हुआ यों कि श्रीमतीजी ने एकदम एलान कर दिया कि कुछ दिनों के लिये वे हमसे छुटकारा पाना चाहती हैं, इसलिये उन्होने अपनी टिकट बुक करा ली और तीसरे दिन ही प्रस्थान कर दिया अपने मायके के लिये. पहले तो हमने सोचा कि चलो अच्छा हुआ. कुछ दिन तक हम सारे चिट्ठे ध्यान देकर भली भांति पढ़ेंगे और समझने की ईमानदार कोशिश भी करेंगे. एक लिस्ट भी बना ली जिसमें सीधे साधे चिट्ठे जैसे उड़नतश्तरी, फ़ुरसतिया और दिल के दर्पण या दिल के दर्म्याँ को कोई जगह नहीं दी. सोचा उन चिट्ठों को पढ़ना भी क्या पढ़ना जो सीधी बात करते हैं.
खैर, पहले दिन ही जैसे यह सोचा कि खाना पीना निपटा कर चिट्ठे पढ़ेंगे, सारा प्रोग्राम धरा का धरा रह गया. चिट्ठे पढ़ पाना तो दूर, कम्प्यूटर तक पहुँचने की नौबत ही नहीं आई. रसोई से बाहर निकल पाना असम्भव हो गया. सारी कोशिशें बस यों सिमट कर रह गईं :-
तुमने कहा चार दिन, लेकिन छह हफ़्ते का लिखा फ़साना
सच कहता हूँ मीत, तुम्हारा महंगा पड़ा मायके जाना
कहां कढ़ाई, कलछी, चम्मच,देग, पतीला कहां कटोरी
नमक मिर्च हल्दी अजवायन, कहां छुपी है हींग निगोड़ी
कांटा छुरी, प्लेटें प्याले, सासपेन इक ढक्कन वाला
कुछ भी हमको मिल न सका है, हर इक चीज छुपा कर छोड़ी
सारी कोशिश ऐसी जैसे खल्लड़ से मूसल टकराना
सच कहता हूँ मीत तुम्हारा महंगा पड़ा मायके जाना
आटा सूजी, मैदा, बेसन नहीं मिले, न दाल चने की
हमने सोचा बिना तुम्हारे यहाँ चैन की खूब छनेगी
मिल न सकी है लौंग, न काली मिर्च, छोंकने को न जीरा
सोड़ा दिखता नहीं कहीं भी, जाने कैसे दाल गलेगी
लगा हुआ हूँ आज सुबह से, अब तक बना नहीं है खाना
सच कहता हूँ मीत, तुम्हारा महंगा पड़ा मायके जाना
मेथी, केसर,काजू,किशमिश, कहीं छुपे पिस्ते बदाम भी
पिछले महीने रखी बना जो, मिली नहीं वो सौंठ आम की
ढूँढ़ छुहारे और मखाने थका , न दिखती कहीं चिरौंजी
जिनके परस बिना रह जाती खीर किसी भी नहीं काम की
सारी कैबिनेट उलटा दीं, मिला न चाय वाला छाना
सच कहता हूँ मीत, तुम्हारा महंगा पड़ा मायके जाना
आज सुबह जब उठ कर आया, काफ़ी, दूध, चाय सब गायब
ये साम्राज्य तुम्हारा, इसको किचन कहूँ या कहूँ अजायब
कैसे आन करूँ चूल्हे को, कैसे माइक्रोवेव चलाऊँ
तुम थीं कल तक ताजदार, मैं बन कर रहा तुम्हारा नायब
कैलेन्डर की तस्वीरों से, सूजी का हलवा दे ताना
सच कहता हूँ मीत, तुम्हारा महंगा पड़ा मायके जाना
आलू, बैंगन, गोभी, लौकी, फ़ली सेम की और ग्वार की
सब हो गये अजनबी, टेबिल पर बोतल है बस अचार की
कड़वा रहा करेला, सीजे नहीं कुन्दरू, मूली गाजर
दाल मूँग की जिसे उबाला, आतुर है घी के बघार की
नानी के संग, आज बताऊँ याद आ रहे मुझको नाना
सच कहता हूँ मीत, तुम्हारा महंगा पड़ा मायके जाना
डोसा, इडली, बड़ा, रसम के साथ याद आती है सांभर
बड़ा-पाव, उत्तपम, खांडवी, पूरन-पोली, वाड़ी -भाकर
बाटी, दाल, चूरमा, गट्टे, छोले और तंदूरी रोटी
मुँह में घुलते हुए याद बन, चटनी संग उज्जैनी पापड़
संभव नहीं एक पल को भी, आँखों से इनकी छवि जाना
सच कहता हूँ मीत, तुम्हारा महंगा पड़ा मायके जाना
पीज़ा हट के पीज़ा में अब स्वाद नहीं कुछ आ पाता है
बर्गर में लगता है मुझको, भूसा सिर्फ़ भरा जाता है
चाट-पापड़ी, और कचौड़ी, स्वादहीन बिन परस तुम्हारे
और समोसा बहुत बुलाया, लेकिन पास नहीं आता है
संदेसा पाकर, उड़ान ले अगली जल्दी वापिस आना
सच कहता हूँ मीत तुम्हारा महंगा पड़ा मायके जाना
रतलामी सब सेव खो गये, मिली न भुजिया बीकानेरी
दालमोठ के पैकेट गायब, सूखे पेठे और गँड़ेरी
आलू के लच्छे या चिवड़ा गुड़धानी न भुने चने हैं
भूल भुलैया बनी रसोई, पेट बजाता है रणभेरी
तुम आओ तो लिखा नाम है जिस मेरा, पाऊं खाना
सच कहता हूँ मीत, तुम्हारा महंगा पड़ा मायके जाना
Thursday, August 9, 2007
Friday, August 3, 2007
ये गीत लिख रहे हैं
तुम्हारी नजरों को देख कर हम, हुज़ूर ये गीत लिख रहे हैं
न जाने कैसा चढ़ा है हम पर सुरूर, ये गीत लिख रहे हैं
वे और होंगे जिन्हें ये दावा है वे सुखनवर हैं, वे हैं शायर
हमें तो इस पर नहीं जरा भी गुरूर, ये गीत लिख रहे हैं
कहां है मुमकिन जुबां को खोलें या कोई इज़हार कर सकें हम
ख़ता हमारी है इतनी केवल जरूर, ये गीत लिख रहे हैं
तुम्हारी महफ़िल से अजनबी जो, शनासा थी कल तलक हमारी
उस तिस्नगी के खयाल से भी, हो दूर ये गीत लिख रहे हैं
उठाओ तुम भी जनाब उंगली, जो लिख रहे हो वो गात कब है ?
नहीं गज़ल की है बंदिशों का शऊर, ये गीत लिख रहे हैं
न जाने कैसा चढ़ा है हम पर सुरूर, ये गीत लिख रहे हैं
वे और होंगे जिन्हें ये दावा है वे सुखनवर हैं, वे हैं शायर
हमें तो इस पर नहीं जरा भी गुरूर, ये गीत लिख रहे हैं
कहां है मुमकिन जुबां को खोलें या कोई इज़हार कर सकें हम
ख़ता हमारी है इतनी केवल जरूर, ये गीत लिख रहे हैं
तुम्हारी महफ़िल से अजनबी जो, शनासा थी कल तलक हमारी
उस तिस्नगी के खयाल से भी, हो दूर ये गीत लिख रहे हैं
उठाओ तुम भी जनाब उंगली, जो लिख रहे हो वो गात कब है ?
नहीं गज़ल की है बंदिशों का शऊर, ये गीत लिख रहे हैं
कैसे बोझ उठायेंगे
कैसे होंगे गीत आपके अधरों पर जो आयेंगे
जिन्हें आप सरगम के गहने पहना पहना गायेंगे
मेरे शब्दों की किस्मत में लिखा हुआ ठोकर खाना
आज संभल कर उठे किन्तु ये कल फिर से गिर जायेंगे
छंदों की उजड़ी बस्ती में भावों का ये चरवाहा
अक्षर हैं भटकी भेड़ों से, कैसे फिर जुड़ पायेंगे
भावों की गठरी के ॠण का मूल अभी भी बाकी है
और ब्याज पर ब्याज चढ़ रहा कैसे इसे चुकायेंगे
नीलामी सुधि की सड़कों पर, लेकिन ग्राहक कोई नहीं
मुफ़्त तमाशे के दर्शक तो अनगिनती मिल जायेंगे
जिन्हें आप सरगम के गहने पहना पहना गायेंगे
मेरे शब्दों की किस्मत में लिखा हुआ ठोकर खाना
आज संभल कर उठे किन्तु ये कल फिर से गिर जायेंगे
छंदों की उजड़ी बस्ती में भावों का ये चरवाहा
अक्षर हैं भटकी भेड़ों से, कैसे फिर जुड़ पायेंगे
भावों की गठरी के ॠण का मूल अभी भी बाकी है
और ब्याज पर ब्याज चढ़ रहा कैसे इसे चुकायेंगे
नीलामी सुधि की सड़कों पर, लेकिन ग्राहक कोई नहीं
मुफ़्त तमाशे के दर्शक तो अनगिनती मिल जायेंगे
Sunday, July 29, 2007
समीर लालजी -जन्मदिन शुभ हो
अभी अभी नाटक देख कर घर वापिस आया तो देखा खिड़की की सिल् पर बैठी एक गौरेय्या गुनगुना रही थी. उसका गाना सुनते सुनते सहसा ही याद आया कि कल २९ जुलाई को एक जन्मदिवस भी मनाना है.सोचा कि कोई फ़िल्मी गाना तलाश कर के भेज दूँ पर बहुत देर तक ढूँढ़ने के बाद भी कोई ऐसा गाना नहीं मिला जिसे भेज कर औपचारिकता निभा दी जाये ( हालांकि जिसका जन्मदिन है उससे औपचारिकता का रिश्ता पूरे ८०० किलोमीटर तक नहीं है )) अब सीधी साधी भाषा में केवल जन्मदिन शुभ हो या सालगिरह मुबारक या Happy Birthday to you कह कर पूरा कर देना अपने बस की बात नहीं है. गाना आता नहीं. कहानी सुना नहीं सकते. लेख हम उनके लिये क्या लिखें जो लेख सोते बिछाते हैं.
खैर जो भाव दिल में हैं वे सामने हैं
आज हर्ष से पूरित क्षण में केवल एक करूँ अभिलाषा
उड़नतश्तरी और नई ऊँचाई छू ले इतनी आशा
शत सहस्त्र जीवन के दिन हों,लिखना बातें हैं बेमानी
मैं कहता हूँ आप लिखें नित जीवन में इक नई कहानी
जब भी कलम उंगलियों में आये या जब कुंजीपट खड़के
लिखें आप जो ऐसा हो वह, पढ़ हर पाठक का दिल धड़के
वह पनघट बन जायें जिससे जाये न कोई भी प्यासा
और नई ऊँचाई लेखन की छू लें बस इतनी आशा
संवेदन घुल कर शब्दों में अर्थ नये दे जिसे लिखो तुम
अंधियारे की गलियों में बस ज्योतिपुंज का रूप्दिखो तुम
नभ के फूल सदा द्वारे पर वन्दनवार बनें खिल जायें
वॄन्द मंजरी के गुच्छे आ लेखन का सौरभ महकायें
उत्तर पाले सदा उठे जो मन में कोई भी जिज्ञासा
उड़नतश्तरी और नई ऊँचाई छू ले ये है आशा.
समीर भाई-- ये कामना आपके लिये
खैर जो भाव दिल में हैं वे सामने हैं
आज हर्ष से पूरित क्षण में केवल एक करूँ अभिलाषा
उड़नतश्तरी और नई ऊँचाई छू ले इतनी आशा
शत सहस्त्र जीवन के दिन हों,लिखना बातें हैं बेमानी
मैं कहता हूँ आप लिखें नित जीवन में इक नई कहानी
जब भी कलम उंगलियों में आये या जब कुंजीपट खड़के
लिखें आप जो ऐसा हो वह, पढ़ हर पाठक का दिल धड़के
वह पनघट बन जायें जिससे जाये न कोई भी प्यासा
और नई ऊँचाई लेखन की छू लें बस इतनी आशा
संवेदन घुल कर शब्दों में अर्थ नये दे जिसे लिखो तुम
अंधियारे की गलियों में बस ज्योतिपुंज का रूप्दिखो तुम
नभ के फूल सदा द्वारे पर वन्दनवार बनें खिल जायें
वॄन्द मंजरी के गुच्छे आ लेखन का सौरभ महकायें
उत्तर पाले सदा उठे जो मन में कोई भी जिज्ञासा
उड़नतश्तरी और नई ऊँचाई छू ले ये है आशा.
समीर भाई-- ये कामना आपके लिये
Friday, July 27, 2007
तलाश
घूमता मैं रहा भोर से सांझ तक, शब्द के रिक्त प्याले लिये हाथ में
कोई ऐसा मिला ही नहीं राह में, भाव लेकर चले जो मेरे साथ में
अजनबी राह की भीड़ में ढूँढ़ता कोई खाका मिले जिससे पहचान हो
भूमिका बन सके फिर उपन्यास की, बात होकर शुरू बात ही बात में
कोई ऐसा मिला ही नहीं राह में, भाव लेकर चले जो मेरे साथ में
अजनबी राह की भीड़ में ढूँढ़ता कोई खाका मिले जिससे पहचान हो
भूमिका बन सके फिर उपन्यास की, बात होकर शुरू बात ही बात में
Thursday, July 12, 2007
अब लिखने से कतराता हूँ
वैसे तो भाई साहब का आग्रह था कि कुछ लिखूँ और मैने सोचा कि उनका आग्रह मान लूँ. पर इस वक्त की जद्दोजहद के चलते जो लिखने कीकोशिश की तोअसफ़; ही रह गया.
बस यही कह सका कि
यह जो दौर चला है इसमें मोल न कुछ भी है भावों का
इसीलिये मैं लिखते लिखते अनायास ही रुक जाता हूँ
रह रह प्रश्न किया करते हैं शब्द, पॄष्ठ से उठा निगाहें
रोपे थे विरवे तुलसी के, कैसे हुईं कँटीली राहें
उलझी हुई गाँठ सी लगता सर्पीली हर इक पगडंडी
अवरोधों के फ़न फ़ैलाये बढ़ी हुईं झंझा की बाँहें
नहीं समय अब रहा वॄक्ष सा तन कर खड़े हुए रहने का
इसीलिये मैं हरी दूब जैसा, चरणों में झुक जाता हूँ
आक्षेपों के चक्रव्यूह में घिरे हुए हैं सारे चिन्तन
षड़यंत्रों से सांठ गांठ जिनकी, उनका होता अभिनन्दन
सॄजनात्मकता नये हाल में अपना अर्थ गंवाये जाती
दिखते हैं भुजंग ही केवल, जकड़ा हुआ इस कदर चंदन
रोज सुबह आशान्वित होता हूँ, शायद परिवर्तन होगा
और सांझ के होते होते धीरज खोकर चुक जाता हूँ
उठें उंगलियां आज उधर ही, जिधर जरा नजरें दौड़ाईं
अस्तित्वों पर प्रश्न चिन्ह हैं,ब्रह्मा,शिव या कॄष्ण कन्हाई
अपनी ही जड़ पर करने में लगे हुए आघात निरन्तर
और सोचते हैं इनकी ही हो न सकेगी जगत हँसाई
सधे मदारी की चालों से बँधे हुए लगता सब पुतले
जिनमें जुम्बिश कोई नहीं, मैं फ़टकारे चाबुक जाता हूँ
बस यही कह सका कि
यह जो दौर चला है इसमें मोल न कुछ भी है भावों का
इसीलिये मैं लिखते लिखते अनायास ही रुक जाता हूँ
रह रह प्रश्न किया करते हैं शब्द, पॄष्ठ से उठा निगाहें
रोपे थे विरवे तुलसी के, कैसे हुईं कँटीली राहें
उलझी हुई गाँठ सी लगता सर्पीली हर इक पगडंडी
अवरोधों के फ़न फ़ैलाये बढ़ी हुईं झंझा की बाँहें
नहीं समय अब रहा वॄक्ष सा तन कर खड़े हुए रहने का
इसीलिये मैं हरी दूब जैसा, चरणों में झुक जाता हूँ
आक्षेपों के चक्रव्यूह में घिरे हुए हैं सारे चिन्तन
षड़यंत्रों से सांठ गांठ जिनकी, उनका होता अभिनन्दन
सॄजनात्मकता नये हाल में अपना अर्थ गंवाये जाती
दिखते हैं भुजंग ही केवल, जकड़ा हुआ इस कदर चंदन
रोज सुबह आशान्वित होता हूँ, शायद परिवर्तन होगा
और सांझ के होते होते धीरज खोकर चुक जाता हूँ
उठें उंगलियां आज उधर ही, जिधर जरा नजरें दौड़ाईं
अस्तित्वों पर प्रश्न चिन्ह हैं,ब्रह्मा,शिव या कॄष्ण कन्हाई
अपनी ही जड़ पर करने में लगे हुए आघात निरन्तर
और सोचते हैं इनकी ही हो न सकेगी जगत हँसाई
सधे मदारी की चालों से बँधे हुए लगता सब पुतले
जिनमें जुम्बिश कोई नहीं, मैं फ़टकारे चाबुक जाता हूँ
Friday, July 6, 2007
कल कहीं मन कबीरा भी हो कि न हो
लग रही सांझ ये नेह की आखिरी
कल को शायद सवेरा भी हो कि न हो
आज जी भर के आराम कर लेने दो
कल कहीं पर बसेरा भी हो कि न हो
मैने नापी हैं जो राह की दूरियां
उनके मीलों को अब तक गिना ही नहीं
मैने उपलब्धियां मान कर ही उन्हें
है सहेजा, निराशा जो मिलती रहीं
हर घड़ी एक दीपक जलाये रखा
कल को शायद अँधेरा भी हो कि न हो
मोड़ अनगिन मिले, मैं भटकता रहा
किन्तु संकल्प मन के न टूटे मेरे
मैं उठाता रहा हर कदम पर उन्हें
राह में ठोकरें खा के जो गिर पड़े
मैं लुटाता रहा अपना दिल इसलिये
कल को मौसम लुटेरा भी हो कि न हो
आस्था के दिये प्रज्ज्वलित तो किये
रोशनी से कभी जगमगाये नहीं
गीत लिखता रहा रोज ही मैं मगर
वह किसी ने कभी गुनगुनाये नहीं
इसलिये खाके मैं बुन रहा याद के
चित्र सुधि ने चितेरा भी हो कि न हो
जो धरोहर मिली है मुझे कोष में
धीरे धीरे उसे मैं गंवाता रहा
टूटती सांस के तार को छेड़ कर
स्वर अधूरे गले में सजाता रहा
कह रहा हूँ सभी साखिया आज मैं
कल कहीं मन कबीरा भी हो कि न हो
कल को शायद सवेरा भी हो कि न हो
आज जी भर के आराम कर लेने दो
कल कहीं पर बसेरा भी हो कि न हो
मैने नापी हैं जो राह की दूरियां
उनके मीलों को अब तक गिना ही नहीं
मैने उपलब्धियां मान कर ही उन्हें
है सहेजा, निराशा जो मिलती रहीं
हर घड़ी एक दीपक जलाये रखा
कल को शायद अँधेरा भी हो कि न हो
मोड़ अनगिन मिले, मैं भटकता रहा
किन्तु संकल्प मन के न टूटे मेरे
मैं उठाता रहा हर कदम पर उन्हें
राह में ठोकरें खा के जो गिर पड़े
मैं लुटाता रहा अपना दिल इसलिये
कल को मौसम लुटेरा भी हो कि न हो
आस्था के दिये प्रज्ज्वलित तो किये
रोशनी से कभी जगमगाये नहीं
गीत लिखता रहा रोज ही मैं मगर
वह किसी ने कभी गुनगुनाये नहीं
इसलिये खाके मैं बुन रहा याद के
चित्र सुधि ने चितेरा भी हो कि न हो
जो धरोहर मिली है मुझे कोष में
धीरे धीरे उसे मैं गंवाता रहा
टूटती सांस के तार को छेड़ कर
स्वर अधूरे गले में सजाता रहा
कह रहा हूँ सभी साखिया आज मैं
कल कहीं मन कबीरा भी हो कि न हो
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