तक पहुँचने की नौबत ही नहीं आई. रसोई से बाहर निकल पाना असम्भव हो गया. सारी कोशिशें बस यों सिमट कर रह गईं :-
तुमने कहा चार दिन, लेकिन छह हफ़्ते का लिखा फ़साना
सच कहता हूँ मीत, तुम्हारा महंगा पड़ा मायके जाना
कहां कढ़ाई, कलछी, चम्मच,देग, पतीला कहां कटोरी
नमक मिर्च हल्दी अजवायन, कहां छुपी है हींग निगोड़ी
कांटा छुरी, प्लेटें प्याले, सासपेन इक ढक्कन वाला
कुछ भी हमको मिल न सका है, हर इक चीज छुपा कर छोड़ी
सारी कोशिश ऐसी जैसे खल्लड़ से मूसल टकराना
सच कहता हूँ मीत तुम्हारा महंगा पड़ा मायके जाना
आटा सूजी, मैदा, बेसन नहीं मिले, न दाल चने की
हमने सोचा बिना तुम्हारे यहाँ चैन की खूब छनेगी
मिल न सकी है लौंग, न काली मिर्च, छोंकने को न जीरा
सोड़ा दिखता नहीं कहीं भी, जाने कैसे दाल गलेगी
लगा हुआ हूँ आज सुबह से, अब तक बना नहीं है खाना
सच कहता हूँ मीत, तुम्हारा महंगा पड़ा मायके जाना
मेथी, केसर,काजू,किशमिश, कहीं छुपे पिस्ते बदाम भी
पिछले महीने रखी बना जो, मिली नहीं वो सौंठ आम की
ढूँढ़ छुहारे और मखाने थका , न दिखती कहीं चिरौंजी
जिनके परस बिना रह जाती खीर किसी भी नहीं काम की
सारी कैबिनेट उलटा दीं, मिला न चाय वाला छाना
सच कहता हूँ मीत, तुम्हारा महंगा पड़ा मायके जाना
आज सुबह जब उठ कर आया, काफ़ी, दूध, चाय सब गायब
ये साम्राज्य तुम्हारा, इसको किचन कहूँ या कहूँ अजायब
कैसे आन करूँ चूल्हे को, कैसे माइक्रोवेव चलाऊँ
तुम थीं कल तक ताजदार, मैं बन कर रहा तुम्हारा नायब
कैलेन्डर की तस्वीरों से, सूजी का हलवा दे ताना
सच कहता हूँ मीत, तुम्हारा महंगा पड़ा मायके जाना
आलू, बैंगन, गोभी, लौकी, फ़ली सेम की और ग्वार की
सब हो गये अजनबी, टेबिल पर बोतल है बस अचार की
कड़वा रहा करेला, सीजे नहीं कुन्दरू, मूली गाजर
दाल मूँग की जिसे उबाला, आतुर है घी के बघार की
नानी के संग, आज बताऊँ याद आ रहे मुझको नाना
सच कहता हूँ मीत, तुम्हारा महंगा पड़ा मायके जाना
डोसा, इडली, बड़ा, रसम के साथ याद आती है सांभर
बड़ा-पाव, उत्तपम, खांडवी, पूरन-पोली, वाड़ी -भाकर
बाटी, दाल, चूरमा, गट्टे, छोले और तंदूरी रोटी
मुँह में घुलते हुए याद बन, चटनी संग उज्जैनी पापड़
संभव नहीं एक पल को भी, आँखों से इनकी छवि जाना
सच कहता हूँ मीत, तुम्हारा महंगा पड़ा मायके जाना
पीज़ा हट के पीज़ा में अब स्वाद नहीं कुछ आ पाता है
बर्गर में लगता है मुझको, भूसा सिर्फ़ भरा जाता है
चाट-पापड़ी, और कचौड़ी, स्वादहीन बिन परस तुम्हारे
और समोसा बहुत बुलाया, लेकिन पास नहीं आता है
संदेसा पाकर, उड़ान ले अगली जल्दी वापिस आना
सच कहता हूँ मीत तुम्हारा महंगा पड़ा मायके जाना
रतलामी सब सेव खो गये, मिली न भुजिया बीकानेरी
दालमोठ के पैकेट गायब, सूखे पेठे और गँड़ेरी
आलू के लच्छे या चिवड़ा गुड़धानी न भुने चने हैं
भूल भुलैया बनी रसोई, पेट बजाता है रणभेरी
तुम आओ तो लिखा नाम है जिस मेरा, पाऊं खाना
सच कहता हूँ मीत, तुम्हारा महंगा पड़ा मायके जाना
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